प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप का सफल नमूना

पिछले लगभग एक साल के अंतराल में देश में हुए दो बड़े खेल आयोजनों में भारत की दो अलग-अलग तस्वीरें नजर आईं। गत वर्ष अक्टूबर में हुए कॉमनवेल्थ खेलों का आयोजन पुराने भारत के नेता-बाबू गठबंधन द्वारा किया गया था। फॉर्मूला वन ग्रांप्री का आयोजन नए भारत द्वारा स्थानीय निजी उद्यमियों और वैश्विक व्यवसाय के सहर्ष संयोग से किया गया।

भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजन के बारे में आम धारणा है कि उसने देश की छवि पर बट्टा लगाया। दूसरी तरफ फॉर्मूला वन के आयोजन को इस तरह देखा जा रहा है कि उसने वैश्विक जाजम पर इंडिया इंकॉपरेरेशन के पदार्पण की पुष्टि कर दी है। तो क्या इसका अर्थ यह निकाला जाए कि राजनेताओं और नौकरशाहों वाले पुराने भारत पर कॉपरेरेट और शो-बिज पॉवर वाले नए भारत ने बढ़त बना ली है?

हां भी और नहीं भी। इसमें कोई शक नहीं कि इवेंट मैनेजमेंट की दृष्टि से फॉर्मूला वन का आयोजन एक चमकीली कामयाबी था। अगर रेस ट्रैक पर भटक आए आवारा श्वान और एक रॉक कंसर्ट, जो हुआ ही नहीं, के अपवादों को छोड़ दें तो पूरा आयोजन बेदाग रहा। रेस में शामिल होने वाले आयोजन की सराहना करते रहे और रेसर भी संतुष्ट नजर आए।

यकीनन, इस बार हमें गंदे टॉयलेट्स, मिस्ड डेडलाइन और अंतिम समय पर हुए निर्माण कार्यो की शर्मिदगी का सामना नहीं करना पड़ा। जहां कॉमनवेल्थ खेलों का आयोजन राजनेताओं, नौकरशाहों और खेल अधिकारियों के एक बड़े-भारी लवाजमे द्वारा किया गया था, वहीं फॉर्मूला वन का आयोजन प्रबंधन पेशेवरों की एक छोटी-सी टीम ने किया।

कॉमनवेल्थ खेल के आयोजकों के लिए यह आयोजन अपने मित्रों और ग्राहकों में राजनीतिक प्रश्रय की बंदरबांट का एक अवसर था, तो फॉर्मूला वन के आयोजकों के लिए यह रेस एक बिजनेस अपॉर्चूनिटी थी, जिसका लक्ष्य था ब्रांड निर्माण और मुनाफा। कॉमनवेल्थ खेलों पर खर्चा गया धन देश के करदाताओं की जेब से आया था, जबकि फॉर्मूला वन के लिए सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध कंपनियों ने धन मुहैया कराया था, जो अपने शेयरधारकों के समक्ष एक प्रत्यक्ष लाभ का प्रदर्शन करना चाहती थीं।

लेकिन इसके बावजूद फॉर्मूला वन की सफलता को निजी उद्यमों के जयघोष की तरह देखना एक सरलीकरण ही होगा। अगर ईमानदारी से आकलन करें तो पाएंगे कि ग्रेटर नोएडा में फॉर्मूला वन का आयोजन उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री के ठोस समर्थन के बिना संभव नहीं हो सकता था। हैरानी नहीं होनी चाहिए कि सचिन तेंडुलकर को झंडा फहराने का सम्मान जरूर प्रदान किया गया, लेकिन पुरस्कार वितरण करने को मायावती से ही कहा गया।

यदि उत्तरप्रदेश सरकार भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को सरल नहीं बनाती तो आयोजकों के लिए इतनी तेजी से बुनियादी ढांचे का निर्माण कर पाना संभव नहीं था। यह आरोप जरूर लगे कि किसानों को उनकी भूमि का उचित भुगतान नहीं हुआ, लेकिन उत्तरप्रदेश सरकार के समर्थन ने आयोजकों के लिए आलोचनाओं का सामना कर पाना संभव बना दिया।

इन अर्थो में फॉर्मूला वन प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप का एक बेहतर उदाहरण था। इसे आधुनिक काल के क्रोनी कैपिटलिज्म के एक साक्ष्य के रूप में भी देखा जा सकता है, जहां राज्यतंत्र इस तरह कॉपरेरेट का सहयोग करता है कि वह दोनों के लिए लाभप्रद हो। जाहिर है कि यह मॉडल कारगर साबित होता है, खासतौर पर उन राज्यों में, जहां सशक्त व्यक्तिवादी मुख्यमंत्रियों का राज है।

ऑटोमोबाइल के दिग्गज गुजरात को एक सुगम गंतव्य क्यों मानते हैं, इसके कारण इस तथ्य से बहुत भिन्न नहीं हैं कि उत्तरप्रदेश क्यों एक आदर्श फॉर्मूला वन आयोजनस्थल बन सका। नरेंद्र मोदी और मायावती जैसे मुख्यमंत्री बड़ी परियोजनाओं के लिए अन्य राज्यों की तुलना में अधिक सहजता से सिंगल विंडो क्लियरेंस मुहैया करा सकते हैं।

क्या यह प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप दूसरे खेलों या दूसरे क्षेत्रों के लिए भी कारगर साबित हो सकती है? कई अर्थो में फॉर्मूला वन विशिष्ट है। बहुत कम खेल ऐसे हैं, जो फॉर्मूला वन की तरह सहजता के साथ बाजार के साथ संबद्ध हो सकते हैं। फॉमरूला वन ऑटोमोबाइल से लेकर टेक ब्लूचिप्स तक सभी के लिए आक्रामक प्रोडक्ट मार्केटिंग का आदर्श मंच मुहैया करा सकता है।

जहां कॉमनवेल्थ खेलों ने पुरानी शैली के ‘राष्ट्रवाद’ को अपनी यूएसपी बनाया, वहीं फॉर्मूला वन एक उपभोक्तावादी और समृद्ध भारत को उसकी आकांक्षाएं बेच रहा था। एक ऐसा भारत, जहां मोतिहारी का एक गरीब आदमी भी किसी टीवी शो में रातोंरात करोड़पति बन सकता है। कॉमनवेल्थ खेलों में भारतीय खिलाड़ियों द्वारा स्वर्ण पदक जीतने पर हमारी आंखें नम हुई थीं, लेकिन फॉर्मूला वन में खेल और फिल्म जगत के सितारों का रोमांच भारी था। हमारे नारायण कार्तिकेयन रेस में भले ही 17वें नंबर पर आए हों, लेकिन रेस अपनी हाइप के अनुरूप ही लगी।

इसीलिए फॉर्मूला वन की सफलता नए भारत की शक्तियों और कमजोरियों का अवलोकन करने का अवसर प्रदान करती है। एक तरफ जहां यह आयोजन फास्ट ट्रैक पर चल रहे एक देश की गतिशीलता को प्रदर्शित करता है, वहीं इस तरह के आयोजन के मार्फत अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल करने की ललक हममें आत्मसम्मान के अभाव को भी दिखाती है। शायद, हमारी समस्या यह है कि हम बैलगाड़ी से फॉर्मूला वन तक बहुत तेजी से पहुंच गए हैं, जबकि देश का एक बड़ा हिस्सा आज भी इन दोनों ध्रुवांतों के बीच में कहीं अटका हुआ है और संघर्ष कर रहा है।

यदि ग्रेटर नोएडा उत्तरप्रदेश का एक बिंदु है तो गोरखपुर भी इस विशाल राज्य का एक हिस्सा है, जहां स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के कारण लगभग 500 बच्चों ने दिमागी बुखार के चलते दम तोड़ दिया। हमें ऐसा दृश्य कब देखने को मिलेगा, जब प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप के तहत उत्तरप्रदश के दूरस्थ इलाकों में उतने ही उत्साह के साथ अस्पतालों का निर्माण किया गया हो, जितने उत्साह से फॉर्मूला वन रेस का आयोजन किया गया था?

- राजदीप सरदेसाई
साभार: दैनिक भास्कर