उद्योग धंधे

जब भी वापस आती हूं वतन किसी विदेशी दौरे के बाद, तो कुछ दिनों के लिए मेरी नजर विदेशियों की नजरों जैसी हो जाती है। बिल्कुल वैसे, जैसे आमिर खान के नए टीवी इश्तिहार में दर्शाया गया है। मुझे भी जरूरत से ज्यादा दिखने लगती हैं भारत माता के 'सुजलाम, सुफलाम' चेहरे पर गंदगी के मुहांसे, गंदी आदतों की फुंसियां और गलत नीतियों के फोड़े।

देश का औद्योगिक परिदृश्य बेहद निराशाजनक है। नवंबर, 2013 के औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) के आंकड़े 2008-09 में आई वैश्विक मंदी जैसे चिंताजनक स्तर पर पहुंच गए हैं। ऐसे में, मौजूदा वित्त वर्ष के औद्योगिक उत्पादन में बहुत मजबूती की उम्मीद नहीं की जा सकती है। पिछले छह महीनों में खासकर महंगे उपभोक्ता सामान का उत्पादन घट जाने के चलते ही ऐसी स्थिति देखने को मिली है। अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम द्वारा जारी नई विश्व कारोबारी परिदृश्य रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कारोबार शुरू करने के लिए 12 प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, जबकि दक्षिण एशियाई देशो

आखिरकार केंद्र सरकार कोयला खदानों के आवंटन के मामले में यह मानने के लिए विवश हुई कि उससे किसी न किसी स्तर पर गलती हुई, लेकिन किसी मामले में केवल सच को स्वीकार करना पर्याप्त नहीं। सच्चाई स्वीकार करने से समस्या का समाधान नहीं होता। कोयला खदानों के आवंटन में गलती के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए, क्योंकि कोयला खदानों का आवंटन कुछ ज्यादा ही मनमाने तरीके से किया गया और इसी के चलते इस प्रक्रिया ने एक घोटाले का रूप ले लिया।

वॉशिंगटन डीसी में भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु एक सच बात कह गए। उन्होंने वहां उपस्थित अपने श्रोताओं से कहा कि उनकी सरकार की निर्णय क्षमता पंगु हो चुकी है और २०१४ के चुनावों तक किसी तरह के सुधारों की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। अलबत्ता, बाद में उन्होंने इस बयान का खंडन किया, क्योंकि इससे उन्हीं की सरकार की फजीहत हो रही थी, लेकिन सच्चाई तो यही है कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा, जो भारत में पिछले दो सालों से नहीं कहा जा रहा था। वॉशिंगटन में बसु के श्रोता हैरान थे कि भारत जैसा जीवंत लोकतंत्र, जो एक उभरती हुई आर्थिक ताकत है और जिसकी सिविल सोसायटी ऊर्जावान है, की स

Author: 
गुरचरण दास