कम्युनिस्ट

खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर बहस अंततः समाप्त हो गई। उम्मीद है कि अब इसने उन अन्य गरमागरम बहसों की आत्माओं के बीच अपनी शांतिपूर्ण जगह बना ली होगी, जिनसे हमारा लोकतांत्रिक देश यदा कदा गुजरता रहता है। हर समय लगता है मानो यह हमारे जीवन मरण का मुद्दा हो और हम विनाश के कगार पर खड़ें हों। अगर आप उनमें से हैं, जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के विरोधियों द्वारा की गई बर्बादी की भविष्यवाणियों से डरते हैं तो यहां प्रस्तुत है इसी तरह की पहले हुई कुछ बहसों का छोटा सा इतिहास। यह बताने के लिए कि लाखों भारतीय नौकरी से निकालकर फेंक नहीं दिए जाएंगे। और भारत वॉलमार्ट या टेस्को का उपनिवेश

उस दिन कब्रिस्तान के पास से गुजर रहा था तो लगा कोई कब्र में करवटें बदल रहा है ,कराह रहा है फिर रोने की सी आवाज सुनाई दी । तब मुझसे रहा नहीं गया मैं कब्र के पास पहुंचा और पूछा – अरे भाई कौन हो ,तुम्हें कब्र में भी  चैन नहीं । क्या नाम है तुम्हारा ? जब कुछ देर कोई आवाज नहीं आई तो मैंने फिर पूछा – अरे बताओं कौन हो क्या नाम है तुम्हारा ? शायद मैं तुम्हारी मदद कर सकूं ? तब अंदर से जवाब आया –मेरा नाम है मार्क्स।

मैंने पूछा – कौन ,ग्रुचो मार्क्स।

पिछले दिनों मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमेटी की अत्यंत महत्वपूर्ण  बैठक में पार्टी के विचारधारा संबंधी प्रस्ताव के मसौदे को अंतिम रूप दिया । इस प्रस्ताव को अगले वर्ष होनेवाली पार्टी कांग्रेस में पेश किया जाएगा।पार्टी कांग्रेस ही माकपा की सबसे बड़ी नीति नियंता होती है।इस प्रस्ताव को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि माकपा  बीस साल बाद एक बार फिर विचारधारा संबधी प्रस्ताव तैयार कर रही है।यह बात अलग है कि साम्यवादी आंदोलन के कई जानकार ये मानते हैं कि यह प्रस्ताव वैचारिक लीपापोती ही होगी क्योंकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों में वैचारिक साहसिकता और