गरीबी

हम गरीब क्यों हैं? हमारा मुल्क विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां दुनिया के ज्यादातर गरीब भी बसते हैं। लिहाजा कोई भी व्यक्ति यही सोचेगा कि यह सवाल ही हर राजनीतिक बहस के केंद्र में होगा। वह यह भी सोच सकता है कि हम इस तरह के विषयों पर गहन व दिलचस्प बहस-परिचर्चाएं करते होंगे कि गरीबी के क्या कारण हैं ? अमीर बनने के लिए देश के तौर पर हम क्या कर सकते हैं ? तथा दुनिया के बाकी हिस्सों में इस दिशा में क्या कारगर कदम उठाए जा रहे हैं ?

संस्कृति का प्रभाव होता है या व्यवस्था का यह तय करने के लिए किसी समाजशास्त्रीय ,मनोविज्ञानीय,समाजशास्त्रीय या अर्थशास्त्रीय सिद्धांत को स्थापित कर पाना मुश्किल है। यह कह पाना मुश्किल है कि संस्कृति या व्यवस्था लोगों जिनमें शासक और शासित दोनों ही शामिल है की रोजमर्रा की गतिविधियों को किस हद तक प्रभावित करती है। संस्कृति और व्यवस्था दोनों ही गतिशील होते हैं।वे लगातार विकसित होते हैं,अंतर्क्रिया करते हैं ।दोनों ही मानवीय कर्म की उपज हैं । व्यवस्था उन लोगों की संस्कृति से प्रभावित होती है जो उसे बनाते हैं। लेकिन व्यवस्था भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि किस तरह की संस्कृति व

हाल ही में मदर टेरेसा के निधन ने सारे विश्व का ध्यान कलकत्ता और आमतौर पर भारत की  दारुण गरीबी की ओर आकर्षित किया। मदर टेरेसा ने  बेहद गरीब देश के सबसे गरीब  लोगों की सेवा की । जिस देश में संन्यास,भौतिकवाद का विरोध और भाग्यवाद वहां के बहुसख्यकों के धर्म हिन्दू का अपरिहार्य अंग हैं।जो लोग इन सिद्धांतो का अनुकरण करते है  उनके लिए गरीबो की आर्थिक स्थिति को बदलने की कोशिश फिजूल है। उनके लिए गरीबी नहीं वरन समृद्धि अचरज का विषय है।

उत्तर प्रदेश की तरह पंजाब और राजस्थान सरकार ने भी अब बेरोजगारी भत्ता देने की बात की है। हालांकि राजस्थान सरकार ने बेरोजगारी भत्ता योजना की घोषणा डेढ़ साल पहले ही की थी, लेकिन वह इसे लागू अब यानी पहली जुलाई से करेगी। इसके तहत बेरोजगारों को पांच-पांच सौ रुपये और अतिरिक्त योग्यता वाले अभ्यर्थियों को छह सौ रुपये प्रति माह दिए जाएंगे। इधर, पंजाब के वित्तमंत्री परमिंदर सिंह ढींडसा ने पिछले दिनों राज्य का बजट पेश करते हुए स्नातक बेरोजगारों को एक हजार रुपये प्रतिमाह देने की घोषणा की है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि बेरोजगार युवक-युवतियों के लिए यह एक अच्छा फैसला है। इससे उन लोगों को काफी राहत मिलेगी जि

लड़कों अथवा पुरुषों में ऐसा क्या है जो हमें इतना अधिक आकर्षित करता है कि हम एक समाज के रूप में सामूहिक तौर पर कन्याओं को गर्भ में ही मिटा देने पर आमादा हो गए हैं। क्या लड़के वाकई इतने खास हैं या इतना अधिक अलग हैं कि उनके सामने लड़कियों की कोई गिनती नहीं। हमने जब यह पता लगाने के लिए अपने शोध कीशुरुआत की कि क्यों वे अपनी संतान के रूप में लड़की के बजाय लड़का चाहते हैं तो मुझे जितने भी कारण बताए गए उनमें से एक भी मेरे गले नहीं उतरा। उदाहरण के लिए किसी ने कहा कि यदि हमारे लड़की होगी तो हमें उसकीशादी के समय दहेज देना होगा, किसी की दलील थी कि एक लड़की अपने माता-पिता अथवा अन्य पर

गर्भ में भ्रूण के लिंग परीक्षण व भ्रूण के कन्या होने की दशा में जन्म लेने से पूर्व ही उसकी हत्या कर देने के कारण देश में पुरूष-महिला लिंगानुपात के बीच की खाई लगातार बढ़ती ही जा रही है। तमाम सरकारी व गैरसरकारी प्रयासों के बावजूद यह खाई कम होने का नाम नहीं ले रही है। विश्व स्तर पर हुए एक हालिया अध्ययन के मुताबिक भारत में प्रति हजार पुरुषों की तुलना में औसतन महिलाओं की संख्या मात्र 940 है। कई राज्यों में तो प्रतिहजार पुरुषों के बनिस्पत महिलाओं की संख्या के बीच 100-120 से ज्यादा का अंतर देखने को मिला है। अर्थात प्रति हजार पुरूषों के मुकाबले मात्र 880 महिलाएं। 2011 में हुई जनग

सकल घरेलू उत्पाद में तेजी से वृद्धि गरीबी का सबसे कारगर इलाज है। यही मुखर  संदेश है वर्ष  2009-10 के गरीबी के बारे में आंकड़ों का।2004-05 और 2009 -2010 के बीच 8.5 प्रतिशत  प्रतिवर्ष की रेकार्ड विकास दर ने 1.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष की  रेकार्ड दर से गरीबी घटाई है। यह आंकड़ा  इससे पहले के 11वर्षों में गरीबी घटने की 0.7 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर के आंकड़े से दोगुना है।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

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