सेरोगेसी (विनियमन) विधेयक 2019 निजी स्वतंत्रता का उल्लंघन!

विधेयक लोकसभा से जुलाई 2019 में पास होने के बाद राज्यसभा में भेजा गया जहां सांसदों की तीखी बहस के बाद इसे सिलेक्ट कमिटी को स्थानांतरित किया गया है। किराए की कोख यानी सेरोगेसी पर कानून बन जाने के बाद  भारत में वाणिज्यिक सेरोगेसी को अवैधानिक कर दिया जाएगा। भारत में अब सिर्फ परोपकारी सरोगेसी ही मान्य होगी अर्थात आर्थिक लाभ के उद्देश्य से ऐसा किया जाना गैरकानूनी होगा।

सेरोगेसी बिल के अनुसार सेरोगेसी का अर्थ ‘ऐसा कोई व्यवहार जिसके द्वारा कोई स्त्री किसी दंपत्ति के शिशु को इस आशय के साथ अपने गर्भ में रखती है कि जन्म के पश्चात उस शिशु को दंपत्ति को सौंप देगी।‘ वाणिज्यिक सरोगेसी को अवैधानिक घोषित करने के बाद भारत ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फ्रांस, जर्मनी व जापान जैसे देशों के समूह में खड़ा हो जाएगा जिन्होंने इसे पहले ही अवैधानिक करार दिया है।

सेरोगेसी विधेयक का इतिहास
भारत में सेरोगेसी कानून पर चर्चा दो दशक पुरानी है। 1998 में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने इस विषय पर चर्चा की शुरुआत की तथा समय समय पर सेरोगेसी से संबंधित दिशा निर्देश जारी किए। उसके बाद वर्ष 2016 में तत्कालीन विदेशमंत्री सुषमा स्वराज की अध्यक्षता में विभिन्न मंत्रालयों से विस्तृत चर्चा कर इसका मसौदा तैयार किया जिसका मुख्य उद्देश्य वाणिज्यिक सेरोगेसी को पूर्णतया बंद कर अवैधानिक घोषित करना था।

सरकार के कई प्रयासों के बाद जुलाई 2019 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन ने लोकसभा में सेरोगेसी (विनियमन) विधेयक, 2019 को पेश किया। लोकसभा से पारित होकर यह बिल नंवबर 2019 में राज्यसभा में पेश हुआ जहां पर सांसदों द्वारा तिखी बहस के बाद यह सिलेक्ट कमिटी के स्थानांतरित किया गया।

भारत में सेरोगेसी पर विस्तृत चर्चा 2008 में बेबी मांझी यमादा मामले के बाद हुई। मामला यह था कि जापान की एक दंपत्ति सेरोगेसी के लिए भारत आए और उन्होंने गुजरात के आनंद में सेरोगेसी करायी। बच्चे के जन्म के दौरान ही जापान के दंपत्ति का तलाक हो गया। दोनों ने बच्चा लेने से मना कर दिया। परिणाम स्वरूप भारत में सहायता प्राप्त प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) विधेयक 2014 अमल में आया। जो यह प्रावधान करता है कि यदि कोई विदेशी दंपत्ति भारत में सेरोगेसी करवाना चाहता है तो उसे विदेशी दंपत्ति को विवाहित होना जरूरी है और उनके वैवाहिक जीवन को 2 साल पूरे हो चुके हों।

भारत में सर्वाधिक सेरोगेसी गुजरात राज्य में होने लगी और गुजरात का आणंद शहर सेरोगेसी का हब बन चुका था। इसके माध्यम से गरीब महिलाओं की आमदनी में इजाफा हुआ और उनकी आजीविका में सुधार हुआ।

भारत में सेरोगेसी का कारोबार
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत में कुल सेरोगेसी के तीन हजार प्रजनन केंद्र स्थापित हैं, जिनका सालान कारोबार लगभग 4 मिलियन डॉलर्स है। पूर्व स्वास्थ्य मंत्री (राज्य) अनुप्रिया पटेल के एक बयान के मुताबिक तो देश में तकरीबन 2 बिलियन डॉलर्स का अवैध धंधा सेरोगेसी के नाम पर हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार तकरीबन 50 प्रतिशत से ज्यादा विदेशी दंपत्ति सेरोगेसी के लिए भारत आते हैं जिसका मुख्य कारण भारत में अन्य देशों की तुलना में सेरोगेसी प्रक्रिया का सस्ता होना है।

सेरोगेसी कानून के प्रावधान
सेरोगेसी कानून वाणिज्यिक सेरोगेसी को अवैधानिक घोषित करता है। सिर्फ परोपकारी सेरोगेसी की अनुमति हैं जिसमें चिकित्सा शुल्क को छोड़कर किसी प्रकार के आर्थिक लेनदेन पर रोक है। यदि कोई दंपत्ति सेरोगेसी कराना चाहता है तो उसे जिला स्तर पर गठित बोर्ड से दोनों या किसी एक की इंफर्टिलिटी सर्टिफिकेट तथा बच्चे की कस्टडी और सेरोगेट्स पालक के बारे में जानकारी देता प्रमाणपत्र जो न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किया गया हो, प्राप्त करना होगा।

सेरोगेसी के लिए दंपत्ति का भारत का नागरिक होने के साथ ही 5 साल से विवाहित होना चाहिए और पुरूष की आयु 26 से 55 वर्ष जबकि महिला की आयु का 23 से 50 वर्ष होना आवश्यक है। सेरोगेट मदर्स की आयु 25 से 35 वर्ष होनी चाहिए और वह अपने जीवन काल में सिर्फ एक बार ही सेरोगेट मदर बन सकती है। सेरोगेट मदर का बच्चा चाहने वाले दंपत्ति का करीबी रिश्तेदार होना भी आवश्यक है लेकिन विधेयक में कहीं भी करीबी रिश्तेदार को परिभाषित नहीं किया गया है।

केंद्र और राज्य सरकारें क्रमशः राष्ट्रीय सेरोगेसी बोर्ड और राज्य सेरोगेसी बोर्ड का गठन करेंगी जो सेरोगेसी चिकित्सालय के लिए आचार संहिता बनाएगा। विधेयक के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर 10 लाख रूपए के जुर्माने के साथ साथ 10 साल तक के कारावास का प्रावधान है।

सेरोगेसी कानून के दुष्प्रभाव
सेरोगेसी कानून आने के बाद विदेशी दंपत्ति सेरोगेसी के लिए भारत नहीं आ सकेंगे जिससे देश में मेडिकल टूरिज्म काफी कम हो जाएगा। कानून के जटिल प्रावधान अविवाहित दंपत्ति, सिंगल पेरेंट्स, होमोसेक्सुअल, विधवा व लिव इन पार्टनर को सेरोगेसी की अनुमति प्रदान नहीं करते हैं। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हैं जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार (राइट टू लाइफ एंड पर्सनल लिबर्टी) का प्रावधान करता है। इसके अलावा भारत में लिव इन रिलेशन पर घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के प्रावधान लागू होते हैं परंतु सेरोगेसी एक्ट उनपर लागू नहीं होता यानी देश का एक कानून उनपर लागू होना और उसी देश का दूसरा कानून उन पर लागू नहीं होना यह दर्शाता है कि यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

- अवतार सिंह पंवार
लेखक गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, इंदौर के फाइनल ईयर के छात्र है। ये लेखक के निजी विचार हैं और आजादी.मी का उपरोक्त विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं है।