फर्श से अर्श तकः भारत के स्ट्रीट वेंडर को मिली आवाज

भारत की जीवन शैली का स्ट्रीट वेंडर्स (फेरी वाले) अभिन्न अंग हैं। नीले आसमां के नीचे खुली हवा में इन स्ट्रीट वेंडरों की जीविका सब्जी, फल, दूध, कपड़े व अन्य जरूरत का सामान बेच कर चलती है।
दिनेश कुमार दीक्षित भी एक ऐसे स्ट्रीट वेंडर हैं जिनकी गणना सामान्य भाषा में प्रचलित शब्द ‘रेहड़ी पटरी वालों’ में होती है। दिनेश कुमार दीक्षित जी ने अपने बहुमूल्य जीवन के 41 वर्ष दिल्ली की सड़कों पर कांच की चूड़ियां बेच कर जीवन निर्वाह करने में लगा दिया। उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में जन्में-पले दीक्षित ने अपने व्यवसाय का साधन चुना और आज उन्हें अपने व्यवसाय पर गर्व है। फिरोजाबाद की चूड़ियां न केवल भारत बल्कि विदेशों में भी विख्यात है। दिनेश कुमार दीक्षित की कहानी अत्यंत ही ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक है।

जीवन में मेहनत, ईमानदारी, सच्चाई से मंजिल को पाया जा सकता है। उनकी आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी मगर उन्होंने फिर भी कभी हिम्मत नहीं हारी।

फिरोजाबाद से दिल्ली आने पर खाली जेब होने के कारण दिनेश कुमार दीक्षित ने कई वर्ष फुटपाथ पर गुजारी। फुटपाथ को ही जीवन का सहारा बना लिया और उसी फुटपाथ ने उन्हें निराश भी नहीं होने दिया। मन में काम कर जीवन निर्वाह करने की ललक ने उन्हें अपनी पत्नी के आभूषण गिरवी रखने को मजबूर किया। 28 हजार रूपए पाकर उन्होंने चूड़ियां बेचने का धंधा फुटपाथ पर ही शुरू किया। दशकों तक प्रशासन की प्रताड़ना के शिकार भी होते रहे।

प्रशासन की प्रताड़ना ने उनके कोमल हृदय पर कई जख्म दिये हैं जिन्हें याद कर उनकी आंखे आज भी सजल हो उठती हैं मगर उन्होंने सच्चाई व ईमानदारी का रास्ता कभी नहीं छोड़ा, न किसी ग्राहक से गलत पैसा लिया। प्रशासनिक अधिकारी सामान उठाकर ले जाते थे, दिनेश कुमार दीक्षित नियमों के अनुसार जुर्माना अदाकर सामान वापस उठाकर पुनः फुटपाथ की शरण में आ जाते थे। ईमानदारी, सच्चाई का दामन विभिन्न कठिनाइयों के बीच भी नही छोड़ा।

दिनेश कुमार दीक्षित जैसे लाखों रेहड़ी पटरी वाले फुटपाथ दुकानदार, फेरी वाले आज भी देश की राजधानी दिल्ली में मौजूद हैं जिन पर कभी प्रशासनिक अधिकारी तो कभी तपते सूरज या बरसात की मार पड़ती ही रहती है मगर उनके चेहरे पर सदा मुस्कान ही बिखरती नजर आती है।

स्ट्रीट वेंडर्स (प्रोटेक्शन ऑफ लाइवलीहुड) एक्ट के पारित होने के बाद दीक्षित जी समेत लाखों पटरी वालों को कुछ राहत अवश्य मिली है। वे भी आज अपनी आवाज उठा सकते में सक्षम हुए हैं। आज दिनेश कुमार दीक्षित नई दिल्ली की प्रथम टाऊन वेंडिंग कमेटी में निर्वाचित सदस्य हैं। अपनी संघर्षपूर्ण गाथा को याद करते हुए दीक्षित जी अपनी सफलता का श्रेय अपनी स्वर्गवासी पत्नी को देना नहीं भूलते, जिन्होंने अपने पति का हर स्थिति में साथ देते हुए जीवन संगिनी का धर्म बखूबी निभाया। तीन साल पूर्व उनकी पत्नी का साथ क्रूर काल ने छीन लिया। दीक्षित जी पत्नी की यादों को समेटे कर्म पथ पर आज भी अग्रसर हैं।

फुटपाथ से जीवन यापन की शुरुआत करने वाले दिनेश कुमार दीक्षित का आज अपना मकान है जिसमें वे बेटे-बहू व उनके बच्चों के साथ रहते हैं। पूरा संयुक्त परिवार एक साथ भोजन कर काम के लिए निकलते हैं। कांच की चूड़ियां बेचने के व्यवसाय में अब दीक्षित जी का बेटा भी हाथ बंटा रहा है। सरोजनी नगर के मार्केट के पटरी बाजार में दीक्षित जी समय पर प्रतिदिन दुकान खोलते हैं और वहीं से अन्य पटरीवाले साथी दुकानदारों की समस्याओं का भी समाधान निकालने के प्रयास में जुटे रहते हैं। जो अधिकारी कभी उनकी सुनते नहीं थे आज उन्हीं के सामने बैठकर दीक्षित जी साथी पटरी वालों की आवाज उठाते हैं।

63 वर्षीय दिनेश कुमार दीक्षित साथी पटरी वालों के लिए हर समय उपलब्ध रहते हैं। समाज सेवा को ही जीवन का मकसद बना चुके हैं।
आज वह दिल्ली विधानसभा का भी चुनाव लड़कर विधायक बनने में प्रयासरत हैं ताकि समाज की आवाज अधिक प्रभावी ढंस से उठा सकें। दीक्षित जी कहते हैं अगर एक चायवाला प्रधानमंत्री बन सकता है तो एक चूड़ीवाला विधायक क्यों नहीं?

 

- तरुण वत्स
साभारः फ्रीडम्स चैंपियन
फोटा साभारः एटलसनेटवर्क.ऑर्ग