खुशहाली

कनाडा के  फ्रेजर इंस्टीट्यूट और नई दिल्ली स्थित सेंटर फार सिविल सोसायटी द्वारा पिछले दिनों जारी की गई विश्व आर्थिक स्वतंत्रता : वार्षिक रपट 2012 दुनिया भर में आर्थिक स्वतंत्रता की स्थिति  के बारे में रपट एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।ईमानदारी से जीवन यापन करने के लिए बिना किसी अनावश्यक दखल के उत्पादन और व्यापार करने की स्वतंत्रता ही आर्थिक स्वतंत्रता का सार है।इसके अंतर्गत आते हैं संपत्ति रखने,उसका उपयोग करने और बेचने का अधिकार ,विवादों का समुचित और शीघ्र समाधान करने और अनुबंधों को लागू करने का अधिकार और जीवन और संपत्ति की संपूर्ण सुरक्षा ताकि हर कोई सुरक्षित और शां

देश के अदिवासियों और पर्यावरण के कई हितैषी और सेंटर फार सिविल सोसायटी जैसी कई संस्थाएं लम्बे समय से बांस को घास घोषित किये जाने के लिए अभियान चलाती रहीं है। बांस समर्थको की मांग रही है कि भारतीय वन कानून (1927) को संशोधित किया जाए और कानून की धारा 2(7) में से बांस को पेड़ों की सूची से हटाया जाए. आखिर क्यों बांस को घास की श्रेणी में रखा जाना चाहिए?

पिछले वर्ष केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर स्पष्ट किया है कि बांस दरअसल घास है न कि इमारती लकड़ी। उनका यह पत्र निश्चित रूप से सार्थक दिशा में उठाया गया एक कदम  था । अब नईं पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने भी बांस के दस हजार करोड़ के व्यापार को पर नौकरशाही के एकाधिकार को खत्म करने के लिए उनके कई एतराजों को खारिज कर उन्होंने बांस को  लघु वन उपज घोषित कर दिया है। इससे आदिवासियों को बांस उगाने और बेचने की अनुमति मिल जाएगी। यदि जयंती नटराजन का फैसला सचमुच जमीनी स्तरपर लागू हो सका तो इससे करोड़ों आदिवासियों के जीव