तो फिर अल्का याज्ञनिक, कुमार सानू, सन्नी लियोनी, शबाना आजमी, रेखा सहित औरों पर भी लगाओ प्रतिबंध

दिल्ली गैंगरेप हादसे के बाद समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा तमाम तरह की मांगे की जा रही हैं और सुझाव दिए जा रहे हैं। हालांकि उनमे से अधिकांश बेहद बेतुके और बेसिर पैर के भी हैं। मजे की बात यह है कि बेतुके और बेसिर पैर की मांगें और सलाह सभी पक्षों (राजनैतिक दलों, अध्यात्मिक गुरुओं, प्रशासन और प्रदर्शनकारी) की ओर से समान रूप से प्रस्तुत किए जा रहे हैं। कोई लड़कियों को मर्यादा में रहने की बात कर रहा है तो कोई उन्हें सलीकेदार कपड़े पहनने की सलाह दिए जा रहा है। कोई घटना के लिए बलात्कारियों और लड़की दोनों को ही बराबर का दोषी बताते हुए ताली एक हाथ से न बजने की कहावत याद दिला रहा है। यहां तक कि कॉलेजों के बाहर होर्डिंग लगाकर कॉलेज के बाद सीधे घर जाने की भी सलाह दी जा रही है। कहने का तात्पर्य ‘दामिनी कांड’ के बाद से देश में तैयार हुए परिवर्तन के माहौल को बहती गंगा समझ सभी हाथ पैर धोने में जुटे हुए हैं।

लेकिन इन सबमें सबसे अधिक बेतुकी मांग जो आई वह पंजाबी रैपर हन्नी सिंह पर प्रतिबंध लगाए जाने वाली थी। यू ट्यूब से हन्नी के कभी न सुने गए गानों को भी ढूंढ ढूंढ कर निकाला जाने लगा और उसके बोलों को अश्लील बता बड़ी बहस खड़ी की गई और यूं प्रस्तुत किया जाने लगा जैसे दामिनी कांड के लिए हन्नी सिंह के वे गाने ही जिम्मेदार हों। हन्नी सिंह पर प्रतिबंध लगाए जाने की मांग की जाने लगी। कई दिनों तक हन्नी सिंह का मामला राष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का विषय बना रहा और राजनीति से लेकर बॉलीवुड तक के लोगों द्वारा इसके पक्ष और विपक्ष में बयान जारी किये जाने लगे। यहां तक कि कुछ समय के लिए मीडिया में कड़ाके की सर्दी में इंडिया गेट और जंतर मंतर पर रात-रात भर जागकर ठिठुरते हुए प्रदर्शन करने वालों की खबर भी पार्श्व में चली गई। परिणाम स्वरूप नववर्ष के ठीक पूर्व शुरू हुई इस बहस के कारण गुड़गांव में होने वाला हन्नी सिंह का कार्यक्रम भी रद्द करना पड़ा।

हालांकि हन्नी सिंह के गानों पर रोक लगाने की मंशा चाहे जो भी रही हो, लेकिन इसका सबसे ज्यादा फायदा भी गायक को ही हुआ। विवादों के कारण ही सही मेट्रो शहरों से दूर छोटे छोटे गांवों- कस्बों में भी लाखों लोगों को हन्नी सिंह और उसके अबतक नहीं सुने गए गानों की चर्चा होने लगी। इंटरनेट पर भी हन्नी सिंह और यू ट्यूब पर उसके गानों की सर्च की जाने लगी। वैसे, आने वाले समय में यह देखने वाली बात होगी कि इन विवादों के कारण हन्नी सिंह का कैरियर समाप्त होता है या फिर उसे इसका फायदा होता है। इसी क्रम में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का हन्नी सिंह के साथ मंच साझा करने से संबंधित एक फोटो भी सोशल मीडिया पर खूब प्रसारित हुआ और जैसा कि अपेक्षित था, शीला दीक्षित की छवि को खलनायक सा प्रस्तुत कर जमकर उनकी भर्त्सना की जाने लगी। यह जाने समझे बगैर कि वह चित्र तात्कालिक नहीं बल्कि कई माह पुरानी थी। फिर जब भक्ति गानों को सुन कोई सन्यासी नहीं बन जाता तो फिर अश्लील गानों को सुन बलात्कारी कैसे बन सकता है?

मुझे विश्वास है कि हन्नी सिंह के गानों पर आपत्ति उठाने वालों में से तमाम ऐसे लोग होंगे जिन्होंने पूर्व में उन विवादास्पद गीतों को एक से अधिक बार सुना होगा, लेकिन उनकी तरफ से पूर्व में एक बार भी उसपर प्रतिबंध लगाने की मांग नहीं आई। बाद में अचानक उनका विवेक जागा और उन्हें लगने लगा कि बलात्कार की घटना के लिए हन्नी सिंह के गाने भी बराबर के जिम्मेदार हैं। ठीक वैसे ही जैसे आरोपियों ने पहले सीडी प्लेयर में हन्नी सिंह के गाने को सुना होगा और फिर दुष्कर्म को अंजाम दिया होगा।

हालांकि फेसबुक और ट्वीटर पर इस गाने की भर्त्सना करने वालों में से कईयों को मैंने विवादास्पद संवादों के कारण चर्चा में आई फिल्म ‘डेल्ही बेली’ के समर्थन करते हुए और इसे बॉलीवुड के परिपक्वता के तौर पर प्रस्तुत करते हुए व्यक्तिगत तौर पर देखा था। उस समय, मिस्टर परफेक्शनिस्ट के तौर पर मशहूर आमिर खान ने सेंसर बोर्ड से फिल्म के संवादों और दृश्यों पर कैंची चलाने के बजाए उसे एडल्ट सर्टिफिकेट के साथ रिलीज करने की सलाह दी थी। उनका कहना था कि चूंकि लोग अब ऐसी फिल्मों को देखना चाहते हैं इसलिए कुछ रिस्ट्रक्शन के साथ इस फिल्म को रिलीज किया जाये। वैसे देखा जाए तो यह कोई नई बात नहीं थी। देश में हर साल बड़ी तादात में एडल्ट फिल्में बनती है और ए सर्टिफिकेट के साथ रीलिज भी होती हैं।

अब यदि फिल्में एडल्ट हो सकती हैं तो गानों के साथ यह भेदभाव क्यों? क्या लोग ऐसे गाने नहीं सुनना चाहते? और फिर यदि एक ही कलाकार एडल्ट फिल्मों में भी काम कर सकता है और आर्ट फिल्मों में भी तो सिंगर दोनों तरह के गाने क्यों नहीं गा सकता? बेहतर होता, यदि फिल्मों की तरह गानों के लिए भी सेंसर बोर्ड द्वारा सर्टिफिकेट देने की मांग की जाती ना कि प्रतिबंध की। हालांकि पूर्व में भी फिल्म खलनायक के विवादास्पद गीत “चोली के पीछे क्या है” और राजाबाबू फिल्म के “सरकाय लो खटिया” और दुलारा फिल्म के “सेक्सी सेक्सी” जैसे तमाम ऐसे गाने हैं जिनको लेकर हाय तौबा मची लेकिन किसी गायक या गायिका को प्रतिबंधित करने की मांग नहीं उठी। बॉबी, संगम, राम तेरी गंगा मैली, वाटर, फायर, कामसूत्र जैसी तमाम फिल्मों पर नैतिकता के झंडरबरदारों द्वारा हो हल्ला मचाया गया, समाज व युवा वर्ग पर पड़ने वाले प्रभावों का हवाला देते हुए फिल्मों के पोस्टर फाड़े गए, सिनेमाघरों में आगजनी की गई लेकिन ऐसा फिल्म विशेष के विरोध में किया गया न कि किसी अभिनेता-अभिनेत्री के विरोध में। लोकगीत और संगीत को बढ़ावा देने के नाम पर क्षेत्रीय फिल्मों और गानों की अश्लीलता को नजरअंदाज भी किया जाता है। क्या ये गाने बलात्कार को बढ़ावा नहीं देते?

तो फिर अचानक हन्नी सिंह को लेकर ही यह मांग क्यों? वह भी तब जबकि उसने यह कहकर भी सफाई दी कि विवादास्पद गाना उसके द्वारा गाया नहीं गया था। भले ही शुरू में थोड़ी लोकप्रियता हासिल करने के लिए हन्नी ने वे गाने गाए हों लेकिन इसे इतना तूल देने की कोई आवश्यकता नहीं थी। बॉलीवुड का इतिहास रहा है कि शुरू में लोगों की निगाह में आने के लिए डिम्पल कपाड़िया, करिश्मा कपूर, ममता कुलकर्णी, मल्लिका सहरावत, जिया खान, वीना मलिक, सन्नी लियोनी आदि ने फिल्मों में ऐसे बोल्ड सीन दिए जो दर्शकों सहित सेंसर बोर्ड के लिए भी आपत्तिजनक होते थे। फिर अकेला हन्नी सिंह क्यों? यदि प्रतिबंध लगाना है तो हन्नी सिंह के साथ साथ, ईला अरूण, अल्का याज्ञनिक, कुमार सानू, पूर्णिमा, रेखा, शबाना आजमी, सन्नी लियोनी सहित तमाम ऐसे लोगों पर भी प्रतिबंध लगाने की मांग क्यों नहीं?

अच्छा हो कि हम फिल्मों सहित गानों के लिए भी सेंसर बोर्ड द्वारा सर्टिफिकेट दिए जाने की मांग करें ताकि वाक-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी आंच न आए, लोगों का मनोरंजन भी हो और माहौल की सुचिता भी बरकार रहे। सोचिए...

- अविनाश चंद्र