कालाधन

प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा 500 और 1000 के नोट समाप्त करने के फैसले से पहले मैं भी अचंभित हुआ और आनंदित भी। पर कुछ समय तक गहराई से सोचने के बाद सारा उत्साह समाप्त हो गया। नोट समाप्त करने और फिर बाजार में नए बड़े नोट लाने से अधिकतम 3% काला धन ही बाहर आ पायेगा, और मोदी जी का दोनों कामों का निर्णय कोई दूरगामी परिणाम नहीं ला पायेगा, केवल एक और चुनावी जुमला बन कर रह जाएगा। नोटों को इसप्रकार समाप्त करना- 'खोदा पहाड़ ,निकली चुहिया " सिद्ध होगा। समझने की कोशिश करते हैं।

देश में बढ़ते कालेधन (ब्लैक मनी), आतंकवादियों की फंडिंग और जाली करेंसी की समस्या के समाधान के लिए मोदी सरकार ने बीते 8 नवंबर 2016 की रात से 500 और 1000 रूपए के पुराने नोटों को बंद करने की घोषणा कर दी। इस घोषणा के बाद से काले धन का मुद्दा लोकसभा चुनावों के बाद एक बार फिर से चर्चा का केंद्र बन गया है। तमाम विशेषज्ञ इसे कालेधन पर रोक लगाने के क्षेत्र में मोदी सरकार द्वारा उठाया गया मास्टर स्ट्रोक बता रहे हैं वहीं कुछ लोग इसके कारगर साबित होने पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर रहे हैं।

दिल्ली में भाजपा की हार के बाद मोदी सरकार राजनीतिक साहस की कमी से जूझ रही है। इसलिए सरकार में यह साहस नहीं रहा कि वह मनरेगा जैसी नाकाम रोजगार योजनाओं को बंद कर सके। भाजपा को डर है कि अगर उसने इस तरह की योजनाओं को बंद किया तो उन्हें गरीब विरोधी करार दे दिया जाएगा।

एक रिपोर्ट के मुताबिक 2001-2010 के बीच भारत से 123 अरब डालर की रकम अवैध रूप से बाहर ले जाई गई। जिन देशों से सर्वाधिक धन बाहर गया, भारत उनमें आठवें नंबर पर है। ब्रिटिश पत्रिका द इकानोमिस्ट की एक रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि भ्रष्टाचार निरोधक बड़ी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं प्रगति के पथ पर हैं। जी-20 देशों ने 2010 में काले धन पर जो कार्यदल बनाया, उसने उससे कहीं बेहतर काम किया है, जितनी तब आशा की गई थी। बल्कि यह भ्रष्टाचार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र की संधि से अधिक कारगर साबित हुआ है, क्योंकि अभी तक इसमें पश्चिमी देशों और रूस-चीन के बीच वैसे टकराव खड़े नहीं हुए हैं- जैसे संयुक्त राष्

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