कमेन्टरी - स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर

स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर

इस पेज पर स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर के लेख दिये गये हैं। ये लेख शीर्ष बिजनेस अखबारों में स्वामीनॉमिक्स कॉलम में प्रकाशित होते हैं।

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आर्थिक सुधार स्पष्ट और सरल होने चाहिए। तमाम शर्तों के उलझाव से बंधे हुए नहीं। यूपीए सरकार इस बात को काफी पहले भूल चुकी है। वह तो सबको साथ लेकर चलने के नाम पर हर बदलाव से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहती है कि इसके जरिये कितने वोट बैंकों को संतुष्ट कर पाएगी। यह नजरिया भूमि अधिग्रहण बिल जैसे सबसे जरूरी बदलावों को भी बहुत सारी शर्तों, लटकाऊ जुगाड़ों और लालफीताशाही के बीच उलझा देता है। ऐसे में आरबीआई के नए गवर्नर रघुराम राजन के बैंकिंग सुधार ताजी हवा के झोंके जैसे हैं। उन्होंने कहा कि कोई भी बैंक अपनी नई शाखा...

Published on 16 Sep 2013 - 19:28

एक गरीब व्यक्ति के भोजन पर कितना खर्च आता होगा? एक राजनेता का कहना है- पांच रुपए, दूसरे का कहना है- 12 रूपए। सस्ते खाने की कीमत पता करने के लिए टीवी चैनल वाले शहर के सारे ढाबों की पड़ताल कर लेते हैं। हैरत की बात नहीं कि उन्हें सस्ते से सस्ते ढाबे में भी 20-25 रूपए से कम कीमत में खाना नहीं मिला। और भारतीय वास्तविकताओं से अनभिज्ञ असंवेदनशील राजनेताओं की आलोचना शुरू हो गई। खुलासा बहुत मनोरंजक था। लेकिन हाय! इसने भी कई तथ्यों को नजर अंदाज कर दिया, और सरल लेकिन प्रमुख गणितीय गलतियां कीं।

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Published on 12 Aug 2013 - 20:49
दुनिया जबकि साम्यवाद के पतन की 20वीं वर्षगांठ मना रही है, कई विश्लेषकों को याद होगा कि कैसे सोवियत नीतियों की नाकामी ने सरकार को उत्पादन पर ज्यादा अधिकार दे दिया था और साम्राज्यवादी जाल की संज्ञा देकर कैसे विदेश व्यापार और निवेश को हतोत्साहित किया जाता था। भारत जैसे विकासशील देशों ने भी ऐसी ही नीतियों को अपनाया था, जो साम्यवादी नहीं समाजवादी थे। 1930 के दशक में सोवियत संघ द्वारा हासिल आर्थिक मजबूती का भारत कायल था। दरअसल वह दौर पश्चिमी देशों में महामंदी का था।
 
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Published on 5 Aug 2013 - 19:25

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