एफडीआई इन रिटेल

अमेरिका में वॉलमार्ट कंपनी की लॉबिंग की रिपोर्ट पर भारतीय संसद में गतिरोध खड़ा करने वाली पार्टियों का मुद्दा क्या है, इसे सहजता से नहीं समझा जा सकता। अगर वॉलमार्ट या उसकी तरफ से लॉबिंग के लिए नियुक्त कंपनी ‘पैटन बॉग्स’ ने भारत में किसी को रिश्वत दी तो यह आपराधिक मामला होगा। लेकिन प्रारंभिक रूप से इसके कोई संकेत नहीं हैं। वैसे भी एक वकील ने यह मसला सुप्रीम कोर्ट के सामने रख दिया है। सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में उपलब्ध तमाम तथ्यों की रोशनी में अपना फैसला देगा।

मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश की इजाजत के बाद बवंडर सा मचा हुआ है। इंश्योरेंस सेक्टर में विदेशी निवेश की सीमा 26 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत होने पर अलग बवाल है। दो एकदम विपरीत ध्रुवों की राय सामने आ रही है। सरकारी पक्ष कह रहा है कि विदेशी निवेश आने से रोजगार बढ़ जायेगा, उपभोक्ताओं का भला होगा। कोल्ड स्टोरेज बनेंगे। फल अन्न की बरबादी रुकेगी। सरकार विरोधी पक्ष का कहना है कि भारत तबाह हो जायेगा, रोजगार खत्म हो जायेंगे। उपभोक्ता लुट जायेंगे। दोनों ही अतिवादी दृष्टिकोण हैं, रास्ता कहीं बीच से होकर जाता है।

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आलोक पुराणिक

आर्थिक सुधारों के मद्देनजर एफडीआइ के फैसले ने विपक्ष को भले आक्रामक किया हो, लेकिन सरकार ने भी यह तय कर लिया है कि नहीं झुकेगी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी साफ कह दिया है कि देश को वे 1991 की स्थिति में नहीं ले जाना चाहते। उनके इस बयान से सरकार का आत्मविश्वास भी झलक रहा है। तमाम विरोधों के बीच सरकार के बढ़ते कदम यह बताने के लिए काफी हैं कि उसके ऊपर इन विरोधों का कोई असर नहीं होने वाला। आर्थिक सुधार लागू करने के लिए सरकार तटस्थ है और वह करके रहेगी। जानकारों की मानें तो सरकार अभी और कई नए फैसले लेने वाली है, जो देश को हतप्रभ कर सकता है। रिटेल में एफडीआइ को मंजूरी दिए जान

खुदरा व्यवसाय देश में निजी क्षेत्र का सबसे बड़ा उद्योग है। यह खेती के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता क्षेत्र भी है। देश की जीडीपी में लगभग 10 प्रतिशत और रोजगार के अवसर प्रदान करने में 6-7 प्रतिशत हिस्सेदारी खुदरा व्यवसाय की है। लगभग डेढ करोड़ रिटेल आऊटलेट्स के साथ भारत विश्व में सबसे ज्यादा आऊटलेट्स घनत्व वाला देश है। चाहे असंगठित रूप से एक परिवार द्वारा छोटे स्तर पर किया जाने वाले खुदरा व्यवसाय के स्वरूप में हो अथवा संगठित रूप में पिछले दस वर्षों में यह क्षेत्र महत्वपूर्ण विकास का साक्षी बना है। उदारवादी अर्थ व्यवस्था, प्रतिव्यक्ति आय और उपभोक्तावाद में वृद्धि ने बड