समस्या नहीं, समाधान हैं हॉकर

कुछ महीने पहले मुंबई के सबर्ब विलेपार्ले में पुलिस फुटपाथ को हॉकरों से खाली कराने की मुहिम चला रही थी। उसी दौरान डर से भाग रहे एक हॉकर की मौत हो गई। इसने शहर में एक बड़े विवाद का रूप ले लिया। सांसद प्रिया दत्त और एमएलए कृष्णा हेगड़े ने इस मृत्यु के लिए पुलिस की कार्रवाई को जिम्मेदार बताते हुए एक हॉकर पॉलिसी लागू करने की मांग की।

हर बड़े शहर में हॉकर फुटपाथ और सड़क घेर कर अपना धंधा करते हैं। और हर जगह पुलिस और म्युनिसपैलिटी वाले जब-तब इन हॉकरों को खदेड़ने की मुहिम चलाते हैं। हॉकरों की यह स्थिति मुंबई, दिल्ली, बेंगलूर और कोलकाता सहित देश के सभी बड़े शहरों में है। मुंबई में चर्चगेट, सीएसटी मार्केट, मुहम्मद अली रोड, बांद्रा, अंधेरी, दादर, घाटकोपर जैसे सबर्ब और दिल्ली में चांदनी चौक, कनाट प्लेस, पालिका बाजार, करोलबाग, लाजपत नगर, आईटीओ, शाहदरा आदि जैसे इलाके हॉकरों से भरे पड़े हैं।

हॉकर जरूरी क्यों:

बड़े शहरों में प्राय: लोगों के घरों और ऑफिसों में काफी दूरी होती है। उनके पास रोजमर्रा की चीजें लेने के लिए हर रोज मॉल, डिपार्टमेंटल स्टोर्स या मंडी जाने का समय नहीं होता। वे चाहते हैं कि उन्हें साग-सब्जी, फल-फूल, दूध-दही, बैग, अंडरगार्मेंट, शूज वगैरह जैसी रोजमर्रा की चीजें ऑफिस, घर, बस स्टैंड या लोकल स्टेशनों के पास ही मिल जाएं। फुटपाथ की ये चीजें क्वॉलिटी में थोड़ी कमजोर हो सकती हैं, लेकिन इनकी कीमत ऑर्गनाइज्ड मार्केट की तुलना में काफी कम होती है।

पिछले कई सालों से ये मार्केट लोगों की जिंदगी में इस कदर शामिल हो गए हैं कि उनका अपना ब्रैंड बन गया है। जैसे मुंबई का लिंकिंग रोड फैशन आर्टिकल्स के लिए, दादर टीटी अंडरगार्मेंट्स के लिए, लोखंडवाला मार्केट रेडिमेड गार्मेंट्स के लिए, दिल्ली का करोलबाग रेडीमेड कपड़ों के लिए, लाजपत राय मार्केट बिजली के सामान के लिए। इसके अलावा, हॉकर बड़े शहरों में अघोषित पुलिस का काम भी करते हैं। ये लोग लोकल होते हैं, इसलिए लोकल लोगों को जानते हैं। पिछले दिनों हॉकरों को हटाने के विरुद्ध यह तर्क भी दिया गया था कि उनके होने से मुंबई की सड़कें रात भर सेफ रहती हैं।

काले धन का स्रोत:

हॉकर मिडल क्लास की उन जरूरतों को पूरी करते हैं, जो मार्केट या मॉल पूरा नहीं कर पाते, क्योंकि वे खुलते हैं सुबह 10 बजे और वहां दाल में छौंक लगाने के लिए लहसुन-मिर्च-अदरक खरीदने नहीं भागा जा सकता। ऐसे हॉकर दुनिया के विकसित देशों में भी होते हंै। एमसीडी सूत्रों के अनुसार दिल्ली में करीब दो लाख हॉकर हैं। सुप्रीम कोर्ट की वर्ष 2007 की गाइड लाइन के अनुसार हॉकरों की संख्या किसी भी शहर की आबादी के ढाई परसेंट से अधिक नहीं होनी चाहिए। इस तरह यहां हॉकरों की संख्या कम है। लेकिन हॉकरों के लिए काम करने वाले एनजीओ इन आंकड़ों को फर्जी बताते हैं। उनका कहना है कि एमसीडी इनकी संख्या जानबूझकर कम बताती है, ताकि इनसे उगाही को लेकर उसे किसी परेशानी का सामना न करना पड़े।

पिछले कुछ सालों में हॉकरों की संख्या तेजी से बढ़ी है, क्योंकि इनके काम में मार्जिन काफी है। मुंबई में आधे से ज्यादा स्टॉल तो नेताओं और अधिकारियों के बन गए हैं। इस कारण फुटपाथ तो अब गायब ही हो गए हैं। मार्केट में पैर रखने की जगह नहीं होती और शॉपिंग सेंटर में लोग एक-दूसरे से टकराकर ही निकल सकते हैं। फुटपाथ न होने पर मजबूरन लोगों को सड़क पर चलना पड़ता है, जिससे आए दिन एक्सिडेंट होते रहते हैं।

सरकार ने कई बार हॉकरों को हॉकिंग जोन भी दिया, लेकिन वे वहां नहीं जाते क्योंकि ये जोन हाउसिंग सोसायटीज से दूर होते हैं। कई बार जगह तो मार्केट के लिए अलॉट की जाती है लेकिन हॉकर इससे कई गुना जगह घेर लेता है।

मुंबई में करीब तीन लाख हॉकर हैं, लेकिन लाइसेंस केवल आठ हजार के ही पास हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार यहां ये हॉकर हर महीने पुलिस, बीएमसी, लोकल दादाओं और राजनीतिक दलों को 100 से 1000 रुपये तक देते हैं। दिल्ली में 200 से 500 रुपये का रेट है, लेकिन कनॉट प्लेस, सरोजनी नगर मार्केट, लाजपत नगर, नेहरू प्लेस, करोल बाग जैसे कुछ बड़े कर्मशल इलाकों में रोजाना हजार रुपये भी भरने पड़ सकते हैं।

एक अनुमान के मुताबिक अकेले मुंबई में काले धन की यह इकॉनमी करीब पांच हजार करोड़ रुपये की है। पुलिस वाले भी आजकल सीधी कमाई नहीं करते। वे हॉकरों में से ही किसी को नेता बना देते हैं जो उगाही कर उन तक पहुंचाता है। इस पर कोई टैक्स नहीं देना पड़ता। इसीलिए जो भी सिविक एक्टिविस्ट या एनजीओ इनका विरोध करता है, उसका विरोध हॉकर तो करते ही हैं, इशारे-इशारे में पुलिस और सरकार भी उन्हें मुंह बंद रखने को कहती है।

हवा में पॉलिसी:

तीन साल पूर्व जब एमसीडी का विभाजन नहीं हुआ था, तब उसके नेता हॉकरों को बसाने के लिए एक पॉलिसी लेकर आए थे। इसका मकसद यह था कि भीड़भाड़ भरे इलाकों से निकालकर इन्हें राजधानी के उन इलाकों में एकसाथ बिठा दिया जाए, जहां एमसीडी की जगह खाली पड़ी है। सूत्र बताते हैं कि इस पॉलिसी के तहत करीब 90 हजार लोगों ने एमसीडी में आवेदन किया था। लेकिन पिछले साल जब एमसीडी का विभाजन हो गया तो यह पॉलिसी ठंडे बस्ते में डाल दी गई।

मुंबई में दो दशक से केवल 100 बीएमसी मार्केट चल रहे हैं जबकि इस दौरान आबादी कई गुना बढ़ गई है। 1998 से बीएमसी ने भाढे़ पावती (दैनिक किराया रिसीप्ट) इश्यू करना भी बंद कर दिया है। कुछ साल पहले सरकार ने स्ट्रीट वेंडर पॉलिसी घोषित कर दी थी लेकिन कुछ एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके इसका क्रियान्वयन रुकवा दिया। सूत्र बताते हैं कि इस तरह से पॉलिसी न लागू होने से बीएमसी-पुलिस को अरबों रुपये की काली कमाई का मौका मिल जाता है। ऐसी याचिका असल में पुलिस और बीएमसी के भ्रष्ट ऑफिसर ही दायर करवाते हैं।

 

- नंदकिशोर भारतीय / रामेश्वर दयाल

साभारः नवभारत टाइम्स