उत्पादक

थैचरिज्म सरकार, बाजार व नागरिक संगठनों की उपयुक्त भूमिका वाले दर्शन पर आधारित था। सरकार को केवल उन्हीं कार्यों को करना चाहिए जो बाजार व नागरिक संगठन प्रभावी ढंग से नहीं कर सकते। और मुक्त प्रतियोगिता बाजार का बेहतर नियामक और उपभोक्ताओं का बेहतर संरक्षक है।

जब भी दिल्ली में आम उपभोक्ता सब्जियों की महंगाई को लेकर हायतौबा मचाते हैं तो अक्सर सरकार राजधानी की सबसे बड़ी थोक मंडी आजादपुर में खरीदी जाने वाली सब्जियों के थोक भावों का विज्ञापन छपवाती है। पिछले कई सालों से इन विज्ञापनों को जिन्होंने भी देखा है, वे जानते हैं कि इनसे साफ पता चलता है कि आज तक किसान को कभी भी पालक के लिए 10 रुपये किलो का रेट नहीं मिला। बथुआ, गोभी कभी भी सीजन में 10 रुपये किलो से ऊपर यहां किसानों से नहीं खरीदी गई। मूली के भाव सुनकर तो लगता है, जैसे हम रामराज में जी रहे हों। डेढ़ रुपये, दो रुपये किलो अक्सर मूली बिकती है।

खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को लेकर इन दिनों देश में बहस का दौर जारी है। इससे ग्राहकों, स्थानीय खुदरा कारोबारियों और खुदरा कारोबार के वैश्विक दिग्गजों के हित जुड़े हों तो बहस होना स्वाभाविक ही है। पिछले कई साल से इस पर बातचीत जारी है लेकिन इस दौरान कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया है। फिलहाल औद्योगिक नीति एवं संवद्र्घन विभाग (डीआईपीपी) ने एफडीआई से जुड़े जिन व्यापक मुद्दों पर चर्चा पत्र पेश किया है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। इसके जरिये विभाग ने सभी अंशधारकों का पक्ष जानने की कोशिश की है।