गरीबी

जब भी वापस आती हूं वतन किसी विदेशी दौरे के बाद, तो कुछ दिनों के लिए मेरी नजर विदेशियों की नजरों जैसी हो जाती है। बिल्कुल वैसे, जैसे आमिर खान के नए टीवी इश्तिहार में दर्शाया गया है। मुझे भी जरूरत से ज्यादा दिखने लगती हैं भारत माता के 'सुजलाम, सुफलाम' चेहरे पर गंदगी के मुहांसे, गंदी आदतों की फुंसियां और गलत नीतियों के फोड़े।

निर्धन लोगों के साथ असल त्रासदी, दरअसल उनकी आकांक्षाओं की विपन्नता है ः एडम स्मिथ

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विधानसभा चुनावों के लिए घोषणापत्र आने का सिलसिला शुरू हो गया है। हमारे देश में हाल के वर्षों में चुनावों का चरित्र तो बदला है, पर घोषणापत्रों की भाषा नहीं बदली। आज भी उनमें हवाई बातें ज्यादा मिलती हैं। भारी-भरकम शब्दों की कलाकारी के जरिए वादे किए जाते हैं।

लंबे वक्त के बाद आखिर भारतीय लोकतंत्र सही दिशा में जाता दिखाई दे रहा है और आगामी चुनाव में मतदाताओं के सामने अच्छे विकल्प मौजूद हैं। इसमें एक विकल्प वाम-मध्यमार्गी और दक्षिण-मध्यमार्गी आर्थिक नीतियों के बीच चुनाव का है। यह ध्रुवीकरण कई लोकतंत्रों में मौजूद है, जो लोगों को समृद्धि की ओर ले जाने वाले दो सर्वथा भिन्न रास्तों के बारे में परिचित कराता है। दो मुख्य दल, कांग्रेस और भाजपा (नरेंद्र मोदी इसके अधिकृत प्रत्याशी बनने के बाद) इस ध्रुवीकरण को दर्शाते हैं।

Author: 
गुरचरण दास

जब ऐसा कहा गया है कि मानव (Home Economicus) धन पैदा करने के लिए तैयार किया गया एक यंत्र है, तो भारतीय अर्थशास्त्र में बताए जा रहे उस तर्क की जांच करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है, जिसके अनुसार भारत की विशाल जनसंख्या गरीबी का एक कारण है। यदि मनुष्य एक मात्र ऐसी प्रजाति है जो धन पैदा कर सकती है, तो इसकी अधिक संख्या गरीबी का कारण कैसे हो सकती है? सच क्या है ?

अब जब देश की आर्थिक नैया मझधार में बेदिशा-बेसहारा लुढ़कती साफ दिख रही है, भारत के अर्थशास्त्री और राजनीतिक पंडित किसी और के सिर दोष थोपने की कोशिश में लगे हुए हैं। नैया डुबोने का दोष क्या सोनिया गांधी के सिर मढ़ा जा सकता है या अपने अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के सिर पर?

खाद्य सुरक्षा गारंटी अध्यादेश से सस्ते अनाज की आस लगाए बैठे लोगों पर अब दोहरी मार पड़ रही है। पूर्व की तुलना में समान मात्रा में अनाज पाने के लिए अब उन्हें दो से तीन गुना ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। यह सब हो रहा है सरकार द्वारा मुफ्त अथवा लगभग मुफ्त प्रदान करने के नाम पर। इस सरकारी गुणा-गणित से अंजान मुफ्त में सबकुछ पाने की आस लगाए बैठे लोगों को अब शायद कुछ सदबुद्धि प्राप्त हो। विस्तार से जानने के लिए पढ़ें...

एक गरीब व्यक्ति के भोजन पर कितना खर्च आता होगा? एक राजनेता का कहना है- पांच रुपए, दूसरे का कहना है- 12 रूपए। सस्ते खाने की कीमत पता करने के लिए टीवी चैनल वाले शहर के सारे ढाबों की पड़ताल कर लेते हैं। हैरत की बात नहीं कि उन्हें सस्ते से सस्ते ढाबे में भी 20-25 रूपए से कम कीमत में खाना नहीं मिला। और भारतीय वास्तविकताओं से अनभिज्ञ असंवेदनशील राजनेताओं की आलोचना शुरू हो गई। खुलासा बहुत मनोरंजक था। लेकिन हाय! इसने भी कई तथ्यों को नजर अंदाज कर दिया, और सरल लेकिन प्रमुख गणितीय गलतियां कीं।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

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