सब्सिडी घटाने पर और भी ज्यादा महंगाई बढ़ेगी – प्रसेनजीत बोस

प्रसेनजीत बोस मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के युवा नेता है । इसके अलावा  वे पार्टी की रिसर्च यूनिट के संयोजक हैं। पिछले दिनों सतीश पेडणेकर  ने उनसे बजट और देश की आर्थिक स्थिति पर बातचीत की । यहां उसके कुछ अंश प्रस्तुत हैं -

कभी बजट केवल बैलेंस आफ बुक ही नहीं होता था उससे देश की आर्थिक नीति की दिशा भी तय होती थी। क्या अब बजट का वह महत्व खत्म हो रहा है?

बैलेंस आप बुक तो करना ही है । सवाल यह है कि आप बैलेंस आफ बुक किस तरह कर रहे हैं। इससे ही आपकी दिशा तय होती है। सरकार की नीति की दिशा क्या है ? टैक्स कहां से आएगा? कैसे आएगा ?खर्चा कैसे होगा? उसके बीच आपका बजट घाटा है। सवाल यह है कि आप कितना टैक्स लगा रहे हैं ?किसके पर लगा रहे हैं ? आप खर्च किस पर कर रहे हैं ? किस मद में कर रहे हैं ? आपका बजट घाटे पर नजरिया क्या है ? ये सब राजनीतिक सवाल हैं। पिछले सालों में हुआ यह है कि बजट के जो सवाल हैं यानी खर्चे,घाटे और टैक्स के जो सवाल है उनके बजाय आर्थिक उदारीकरण की कितनी घोषणा बजट में हो रही है या नहीं हो रही है इसके आधार पर बजट को देखा जा रहा है। जबकि इसका बजट से कोई लेनादेना नहीं है। बजट का जो असली काम है उससे फोकस थोड़ा हट गया है उन मसलों की तरफ चला गया है  जो बजट से सीधे सीधे जुडे हुए नहीं हैं। उनपर अलग से बहस होनी चाहिए। बजट होता है कि सरकार की राजकोषीय नीति  की दिशा क्या है।

मुद्दा यह है कि राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है उस पर तो सरकार को ध्यान देना ही पडेगा। उसे ज्यादा कहें या कम कहें यह इस बातपर निर्भर करता है कि अर्थव्यवस्था की स्थिति क्या है। अमेरिका और जापान जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को लीजिए वहां अभी आर्थिक मंदी चल रही है। आर्थिक मंदी जब होती है तब निजी उद्योग सामने नहीं आते। तब निवेश बढाने के लिए सरकारी निवेश की जरूरत होती है। ऐसी मंदी के समय बजट का घाटा बढ़ना अस्वाभाविक बात नहीं है। यदि हम अमेरिका ,यूरोप और जापान के हिसाब से हमारे देश के घाटा के बात करेंगे तो सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात हमारा घाटा ज्यादा नहीं है। वह छह से सात प्रतिशत के बीच में है। अमेरिका आदि देशों में यह इससे कहीं ज्यादा है। इसका मतलब यह नहीं है कि बजट घाटा बढ़ाते ही चलिए। सवाल यह नहीं है कि बजट घाटा कितना है सवाल यह है कि इस पैसे को लेकर आप कर क्या कर रहे हो ताकि आनेवाले  सकल घरेलू उत्पाद का दर बढ़े। इस घाटे को आप दोबारा से कम कर सकें। उसमें हमारे सरकारी प्राथमिकताओं में काफी कमजोरियां हैं।

हालांकि बजट विधानसभा चुनावों के बाद आ रहा है लेकिन कहा जा रहा है यह बजट बहुत कुछ देश की राजनीतिक स्थितियों पर निर्भर करेगा। यदि कांग्रेस उत्तर प्रदेश के चुनावों के बाद सपा का केंद्र में साथ लेती है तो आर्थिक सुधारवाला बजट आएगा नहीं तो एक सामान्य सा बजट होगा जिसमें कुछ खास नहीं होगा। 

मैं पहले ही इस सवाल के बारे में बोल रहा था । अभी जो यह बातचीत चल रही है कि यह बजट से ज्यादा चल रही है खुदरा बाजार में विदेशी निवेश को लेकर। ऐसा कहा जा रहा है कि अगर उत्तर प्रदेश में ऐसी सरकार बनती है जिसमें कांग्रेस भी शामिल हो तो दिल्ली की केंद्र सरकार भी मजबूत होगी और तब सरकार आर्थिक सुधार खासकर खुदरा बाजार में विदेशी निवेश को लाने के बारे में कदम उठाएगी। खुदरा बाजार में विदेशी निवेश हुआ या नहीं हुआ उसके साथ हमारे देश के बजट का सीधा ताल्लुक कोई नहीं है। इसे उस नजरिये से देखना भी नहीं चाहिए।

आर्थिक दृष्टि से देखे तो इस बजट के समय हालात कुछ ऐसे हैं कि वित्तमंत्री के पास विकल्प ज्यादा नहीं हैं क्योंकि राजकोषीय घाटा बहुत ज्यादा है और उसे कम करने की कोशिश करनी ही पड़ेगी।

मैं ऐसा नहीं समझता। अभी एक बहस चल रही है –प्रत्यक्ष करों को लेकर एक कानून बनें । सरकार की कोशिश है कि बजट सत्र में या आनेवाले समय में उसे पारित कर दिया जाए। यह एक बहुत बड़ी बहस है लेकिन हमारे यहां चर्चा का विषय नहीं बनी। हम वामपंथी होने के नाते अक्सर यह पूछते हैं कि हमारे देश का एक बहुत बडा तबका टैक्स के दायरे से बाहर है। हमारे देश की आबादी एक करोड़ 20लाख है उसमें से तीन करोड़ से कम लोग ही टैक्स देते हैं।यानी केवल ढाई से तीन प्रतिशत आबादी ही टैक्स के दायरे में आती है। अमीर तबके या मध्यम वर्ग की बात होती है वह काफी बड़ा है लेकिन ग्रामीण क्षेत्र और सेमी अरबन क्षेत्र टैक्स के दायरे से बाहर हैं। प्रत्यक्ष कर कानून में इसको लेकर चर्चा होनी चाहिए यह बजट की दृष्टि से बहुत प्रासंगिक है। आप घाटे की बात कर रहे हैं । घाटा क्यों होता है हम खर्चा ज्यादा कर रहे हैं लेकिन आमदनी कम है। घाटा कम करने का एक तरीका है कि आप अपना खर्चा कम कर सकते हैं लेकिन दूसरा तरीका यह है कि आमदनी में वृद्धि कर सकते हैं.। सरकार की आमदनी में तब वृद्धि हो सकती है जब आप ज्यादा से ज्यादा कर वसूल करें। हमारे देश में अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है । हाल ही में फोर्ब्स की जो लिस्ट आई है उसके मुताबिक अरबपतियों की संख्या की दृष्टि से भारत चौथे नंबर पर है। उससे ज्यादा अरबपति  अमेरिका ,चीन और रूस में हैं।भारत में अरबपतियो के वैल्थ टैक्स को देखें तो वह पांच छह सौ करोड़ के लगभग है जो बहुत कम है क्योंकि इन 55 अरबपतियों के पास 10से 15लाख करोड की संपत्ति है। इन चीजों को लेकर बात होनी चाहिए कि कैसे हम अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं।

अगला चुनाव 2014 में है इसलिए तब बजट के बजाय लेखानुदान ही पेश होगा।2013 का बजट चुनाव के पहले का बजट होने के कारण वह पापुलिस्ट बजट होगा। इसलिए केवल 2012 के में ही ऐसा बजट पेश किया जा सकता है जिसमें अर्थव्यवस्था को मजबूत करनेवाले कदम उठाए जा सकते हैं।

बिल्कुल क्योंकि हमारे यहां अर्थव्यवस्था में काफी समस्या है। पहली समस्या है हमारे विकास की दर जो 8प्रतिशत थी उसमें काफी कमी आ गई है। इसके अलावा दुनियाभर में आर्थिक मंदी अभी चल रही है। चूंकि हम एक ग्लोबलाइज्ड वर्ल्ड में रह रहे हैं और अमेरिका और यूरोप आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं और तो उसका भी असर हम पर पड़ रहा है। विकास दर में कमी आ रही है ऐसे  में सरकार की सबसे बड़ी प्राधमिकता यह होनी चाहिए कि विकास दर में जो कमी आ रही है उसे न आने दे । उसमें सरकारी निवेश और खर्चे की बहुत बढ़ी भूमिका होती है। जब आर्थिक वृद्धि घट जाती है तो सरकार को निवेश की जरूरत होती है। आज जो यह चित्र है उसमें पापुलिस्ट उपायों का महत्व बढ़ जाता है। जब मनरेगा, खाद्य सुरक्षा बिल ,ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन है या सर्व शिक्षा अभियान है उस पर सरकार कितना खर्च करती है इसका महत्व बढ़ जाता है। आर्थिक वृद्धि की दृष्टि से और विकास सबके पास पहुंच रहा है या नही इस दृष्टि से बुनियादी ढांचे में कितना निवेशकर रहे हैं ,सामाजिक क्षेत्र में कितना निवेश कर रहे हैं यह बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकार ने अगर इन मुद्दों की अनदेखी की और विकास दर को और नीचे जाने से नहीं रोका तो उसका खामियाजा राजनीतिक रूप से भुगतना पड़ेगा। अभी जो आंकड़े सामने आ रहे हैं उससे तो स्पष्ट है कि आर्थिक वृद्धि के बावजूद रोजगार ज्यादा नहीं बढ़ा है। ऐसे में आर्थिक विकास दर और घटी तो बेरोजगारी और बढ जाएगी। उसका राजनीतिक नुक्सान सरकार को ढ़ोना पड़ेगा क्योंकि बेरोजगारी समाज में बहुत बड़ा मुद्दा होता है।

चर्चा है कि सरकार घाटे को पूरा करने के लिए सर्विस टैक्स और अप्रत्यक्ष कर बढाएगी। क्या आपकी नजर में सरकार के पास कोई और रास्ता है?

मैं नहीं सोचता कि सर्विस टेक्स की रेट बढ़ाने की कोई जरूरत है। उसमें एक हार्मोनी होना चाहिए। अब हम गुडस एंड सर्विसेज टैक्स की तरफ जा रहे हैं इसलिए गुड़स और सर्विस टैक्स का रेट एक होना चहिए । हमारे सकल घरेलू उत्पाद का एक बड़ा हिस्सा सर्विस क्षेत्र से आ रहा है उनमें अब भी कई सर्विसेज है वह टैक्स के दायरे में नही आ रहे। दर बढ़ाने के बजाय उन्हें टैक्स के दायरे में लाना चाहिए।हमारी पार्टी अप्रत्य़क्ष करों को बढ़ाकर घाटे को कम करना सही कदम नहीं समझती क्योंकि अप्रत्य़क्ष टैक्सों का असर सामान्यतया हर हिस्से पर पड़ता है।अमीर भी वह देता है और गरीब भी देता है। जैसे एक्साइज ड्यूटी है वह अमीर भी उतना ही देता है और गरीब भी उतना ही देता है। इसलिए हमें प्रत्यक्ष कर बढ़ाने चाहिए। हमारे देश में जो अमीर हैं उनके पास बहुत पैसा है इतना पैसा है कि खर्चा करने को जगह नहीं है। उनसे ज्यादा से ज्यादा पैसा लेकर गरीबों पर खर्च करना चाहिए। प्रत्यक्ष कर बढ़ाने की बहुत गुंजाइश हमारे देश में है।

इस बजट का बिग आइडिया क्या होना चाहिए?

डायरेक्ट टैक्सेस कोड को लेकर जो बहस हो रही है उसका एक अच्छा परिणाम होना चाहिए ताकि हमारे देश में टैक्स कलेक्शन बढ़े।जब वामपंधी दल यूपीए –वन के समय में सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे  थे तब टैक्स जीडीपी अनुपात लगातार बढ़ रहा था।2007-08 में बारह प्रतिशत तक पहुंच गया था जो एक अच्छी बात है लेकिन अब वो दस और फिर साढ़े नौ प्रतिशत तक आ गया है। इसका मतलब क्या है कि जितना कर संग्रह कर सकते है उतना नहीं कर रहे हैं । हम अपनी क्षमता से कम काम कर रहे हैं। डायरेक्ट टैक्स कोड का अच्छा नतीजा निकले और हम ज्यादा प्रत्यक्ष कर संग्रह की दिशा में जा सकें । दूसरा हमारे देश में आर्थिक मंदी आ रही है ऐसे समय में उन क्षेत्रों में निवेश की जरूरत है जिससे रोजगार में वृद्धि हो सके । सामाजिक क्षेत्र में रोजगार गारंटी,शिक्षा,स्वास्थ्य़ में इन्फ्रास्ट्रक्चर में पावर में।अभी सब्सिडी को लेकर बहस चल रही है  ।अभी महंगाई थोड़ी कम हुई है लेकिन पहले तीन बरस 2008 से -11तक बहुत तेजी से बढ़ती रही यह बहुत खतरनाक रुझान था। हमारे यहां जो गरीब लोग हैं जिनकी बहुत कम आय है अर्जुन सेनागुप्ता कमेटी की रपट है उसके मुताबिक 74 प्रतिशत आबादी 20रुपये से ज्यादा खर्चा नहीं कर पाती। इस पर सबसे बुरा असर होता है महंगाई का ।ऐसे में सब्सिडी घटाने से इन पर असर होगा। मैंने सुना है कि  प्रणव मुखर्जी ने कहा कि सब्सिडी बिल बढ़ने के कारण उनको नींद नहीं आ रही। इसका मतलब है कि सब्सिडी  में कटौती होगी। उससे तेल के दाम बढ़ेगे ,फर्टीलाइजर के दाम बढ़ेगे। उसपर खाद्य सुरक्षा बिल भी आना है। इसलिए भी ज्यादा खर्चा नहीं कर पाएंगे। हमारे जैसे देश में लोगों की क्रयशक्ति कम है वहां आप सब्सिडी कम करने लगेंगे तो दोबारा महंगाई का बढ़ना शुरू होगा। इसलिए गरीबों के लिए जो सब्सिड़ी है उसमें कटौती की जाती है तो वह ठीक नहीं होगा।

सब्सिडी के बारे में कहा जाता है  कि वह जरूरतमंद लोगों तक नहीं पहुंच पाती। जैसे कुकींग गैस की सब्सिडी है । जिसके पास कुकींग गैस है उसे गरीबी की सीमा रेखा से नीचे रहनेवाला नहीं कहा जा सकता। जिनके पास कुकींग गैस नहीं है ऐसे गरीबों को सब्सिडी की सबसे ज्यादा जरूरत है। जैसे पावर सब्सिडी उन लोगों को मिलती है जिनके पास खेत है या फार्म है लेकिन वह सब्सिडी कृषि मजदूर तक तो नहीं पहुंच पाती। सब्सिड़ी का साथ दिक्कत यह है कि वह उन लोगों तक पहुंचती है जो खाते पीते या प्रिवीलेज्ड हैं। बहुत गरीबों तक यह सब्सिडी नहीं पहुंचती।

यह तर्क में बहुत समय से सुनता आ रहा हूं । लेकिन मैं नहीं मानता कि इसका कोई आधार है ।यह एक प्रचार है। जब किसी चीज पर सब्सिडी दी जाती है तो उसका दाम कम होता है और जब वह कम होता है तो वह अमीर गरीब सबके लिए कम होता है।बात कुकींग गैस की चल रही थी मुझे लगता है कि गरीब तबके में भी कुकींग गैस का इस्तेमाल बढ रहा है।दाम कम होने के कारण ही उनके पास पहुंच रहा है।दाम बढ़ा देंगे तो उनके पास तक कैसे पहुंचेगा । आप चाहते हैं या नहीं कि वह उनके पास पहुंचे।दाम बढ़ा देंगे तो वह उसको खरीद ही नहीं पाएगा। गरीबों को सब्सिडी देने में समस्या क्या है कालाबाजारी और भ्रष्टाचार।तो इसलिए आप कार पर ज्यादा टैक्स लगाइए और उसका पैसा सब्सिडी के लिए दीजिए।घोटाला होता है कि खाद्य सामग्री डीजल  सब्सिडी में होता है क्योंकि उससे आपका पल्लिक ट्रांसपोर्ट चलता है। किसान पंपसेट चलाते हैं ,ट्रैक्टर चलता है।अब उसका दुरुपयोग हो रहा है शहरी क्षेत्रों में अमीर लोग उससे बड़ी-बड़ी कारें चलाते हैं । इसका समाधान यह है कि कार पर टैक्स लगा दीजिए ।ताकि जो अमीर लोग उसे खरीदें वह ज्यादा पैसा देकर खरीदें। उसका पैसा आप डीजल की सब्सिडी में लगाइए।पर अगर आप खाद का दाम ,बढ़ाएगे या डीजल का दाम बढ़ाएंगे तो वह किसी क्षेत्र का इनपुट है।अनाज के दामों पर  इसका असर पड़ेगा और पिछले कुछ समय में जो महंगाई कम हुई है वह फिर बढ़ेगी। इसलिए सब्सिड़ी के रीजनिंग में बदलाव की जरूरत है,सुधार की जरूरत है लेकिन सब्सिड़ी को कम करना खत्म करना हमारे जैसे गरीब देश में कोई सही दिशा नहीं है।

आपने अभी आर्थिक मंदी की बात की आपकी नजर में निवेश को बढ़ाने के लिए बजट में क्या कदम उठाए जाने चाहिए?

निवेश बढ़ाने के लिए जो कदम उठाए जाने चाहिए वो हैं कि हमारे देश में 250 के आसपास केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र इकाईयां हैं। उनका जो रिजर्व है यानी उनका जो मुनाफा वे रिजर्व बैंक में ररखा हुआ है जो छह लाख करोड़ रूपया है । यह सरकारी क्षेत्र का पैसा है बैंक में पड़ा हुआ है। उसका निवेश नहीं हो रहा है। इसलिए सरकार के पास साधनों की तो कोई कमी नहीं है। इसलिए सरकार को निवेश करने के लिए इच्छाशक्ति की भी जरूरत है। बहुत से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम घोटे में चल रहे हैं। जैसे एमटीएनएल,वीएसएऩएल या एयर इंडिया है या फर्टीलाइजर कंपनीज हैं। एक तरफ हमको फर्टीलाइजर का आयात करना पड़ रहा है दूसरी तरफ हमारी फर्टीलाइजर कंपनियां डूब रही है। यह सार्वजनिक क्षेत्र में निवेश करने का- जो इकाईयां घोटे मे चल रही है उन्हें रिवाइव करने का और रोजगार बढ़ाने का अवसर हमारे सामने है। इसके अलावा अगर आप निजी क्षेत्र में निवेश बढ़ाने की बात कर रहे हैं तो बुनियादी ढांचा क्षेत्र में निवेश करना चाहिए जैसे रेलवे ,रोडस् और पावर । रेलवे में आज इतनी दुर्घटनाएं क्यों हो रही हैं क्योंकि हम रेलवे के आधुनिकीकरण में निवेश नहीं कर रहे। समस्या यह है कि हमारे देश में एक तबका यह समझता है कि आधुनिकीकरण का मतलब है निजीकरण। लेकिन आधुनिकीकरण सरकारी साधनों के जरिये भी किया जा सकता है लेकिन कहीं न कहीं राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है।

हालही में एयर इंडिया को बेल आउट के लिए काफी बड़ा पैकेज दिया गया, अब रेलवे भी पैकेज मांग रही है दूसरी तरफ रेलवे का आधुनिकीकरण नहीं किया गया। एयर इंडिया ने में हालत है कि कोई काम ही नहीं करना चाहता। ऐसी स्थिति में सरकार कितना निवेश करे?

सवाल निवेश का नहीं है। पहले एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस जो अलग-अलग इकाइयां थी।जो अच्छा खासा मुनाफा कमा रही थी। सीएजी और बाद में आई कमेटीआन पव्लिक एंटरप्राइज की रपट कहती है कि उनके विलय और इतना ज्यादा कर्जा लेकर इतने ज्यादा विमान खरीदने  की जरूरत ही नहीं थी। यह करनेवाले मंत्री से पूछा जाना चाहिए कि उसने ऐसा क्यों किया। उसके कारण एयर इंडिया कर्जे में डूब गया। यह सार्वजनिक क्षेत्र  के सार्वजनिक होने की  समस्या नहीं है । यह तो सवाल है कि सार्वजनिक क्षेत्र को आप गलत तरीके से चला रहे हैं। इसलिए एयर इंडिया के फैसले में भी कहीं न कहीं घोटाले की बू जरूर आ रही है। रेलवे में कितने साल से खाते में बदलाव करके मुनाफा दिखा रहे हैं। दूसरी तऱफ लोगों की दुर्घटनाओं में जानें जा रही हैं। इसे रोकने के लिए दुनियाभर में तकनीक उपलब्ध है। रेलवे में डेढ लाख पद खाली पड़े हुए है जिनको भरा नहीं जा रहा है। यह सार्वजनिक क्षेत्र का कुप्रबंधन है इसका समाधान आप निजीकरण में ढूंढते हैं लेकिन क्या कभी रेलवे का निजीकरण कर सकते हैं। समाधान यह है कि आपको पब्लिक सेक्टर का प्रबंधन बेहतर करना पड़ेगा। पब्लिक सेक्टर के बासेस कौन होते हैं मंत्री होते हैं। तो मंत्रियों को पब्लिक सेक्टर सही ढंग से चलाना चाहिए । लेकिन अगर आप इन्हें गलत ढंग से चलाएंगे तो आपको राजनीतिक रूप से संसद और चुनाव में प्रेशर में आना पड़ेगा। हमारे देश में राजनीतिक बहस इस दिसा में जाती नहीं । हम मानकर चलते हैं कि पब्लिक सेक्टर खराब है। उसका समाधान निजीकरण है ।अब एयर इंडिया की यह हालत किसकी वजह से है यह जिम्मेदारी तय नहीं करेंगे तो अगली बात यह चलेगी कि एयर इंडिया का निजीकरण कर दिया जाए। यदि निजीकरण ही समाधान है तो किंगफिशर की हालत यह क्यों है?

पिछले कुछ समय में जितने रेलमंत्री हुए है उन्होंने सबसे पहले अपने राज्यों पर ध्यान दिया। इसके अलावा उन्होंने कभी आधुनिकीकरण में निवेश करने की जरूरत नहीं समझी। काकोडकर समिति की रपट कहती है कि सेफ्टी नाम की कोई चीज ही नहीं हैं ट्रैक जर्जर हैं बोगियां पुरानी है। यात्री यात्रा करने के बाद बच जाते हैं तो यह उनकी किस्मत है। दरअसल राजनीतिक प्रेशर में उनकी कोशिश यह होती है कि भाड़ा नहीं बढ़ाया जाए। बाकी सिस्टम वैसे ही चलता रहे । यह पापुलिस्ट तरीका है । जरूरत इस बात की है वे भाड़ा भी बढ़ाए और उसे निवेश भी करें आधुनिकीकरण में। ऐसा नहीं है कि उसे दोगुना या चौगुना कर दे लेकिन उसे रेशनालआइज तो किया जाना चाहिए।

भाड़ा तो बढ़ाया जाना चाहिए उसे रेशनलाइज किया जाना चाहिए लेकिन रेलवे में कई क्लास होते हैं ।एसी आदि का किराया बढ़ता भी रहा है । लेकिन आप जनरल क्लास का भाड़ा बढ़ा देंगे तो उसमें सफर करनेवाले गरीबों पर बोझ बढ़ेगा। रेलवे जैसे विभाग को चलाने के लिए एक विजन होना चाहिए । पिछले दो साल से रेलवे का गलत इस्तेमाल होता रहा उस मंत्री के द्वारा जो एक राज्य की मुख्यमंत्री बनना चाहती थी। यदि सार्वजनिक क्षेत्र का ऐसा गलत इस्तेमाल होगा तो सार्वजनिक क्षेत्र को नुक्सान होगा।यह हो रहा है हमारे देश में । इसका समाधान यह है कि सबको मिलकर दबाव बढ़ाना चाहिए कि सार्वजनिक क्षेत्र में सबका पैसा है उसे बेहतर ढेग से चलाना पड़ेगा।

बजट में महंगाई पर काबू पाने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए?

जैसा मैंने पहले कहा कि सब्सिडीज नहीं घटाई जानी चाहिए। सब्सिडी घटाने पर और भी ज्यादा महंगाई बढ़ेगी। महंगाई को कम करने के कई दीर्घकालिक और कुछ लघुकालिक समाधान हैं। हम कुछ दीर्घकालिक मुद्दों को हल नहीं कर पा रहे है। हमारा कृषि क्षेत्र पिछड़ रहा है। वहां उत्पादन और उत्पादनशीलता में गतिरोध पैदा हो गया है। आबादी बढ़ रहा है मांग बढ़ रही है जाहिर है आपको उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाना होगा। जमीन की उत्पाकदता बढ़ाने की जरूरत है। वहां पर भी सवाल आता है निवेश का। कृषि क्षेत्र में राज्य सरकारों की भी बहुत बड़ी भूमिका है। यह केवल केंद्र सरकार का मामला नहीं है । हमें एक्सटेंशन सर्विसेज है , खरीद नीति, स्टोरेज क्षमता पर ध्यान देना चाहिए। कृषि और कृषि आधारित क्षेत्रों पर  ध्यान देने की जरूरत है।

अभी आपने प्रत्यक्ष करों की बात कही अभी यह मांग उठ रही है कि आयकर की सीमा बढ़ाई जानी चाहिए। इस बारे में आपका क्या कहना है?

महंगाई की मार निम्न मध्य वर्ग पर भी पड़ी है। अभी कमेटी में बात चली है कि सीमा तीन लाख की होनी चाहिए। ऐसा होता है तो ठीक है। इससे नीचे के तबके के लोगों को थोड़ी राहत मिलेगी। लेकिन प्रत्यक्ष कर बिल में कहा गया है  कि 10लाख तक आय पर केवल दस प्रतिशत कर लगे। इससे हमारे बहुसंख्यक मतदाताओं को बहुत बड़ी कर कटौती मिल रही है । हमारे समाज में सवा अरब लोगों में से दो तीन करोड़ ही टैक्स दे रहे हैं  ।हमारे जैसे गरीब देशों में इतनी ज्यादा टैक्स छूट देने की जरूरत क्या है। पांच लाख से ज्यादा आयवालों के लिए कर की दर बीस प्रतिशत से कम नहीं होना चाहिए।

इसके अलावा बजट से आपकी क्या अपेक्षाएं हैं?

काले धन का जो मसला उभर करहा है उसे लेकर बजट में कुछ करना चाहिए। कालेधन को लेकर अलग-अलग अनुमान आ रहे हैं। अभी सीबीआई के निदेशक ने कहा कि यह पांच सौ मिलियन डालर है।यानी चौबीस पच्चीस लाख करोड। मुझे पता नहीं कि वह सही आंकड़े हैं या नहीं लेकिन सीबीआई निदेशक सरकारी अफसर है उसके पास जानकारी है तभी वह बोल रहा है। इतना पैसा हो या इससे आधा हो वह हमारे जैसे गरीब देश के लिए बहुत मायने रखता है। इसमें से बहुत सारा पैसा तो रिश्वतखोरी का पैसा है। इस पैसे को वापस लाने के लिए जल्दी कोई कदम उठाने की आवश्यकता है।यह पैसा देश के विकास में निवेश हो सकता है।