गरीब विरोधी

 

गरीबी बड़ी भयानक चीज है। कुछ ही चीजें हैं जो मानवता को इतना नीचा देखने पर मजबूर करें और जीवन की बुनियादी जरूरतें भी पूरी न कर पाना उनमें से एक है।

भारत उन देशों में शामिल है जिन्हें गरीबी का स्वर्ग कहा जा सकता है। हम चाहे तो 1947 के पहले की हमारी सारी गलतियों के लिए अंग्रेजों को दोष दे सकते हैं, लेकिन उन्हें गए भी 67 साल गुजर चुके हैं। हम अब भी दुनिया के सबसे गरीब देशों में से हैं। एशिया में चालीस के दशक में हमारे बराबर गरीबी के साथ शुरुआत करने वाले देशों ने कितनी तरक्की कर ली है।

जब वित्तमंत्री पी. चिदंबरम 28 फरवरी को संप्रग-2 का आखिरी बजट पेश करने के लिए उठे थे तो लोग यह कल्पना रहे थे कि वह सब्सिडी और वोट के लिए कुछ और लोक-लुभावन योजनाओं की शुरुआत करने की कोशिश करेंगे। ऐसा नहीं हुआ। यह जिम्मेदार बजट निकला, जिसने राजस्व घाटे को 4.8 प्रतिशत पर रोकने का संकल्प व्यक्त किया। विडंबना यह रही कि यह उन अपेक्षाओं के लिहाज से अपर्याप्त रहा जो भारत की उच्च विकास दर के संदर्भ में की जा रही थीं।

Author: 
गुरचरण दास