उद्योग

देश का औद्योगिक परिदृश्य बेहद निराशाजनक है। नवंबर, 2013 के औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) के आंकड़े 2008-09 में आई वैश्विक मंदी जैसे चिंताजनक स्तर पर पहुंच गए हैं। ऐसे में, मौजूदा वित्त वर्ष के औद्योगिक उत्पादन में बहुत मजबूती की उम्मीद नहीं की जा सकती है। पिछले छह महीनों में खासकर महंगे उपभोक्ता सामान का उत्पादन घट जाने के चलते ही ऐसी स्थिति देखने को मिली है। अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम द्वारा जारी नई विश्व कारोबारी परिदृश्य रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कारोबार शुरू करने के लिए 12 प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, जबकि दक्षिण एशियाई देशो

अगर आप जमीन की तरफ ही देखते रहें तो आपको इंद्रधनुष कभी नहीं दिखेगा। भारतीय वित्तीय बाजार अब चार्ली चैपलिन के इस सूत्र को मंत्र की तरह जप रहा है। पिछले तीन सालों में यह पहला वर्षात है जब भारत के बाजार यंत्रणाएं भूलकर एकमुश्त उम्मीदों के साथ नए साल की तरफ बढ़ रहे हैं। सियासी अस्थिरता और ऊंची ब्याज दरों के बीच बल्लियों उछलते शेयर बाजार की यह सांता क्लाजी मुद्रा अटपटी भले ही हो, लेकिन बाजारों के ताजा जोशो खरोश की पड़ताल आश्वस्त करती है कि किंतु-परंतु के बावजूद उम्मीदों का यह सूचकांक आर्थिक-राजनीतिक बदलाव के कुछ ठोस तथ्यों पर आधारित है।

बांस के पेड़ की बजाए घास होने के तथ्य के वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित और संवैधानिक तौर पर स्वीकृत हो जाने के बावजूद नौकरशाही और पहले से जारी व्यवस्था के कारण अब तक इसे घास के रूप वैधानिक मान्यता नहीं मिल सकी है। जिसके कारण इसकी कटाई और व्यवसायिक प्रयोग की मनाही है। यदि इसे घास के रूप में पर्यावरण और वन मंत्रालय से वैधानिक मान्यता मिल जाती है तो देश में न केवल हरे वृक्षों की कटाई में कमी आएगी बल्कि इसके सहारे आजिविका कमाने वाले लाखों आदिवासियों व जंगल पर निर्भर जनजातियों को व्यवसाय भी उपलब्ध हो सकेगा। यहां तक कि स्वयं योजना आयोग का भी मानना है कि इससे 5 करोड़ लोगों के रोजगार