कन्या भ्रूण हत्या

लड़कों अथवा पुरुषों में ऐसा क्या है जो हमें इतना अधिक आकर्षित करता है कि हम एक समाज के रूप में सामूहिक तौर पर कन्याओं को गर्भ में ही मिटा देने पर आमादा हो गए हैं। क्या लड़के वाकई इतने खास हैं या इतना अधिक अलग हैं कि उनके सामने लड़कियों की कोई गिनती नहीं। हमने जब यह पता लगाने के लिए अपने शोध कीशुरुआत की कि क्यों वे अपनी संतान के रूप में लड़की के बजाय लड़का चाहते हैं तो मुझे जितने भी कारण बताए गए उनमें से एक भी मेरे गले नहीं उतरा। उदाहरण के लिए किसी ने कहा कि यदि हमारे लड़की होगी तो हमें उसकीशादी के समय दहेज देना होगा, किसी की दलील थी कि एक लड़की अपने माता-पिता अथवा अन्य पर

गर्भ में भ्रूण के लिंग परीक्षण व भ्रूण के कन्या होने की दशा में जन्म लेने से पूर्व ही उसकी हत्या कर देने के कारण देश में पुरूष-महिला लिंगानुपात के बीच की खाई लगातार बढ़ती ही जा रही है। तमाम सरकारी व गैरसरकारी प्रयासों के बावजूद यह खाई कम होने का नाम नहीं ले रही है। विश्व स्तर पर हुए एक हालिया अध्ययन के मुताबिक भारत में प्रति हजार पुरुषों की तुलना में औसतन महिलाओं की संख्या मात्र 940 है। कई राज्यों में तो प्रतिहजार पुरुषों के बनिस्पत महिलाओं की संख्या के बीच 100-120 से ज्यादा का अंतर देखने को मिला है। अर्थात प्रति हजार पुरूषों के मुकाबले मात्र 880 महिलाएं। 2011 में हुई जनग