ऋण

केंद्र सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा कानून को लोकसभा और राज्यसभा में पारित करा लेने के साथ अर्थव्यवस्था में कोहराम मचा है। यह ठीक ही है। सरकार के पास वर्तमान खर्च को पोषित करने के लिए राजस्व नहीं हैं। ऋण के बोझ से सरकार दबी जा रही है। वर्तमान में केंद्र सरकार का कुल खर्च लगभग 12 लाख करोड़ रुपये है, जबकि आय मात्र सात लाख करोड़ रुपये। लगभग आधे खर्चे को ऋण लेकर पोषित किया जा रहा है। ऐसे में खाद्य सुरक्षा कानून का लगभग 1.3 लाख करोड़ रुपये प्रतिवर्ष का बोझ अपने सिर पर लेना अनुचित दिखता है। फिर भी गरीबों को राहत देने के इस प्रयास का समर्थन करना चाहिए।

गरीबों की मदद के नाम पर अमीरों को सब्सिडी बांटने की अनोखी मिसाल बन गया था सस्ता डीजल

डीजल के दाम बढ़ाने के निर्णय के पीछे गहराता वित्तीय संकट दिखता है। अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों ने भारत की रेटिंग घटा दी है क्योंकि सरकार का वित्तीय घाटा बढ़ रहा है। इसका प्रमुख कारण पेट्रोलियम सब्सिडी का बढ़ता बिल है। टैक्स वसूली से सरकार की आय कम हो और खर्च ज्यादा हो तो अंतर की पूर्ति के लिए सरकार को ऋण लेने होते हैं। साथ-साथ ब्याज को बोझ बढ़ता है। ऐसे में हाइवे और मेट्रो जैसे उत्पादक खर्चों के लिए सरकार के पास रकम कम बचती है।

सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा को लेकर जब भी हमारे देश में राज्य सरकारों से जबाव तलब किया जाता है तो उनका दावा होता है कि उनके यहां अब यह समस्या बिल्कुल नहीं। इस कुप्रथा का नामो निशान मिट गया है और इन सफाई कर्मियों का उन्होंने अपने यहां पूरी तरह पुनर्वास कर दिया है, लेकिन इन दावों में कितनी सच्चाई और कितना झूठ है, यह हाल ही में हमारे सामने निकलकर आया। साल 2011 की जनगणना के आंकड़े इन दावों की हवा निकाल रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, 50 फीसद भारतीय खुले में शौच को जाते हैं और 13 लाख ऐसे अस्वच्छ शौचालयों का इस्तेमाल करते हैं, जिनकी साफ-सफाई का जिम्मा आज भी घोषित और अघोषित रूप से