सर्ज प्राइसिंग और सरकारी हस्तक्षेप

गत दिनों दिल्ली सरकार के नीतिगत फैसलों में परस्पर विरोधाभाष पैदा करतीं दो ख़बरें मीडिया में आईं। बीस अप्रैल को मीडिया में एक खबर आई कि ऑड-इवन के दौरान निजी टैक्सी कम्पनियों द्वारा सर्ज-प्राइसिंग अर्थात मांग और आपूर्ति के आधार पर कैब कम्पनियों द्वारा किराया तय किये जाने को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री बहुत नाराज हैं। मुख्यमंत्री द्वारा इसे खुली लूट बताते हुए इसपर हमेशा के लिए प्रतिबन्ध लगाने की भी बात ख़बरों के माध्यम से सामने आई। इस खबर के ठीक दो दिन बाद एक दूसरी खबर यह आई कि दिल्ली सरकार ऐप आधारित प्रीमियम बस सेवा शुरू करने वाली है। दिल्ली सरकार के परिवहन मंत्री द्वारा २२ अप्रैल को ऐप आधारित बस सेवा शुरू करने की घोषणा की गयी।

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित इस खबर के मुताबिक़ दिल्ली के परिवहन मंत्री गोपाल राय ने बताया कि जिन बस मालिकों की बसें इसके तहत चलेंगी, उनका भी ओला और उबर जैसी टैक्सी कम्पनियों की भांति ही अपना व्यक्तिगत ऐप होगा तथा उन्हें अपना किराया तय करने की आजादी होगी, लेकिन यदि जरूरत महसूस हुई तो सरकार किराये की उपरी सीमा तक करेगी या फिर मुनाफाखोरी पर रोक के लिए कदम उठाएगी। खबर के मुताबिक़ इस योजना के संबंध में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की बैठक में फैसला किया गया। अब इन दोनों ख़बरों के बीच का विरोधाभाष सहज स्पष्ट होता है।

प्रथम दृष्टया यह सवाल उठता है कि अगर सरकार की नीति सर्ज प्राइसिंग के खिलाफ है तो फिर इन बसों को लेकर उसका रुख दोहरा क्यों है? दूसरा और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अगर सरकार बस मालिकों को सर्ज प्राइसिंग की इजाजत देने को तैयार है तो भला इन टैक्सी कम्पनियों से सरकार को दिक्कत क्यों है? सर्ज प्राइसिंग से जुड़े इस पूरे मामले की पड़ताल करें तो कई ऐसे उदाहरण सामने आयेंगे जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि सरकार अपने लिए सर्ज प्राइसिंग का इस्तेमाल करती है, इसके अलावा कई सेवाओं में सर्ज प्राइसिंग का इस्तेमाल बखूबी होता है। मसलन, एयरलाइंस और रेल सेवा दो महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। सर्ज प्राइसिंग का सीधा अर्थ इस बात से है कि आकस्मिक जरुरत के समय सेवा प्रदाता कीमत तय करता है। अब अगर रेल सेवा की बात करें तो रेल सेवा में दो स्तरों में पर सर्ज प्राइसिंग होती है। पहला है तत्काल सेवा एवं दूसरा है प्रीमियम अथवा सुविधा स्पेशल ट्रेनें। चूँकि रेल सेवा में अभी भारतीय रेल ही एक मात्र सेवा प्रदाता है और इस परिवहन में अभी कोई दुसरी सेवा प्रदाता कंपनी है नहीं, ऐसे में भारतीय रेल द्वारा तत्काल टिकट उपलब्ध कराने के लिए तय किराए से अधिक लिया जाता है।

तत्काल सेवा के नाम पर कानूनी ढंग से लिया जाना अधिक किराया भी सर्ज प्राइसिंग ही है। हालांकि इससे भी एक कदम आगे बढ़कर पिछले कुछ वर्षों में रेलवे द्वारा प्रीमियम ट्रेनों के नाम पर सर्ज प्राइसिंग की जाती रही है। पिछली संप्रग सरकार के दौरान एक प्रीमियम ट्रेन शुरू की गयी थी। इसका किराया पूर्व में तय नहीं होता था। इसका किराया बिलकुल टिकट कराते समय तय होता था और उसी दौरान रेलवे किराया तय करती थी। ऐसी ट्रेने आज भी सुविधा स्पेशल अथवा प्रीमियम नाम से चल रही हैं। इन ट्रेनों के लिए अगर आप ऑनलाइन टिकट लेते हैं तो भुगतान के समय वो किराया दो गुने से चार गुना तक हो सकता है। लिहाजा सर्ज प्राइसिंग का यह एक बड़ा उदाहरण है, जो कि सरकारी प्रदाता द्वारा जनता पर लगाया जाता है। इस मामले दूसरा उदाहरण हवाई सेवा का है। हवाई सेवा में तो किराया तय ही सर्ज प्राइसिंग से होता है। आप महीनों पहले टिकट करा लीजिये तो कम और आकस्मिक टिकट लेने जाइए तो टाइम, घंटे और दिन के हिसाब से सेवा प्रदाताओं द्वारा किराया वसूला जाता है। हालांकि हवाई सेवाओं में निजी कम्पनियों के होने से प्रतिस्पर्धा की वजह से पहले की तुलना में किराया लगातार कम होता रहा है। आज भी इंडियन एयरलाइंस की तुलना में कई निजी कम्पनियां कम किराया लेती हैं। इस किस्म की प्रतिस्पर्धा अभी रेल सेवाओं में नहीं है।

अब बात करते हैं कि सर्ज प्राइसिंग को प्रतिबन्धित करने की। बजाय अगर इसकी अनुमति रखी जाय तो क्या नुकसान है? आमतौर पर एक जो नुकसान आम जनता के दिमाग में आता है वो ये है कि अगर प्रतिबन्ध नहीं लगा तो ये टैक्सी कम्पनियां मनमाना किराया वसूलने लगेंगी। लेकिन जो लोग ऐसा सोचते हैं उनको सरकारी सर्ज प्राइसिंग का ख्याल नहीं रहता, जबकि सच्चाई यही है कि सरकारें अपनी सेवाओं में सर्ज प्राइसिंग करने में पीछे नहीं हैं। यूरोपीय देशों में ज्यादातर सर्ज प्राइसिंग मार्केट के हाथों में है। वहां टैक्सी लोग तभी लेते हैं जब वाकई उन्हें जरूरत होती है वर्ना वहां के लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट का प्रयोग ज्यादा करते हैं।

यहाँ सरकार की दिक्कत यह है कि वो पब्लिक ट्रांसपोर्ट, जिसको अपने कब्जे में रखी है, उसको अभी उस ढंग से बेहतर  नहीं कर पाई है। बावजूद इसके अगर दिल्ली अथवा किसी अन्य शहर में टैक्सियों को सर्ज प्राइसिंग की छूट दी जाय तो दो तरह के परिणाम आ सकते हैं। पहला कि लोग तभी इनका उपयोग करेंगे जब कोई और विकल्प न हो। दूसरा डिमांड में कमी होने पर ये कम्पनियां खुद कम किराया वसूलने लगेंगीं। लेकिन जब सरकार खुद किराया तय करने लगती है तो ये दोनों ही विकल्प नहीं बचते हैं। किराया कम होगा या ज्यादा यह मांग और खपत पर निर्भर करता है। मांग कम हो जायेगी तो किराया बढेगा इसकी सम्भावना कम है। अगर किराया बढ़ा भी तो टैक्सियों की संख्या में जरुर कम होगी क्योंकि कोई भी कम्पनी किराया बढाने की शर्त पर भारी संख्या में खाली टैक्सियाँ नहीं उतार सकती हैं। लेकिन जब सरकार किराया तय करती है तो ये सारे विकल्प मांग और खपत से निकलकर सरकार के पाले में चले जाते हैं और फिर समस्या का समाधान उस रूप में नहीं मिलता, जिस रूप में मिलना चाहिए। कहीं न कहीं सरकार को यह सोचना होगा कि यह प्रतिबन्ध का नहीं बल्कि प्रबन्धन का मसला है। जिस नीति से ट्रांसपोर्ट में सुधार हो वह नीति लागू किया जाय बजाय कि प्रतिबन्ध लगाने के। सेवा क्षेत्र में प्रतिबन्ध ज्यादातर समस्याएं पैदा करता है न कि समाधान देता है।

- शिवानंद द्विवेदी, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।