भारत विश्व की एक महाशक्ति बन सकता है बशर्तें.....

इन दिनों तमाम पत्र-पत्रिकाओं में लगातार ही भारत के एक महाशक्ति बनने के कयास लगाये जाते हैं. महाशक्तिमान अमेरिका को चुनौती देते चीन से उसकी तुलना भी की जाती है, मगर भारत की इस महत्वकांक्षा में सबसे बडा रोडा भारत खुद ही है और अगर यह देश अपनी कतिपय किन्तु महत्वपूर्ण खामियों को दूर करने का प्रयास नहीं करेगा तो महाशक्ति बनना बहुत दूर की बात लगती है. मज़े की बात ये है कि कमजोरियां इतनी खुल्लमखुल्ला हैं कि उन्हें आंख मूंदकर भी जाना जा सकता है, बशर्ते हम अपने भीतर ईमानदारी से झांकने को तैयार हों.

  • पहला, भारत के राजनेताओं में देश के प्रति ममत्व का अभाव तथा दूरदर्शिता की कमी - विगत कई वर्षों से यह देखा जा रहा है, तरह-तरह की खिचडी सरकारों ने अपने असुरक्षा-बोध के कारण देश के खज़ाने को निर्ममतापूर्वक तथा निहायत ही बेशर्मीपूर्वक ऐसा लूटा है,जिसकी की मिसाल ही नहीं मिलती. अपने इसी असुरक्षाबोध के कारण उन्होने अपने शासन के दौरान धन कमाने के बाद बचे-खुचे समय में भी बजाय शासन करने के एक-दूसरे की टांग-खिंचाई ही की. ऐसे में देश के लगभग सभी राज्यों की प्रशासनिक व्यवस्था प्राय: चूल्हे में जा गिरी और आर्थिक व्यवस्था पर तो जैसे घुन ही लगा जा रहा है. हर कोई बस अपना-अपना हिस्सा बांटने के लिए या हिस्सा सुरक्षित करने के लिये सत्ता में भागीदार बन रहा है.
  • दूसरा, भारत के व्यापारी वर्ग की आत्मरत भरी बनियावृत्ति - भारत का व्यापारी वर्ग,चाहे वो किसी भी जात-वर्ग या धर्म-विशेष का ही क्यों ना हो,उसकी वृत्ति आज भी प्राचीन काल की तरह आत्मलीन-आत्मरत और स्वार्थ से ओत-प्रोत रहते हुए अपने हितों की रक्षा करने हेतु शासक-वर्ग की चिरौरी करना रही है.इस स्थिति में आज इतना फ़र्क अवश्य आ गया है कि इस ग्लोबल युग में बडे-बडे उद्योगपति सत्ता की वैसी चिरौरी नहीं करते, बल्कि सरकारों को अपने राज्य और देश के विकास के लिए उन उद्योगपतियों की राह में आगे चलकर फूल बिछाने पडते हैं. आज के दौर में सत्ता और बडे व्यापारी और उद्योगपति एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं. दोनों ही एक-दूसरे का दोहन करते हैं और इसका परिणाम कभी नंदी-ग्राम, सिंगूर तो कभी उडीसा-झारखंड के विभिन्न हिस्सों में पैदा हुई हिंसा के रूप में दिखाई देता है. इसका अर्थ यह भी है कि भारत का सत्ता-तंत्र भारत के विकास में यहां के आम लोगों को विश्वास में लेने का हिमायती नहीं है.
  • तीसरा, विकास की किसी समुचित अवधारणा का नितान्त अभाव - भारत के विकास में किसी भी भारतीय में विकास का कोई खाका, कोई मानचित्र, कोई रास्ता, कोई सोच या किसी भी किस्म की समुचित अवधारणा का सर्वथा अभाव है या यूं कहे कि भारत कैसा हो, ऐसा सपना भारत के किसी नागरिक के मन में पलता दिखाई नहीं देता और मिलाजुला कर कोई एक खाका खींच पाने को कोई व्यक्ति, समूह तत्पर हो भी नहीं दिखता. विकास-विकास का रट्टा हमारे चारों तरफ़ चल रहा है लेकिन यह तय नहीं है कि कितने समय में क्या करना करना है
  • चौथा, इस अदूरदर्शिता के कारण घट सकने वाले संकट को देख पाने में असमर्थता - अपनी इस अदूरदर्शिता की वजह से पहले आओ-पहले पाओ की संस्कृति पनपी हुयी है. काम को लोग अमली जामा बाद में पहनाएं या ना पहनाएं मगर तरह तरह की शर्तें और डिमांड पहले धर देते हैं. इतनी जमीन चाहिए, इतनी बिजली, इतना पानी, इतने सस्ते मज़दूर, इतनी दूर या पास आदी. फ़ैक्टरी के नाम और स्थानीय लोगों को रोजगार देने के नाम पर ली गयी तमाम रियायतों के बावजूद होता ठीक इसका उलटा ही है, यानी नियमों की धज्जिया उडाना, कायदे-कानूनों को ताक पर रखना. स्थानीय लोगों को रोजगार तो क्या, कभी फ़ैक्टरी के दर्शन तक नसीब नहीं हो पाते.
  • पांचवा, आम भारतीय जन की काहिली और गप्पबाजी की खतरनाक आदत - यह एक मुद्दा हमें कोसों पीछे ढकेल सकता है अगर इसके प्रति हम सचेत नहीं हुए कि हम आम भारतीय भौगोलिक कारणों से या फिर अपनी जन्मजात काहिली की आदत के कारण पीछे हैं. मज़ा यह कि हमारी यह आदत हमें तो क्या किसी को बुरी आदत के रूप में दिखाई नहीं देती. काम के दौरान की जाने वाली व्यर्थ की बातों के कारण किस प्रकार मिनटों का काम घंटों में तब्दील हो जाता है, इसे देखने का होश शायद अब तक किसी को नहीं है. ये भी संभव हो कि इसे समस्या के रूप में देखा ही ना जाता हो, क्योंकि काम के प्रति सबका रवैया एक-सा ही है. गप्पबाजी की यह आदत कब कामचोरी में बद्ल जाती है इसका अहसास भी आम भारतीयों को नहीं है, इसीलिए किसी भी काम में लेट-लतीफ़ी समस्त भारतीयों का स्वभाव सा बन गया है.
  • छ्ठा, विज्ञान के साथ आम भारतीयों का अलगाव - भारत के लोगों में वैज्ञानिक चेतना का अभाव है. वैज्ञानिकों में भी भारत के बहुमूल्य पारम्परिक ज्ञान के प्रति अधिक सम्मान का भाव नहीं है और मिलजुल कर इन दोनों पक्षों की अज्ञानता-पूर्ण सोच के कारण आम लोगों में विज्ञान का प्रसार होता नहीं दिखता.

कुल मिलाकर हम यह पाते हैं कि सच में ही भारत की तरक्की की राह में खुद भारत ही यानी भारतीय ही सबसे बडी बाधा हैं और सवाल यह है कि क्या हम भारतीय अपनी इन कमियों को स्वीकारने को तैयार हैं? देश जैसी एक भावूक चेतना का पोषण करने के लिए अपनी निजता का हनन करना होता है, अपने स्वार्थों को परे धरना पड्ता है, खून और पसीना बहाकर दिन-रात एक करना होता है. दरअसल सपने ही वो रोशनी होते हैं जिसकी आंच में तपकर आदमी निखरता है और जिसके प्रकाश में विकास या तरक्की के भीने-भीने और सुगन्ध भरे फूल खिलते हैं. भारत के मामले में भी यह सच निस्सन्देह उलट तो नहीं हो सकता.

- राजीव थेपड़ा