कम्यूनिस्ट

जब भी वापस आती हूं वतन किसी विदेशी दौरे के बाद, तो कुछ दिनों के लिए मेरी नजर विदेशियों की नजरों जैसी हो जाती है। बिल्कुल वैसे, जैसे आमिर खान के नए टीवी इश्तिहार में दर्शाया गया है। मुझे भी जरूरत से ज्यादा दिखने लगती हैं भारत माता के 'सुजलाम, सुफलाम' चेहरे पर गंदगी के मुहांसे, गंदी आदतों की फुंसियां और गलत नीतियों के फोड़े।

 

गरीबी बड़ी भयानक चीज है। कुछ ही चीजें हैं जो मानवता को इतना नीचा देखने पर मजबूर करें और जीवन की बुनियादी जरूरतें भी पूरी न कर पाना उनमें से एक है।

भारत उन देशों में शामिल है जिन्हें गरीबी का स्वर्ग कहा जा सकता है। हम चाहे तो 1947 के पहले की हमारी सारी गलतियों के लिए अंग्रेजों को दोष दे सकते हैं, लेकिन उन्हें गए भी 67 साल गुजर चुके हैं। हम अब भी दुनिया के सबसे गरीब देशों में से हैं। एशिया में चालीस के दशक में हमारे बराबर गरीबी के साथ शुरुआत करने वाले देशों ने कितनी तरक्की कर ली है।

विश्व पटल पर मार्क्सवाद, माओवाद व लेनिनवाद के एकमात्र विशुद्ध (अघोषित) झंडाबरदार चीन में विगत तीन दशकों में परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। एक तरफ जहां उदारवाद ने तेजी से पांव पसारे हैं वहीं माओ व माओवाद हाशिए पर पहुंच गया है। वर्तमान चीन व चीनी जनता ज्यादा से ज्यादा धन कमाना चाहती है और वह जान चुकी है कि आर्थिक उदारीकरण ही इसके लिए सर्वश्रेष्ठ उपाय है। हालांकि इसकी नींव डैंग झायोपिंग और जियांग जिमेन के शासनकाल में ही पड़ गई थी और चीन के बुनियादी स्वरूप में बदलाव का आधार तय हो गया था। इसके साथ यह भी स्पष्ट हो गया था कि माओ जिस चीनी लोक गणराज्य को स्थापित किया था उ