अराजकतावाद

कहा जा सकता है कि अराजकतावाद का लक्ष्य मस्तिष्क को धर्म की अधीनता से, शरीर को संपत्ति की गुलामी से तथा उसकी मानव-स्वातंत्रय को सरकार की हड़कड़ियों, बेड़ियों और अन्यान्य बंधनों से मुक्त कराना है. इस लक्ष्य को पाने के लिए वह नागरिक चेतना का पक्ष लेता है. यह मनुष्य के स्वेच्छिक समूहों के गठन के प्रति आग्रहशील होता है, जो समाजकल्याण की व्यापक लक्ष्य के लिए समूहबद्ध होते हैं. यह मानते हुए कि मनुष्य स्वतंत्र जन्मा है तथा उसको अपनी रुचि के अनुरूप सुखोभोग के सभी अधिकार प्राप्त हैं. इसलिए आवश्यक है कि उसपर न्यूनतम नियंत्रण हों.

अराजकतावाद आज का दर्शन नहीं है. भले ही मानवेतिहास में लंबा दौर ऐसा रहा हो जब इसको हेय और निंदात्मक दृष्टि से देखने वालों की खासी संख्या रही हो. लेकिन लगभग प्रत्येक युग और कालखंड में राजसत्ता और धर्मसत्ता समेत किसी भी प्रकार की सत्ता पर प्रश्न उठाने वाले लोग समाज में हुए हैं. भारतीय धर्मग्रंथों में सतयुग भले ही मिथकीय कल्पना हो, लेकिन उसमें भी ‘राज्यविहीन समाज’ की परिकल्पना की गई है. ‘वैराज’ अर्थात ‘बिना राजा का राज्य’ यहां सम्मानित शास्त्रीय परिकल्पना का हिस्सा रहा है. ऋग्वेद में कहा गया था—‘मनुर्भव!

मध्यकाल में अराजकतावादी दर्शन की झलक मार्को जिरोलमो वाइड के विचारों में देखने को मिलती है. अराजकतावाद और स्वाधीनतावाद के बारे में विस्तृत विमर्श हमें सोलहवीं शताब्दी के फ्रांस के दूरद्रष्टा कवि-दार्शनिक ला बूइटी(1530—1563) के साहित्य में भी प्राप्त होता है. उसने स्वाधीनतावाद के पक्ष में जोरदार तर्क दुनिया के सामने रखे. क्रीटवासी जीनो से प्रभावित बूइटी का विचार था कि तानाशाही चाहे वह बलपूर्वक स्थापित की गई हो, अथवा किसी अन्य माध्यम से, बड़े से बड़ा तानाशाह केवल उस समय तक सत्ता शिखर पर बना रह सकता है, जब तक कि जनता उसको वहां बनाए रखना चाहती है.