खाद्य सुरक्षा बिल

वर्ष 2014 में भारत के समक्ष जो सबसे बड़ी संभावना और चुनौती होगी, वह आर्थिक विकास की उच्च दर को वापस लौटाने की होगी, जैसा कि कुछ वर्ष पहले था। यह केवल उच्च विकास ही है जो हमारे देश की सतत समृद्धि को सुनिश्चित करेगी। 2014 के आम चुनावों में हमें अवश्य ही एक ऐसे उम्मीदवार और पार्टी के पक्ष में मतदान करना चाहिए जो विकास को वापस पटरी पर लौटा सके।

Author: 
गुरचरण दास

खाद्य सुरक्षा गारंटी अध्यादेश से सस्ते अनाज की आस लगाए बैठे लोगों पर अब दोहरी मार पड़ रही है। पूर्व की तुलना में समान मात्रा में अनाज पाने के लिए अब उन्हें दो से तीन गुना ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। यह सब हो रहा है सरकार द्वारा मुफ्त अथवा लगभग मुफ्त प्रदान करने के नाम पर। इस सरकारी गुणा-गणित से अंजान मुफ्त में सबकुछ पाने की आस लगाए बैठे लोगों को अब शायद कुछ सदबुद्धि प्राप्त हो। विस्तार से जानने के लिए पढ़ें...

 

गरीबी बड़ी भयानक चीज है। कुछ ही चीजें हैं जो मानवता को इतना नीचा देखने पर मजबूर करें और जीवन की बुनियादी जरूरतें भी पूरी न कर पाना उनमें से एक है।

भारत उन देशों में शामिल है जिन्हें गरीबी का स्वर्ग कहा जा सकता है। हम चाहे तो 1947 के पहले की हमारी सारी गलतियों के लिए अंग्रेजों को दोष दे सकते हैं, लेकिन उन्हें गए भी 67 साल गुजर चुके हैं। हम अब भी दुनिया के सबसे गरीब देशों में से हैं। एशिया में चालीस के दशक में हमारे बराबर गरीबी के साथ शुरुआत करने वाले देशों ने कितनी तरक्की कर ली है।

 

इतने दूर हो गए हैं हमारे राजनेता देश के यथार्थ से कि ऐसा लगता है, उनका भारत कोई और है और हमारा कोई और। उनका भारत अब सीमित है दिल्ली शहर के लुटियंस के इलाके की सीमाओं तक। जब हमारे भारत के दर्शन करने निकलते हैं नेताजी, तब या तो हेलीकॉप्टर में आते हैं या बड़ी-बड़ी विदेशी गाड़ियों के काफिले में सवार होकर। अपने भारत के किसी गांव में जब पहुंचते हैं नेताजी महाराज, तो चमचों से फौरन घिर जाते हैं, जो उनको यथार्थ की झलक तक नहीं देखने देते।

वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी को इन दिनों नींद नहीं आ रही है। वजह है, देश में खाद्य सुरक्षा बिल लागू करने की राह में खर्च होने वाला धन। उन्हें चिंता है कि इससे देश का बजट बढ़ जाएगा और कम से कम १.३४ लाख करोड़ रूपए से २.३४ करोड़ रूपए तक के अतिरिक्त खर्च का बोझ उठाना पड़ेगा। यह बात और है कि खुद कृषि मंत्रालय के खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग का मानना है कि इस प्रक्रिया में वर्तमान बजट में मात्र २७ हजार करोड़ रूपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। अन्य तार्किक अनुमानों की भी माने तो इस प्रक्रिया में ९५ हजार करोड़ से लेकर १.१० लाख करोड़ रूपए का ही खर्च आएगा जो कि कुल जीडीपी का लगभग १.४ प्र