स्वस्थ सरकारी नीतियों के सात सिद्धांत.. भाग दो व तीन

जिस "स्वस्थ्य सरकारी नीति के सात सिद्धांतों'' की हम यहाँ चर्चा करने जा रहे हैं, वे मुक्त अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ हैं। उनमें से प्रत्येक किसी विशेष मुद्दे पर किस तरह लागू होता है, इस संबंध में हमारी राय अलग-अलग हो सकती है, पर ये सिद्धांत अपने आप में स्थापित सत्य हैं। इन्हें मैंने नहीं बनाया है। बल्कि मैंने इन्हें सिर्फ एक जगह इकट्ठा किया है। ऐसा नहीं है कि मुक्त अर्थ व्यवस्था के आधार स्तंभ सिर्फ ये ही हैं या सिर्फ यही सत्य है, लेकिन ये एक संतुलित और सम्यक विचार जरूर प्रस्तुत करते हैं। मेरा विश्वास है कि सरकार की प्रत्येक संरचना में बैठे लोग यदि इस दृष्टिकोण से चलें और मुख्य रूप से कानून बनाने वाले लोग यदि इसे समझें और पूरे विश्वास के साथ इसे लागू करें, तो हम अपेक्षाकृत अधिक सशक्त, मुक्त समृद्ध और पहले की तुलना में कहीं ज्यादा सुशासित लोग होंगे। 
 
अध्ययन की आसानी के लिए हम सात सिद्धांतों को सात कड़ियों में प्रस्तुत कर रहे हैं। प्रस्तुत है, स्वस्थ्य सरकारी नीतियों के सात सिद्धांत की दूसरी और तीसरी कड़ी
 
पहली कड़ी को पढ़ने के लिए क्लिक करें.. http://azadi.me/sound_public_policies_part_one
 
सिद्धांतः 2 - आप उसी की देखभाल करते हैं, जिनके आप मालिक हैं। जो किसी का नहीं या सबका है, उसका तो भगवान ही मालिक है
 
यह निजी संपत्ति के चमत्कारिक प्रभाव का राज बताता है। तथा दुनिया भर में समाजवादी व्यवस्था की दुर्गति का भी कारण बताता है।
 
पुराने सोवियत संघ में सरकार ने केंद्रीकृत योजना तथा राज्य की मिल्कियत की घोषणा कर दी। वे निजी संपत्ति को बिल्कुल समाप्त या न्यूनतम कर देना चाहते थे, क्योंकि उनका मानना था कि निजी स्वामित्त्व स्वार्थी और उत्पादन विरोधी होता है। उनका तर्क था कि सरकार के हाथों संसाधन का इस्तेमाल सबके फायदे के लिए होगा।
 
एक समय जो किसानों का भोजन था, वही सबका भोजन हो गया और लोग भूखों मरने लगे। जो फैक्टरी कभी उद्यमियों की होती थी, वह सार्वजनिक हो गयी और उसमें इतने भौंडे सामान बनने लगे, जो देश से बाहर कहीं बिक ही नहीं सकता था।
 
अब हम यह जान पा रहे हैं कि पुराना सोवियत साम्राज्य वस्तुतः एक के बाद एक अपने देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करता रहा। समाजवाद के सभी प्रयोगों का यही सबक है: समाजवादी जहाँ यह समझाने में काफी आगे रहते हैं कि आपको आमलेट बनाने के लिए अंडा तोड़ना ही होगा, वहीं सच यह है कि वे कभी आमलेट नहीं बना पाए। वे सिर्फ अंडे ही तोड़ते रह गये।
 
अगर आप यह सोचते हैं कि आप दूसरे की संपत्ति का खयाल रखना जानते हैं, तो आप एक महीने के लिए जाकर किसी और के घर में रहें या फिर किसी और की साइकिल चलाएँ। मैं दावा करता हूँ कि एक माह बाद न तो उसका घर और ना ही उसकी साइकिल वैसी नजर आएगी, जैसी उतने ही समय के बाद आपकी नजर आएगी।
 
अगर आप समाज के किसी दुर्लभ संसाधन को बर्बाद करना चाहते है, तो आपको कुछ और करने की जरूरत नहीं। बस उसे उन लोगों के हाथों से छीन लीजिए, जिन्होंने उसकी खोज की या जो उससे जीविका चलाते है, और उसका प्रबंधन किसी केंद्रीय सत्ता के हाथो सौंप दीजिए। एक झटके में ही आप सब कुछ बर्बाद कर देंगे। दुर्भाग्य से सरकार हमेशा हर स्तर पर ऐसे-ऐसे कानून बनाने में लगी रहती है, जो एक-एक कर निजी संपत्ति के अधिकार को खत्म कर उसे सार्वजनिक हाथों में डालते हैं।
 
सिद्धांत: 3 - सही नीति के लिए हमें दूरगामी और सभी पर होने वाले प्रभाव को देखना होगा, न कि चंद लोगों पर अल्पकालिक प्रभाव को
 
यह सही हो सकता है, जैसा कि ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन मेनर्ड केंस ने एक बार कहा था, कि लंबे अंतराल में हम सभी की मौत निश्चित है। लेकिन इससे किसी को ऐसी नीति लागू करने का अधिकार नहीं मिल जाना चाहिए, जो बहुत से लोगों को भविष्य में होने वाले नुकसान की कीमत पर कुछ लोगों को आज लाभ पहुँचाती हो।
 
मैं ऐसी कई नीतियों को याद कर सकता हूँ। जब लिंडन जॉनसन ने 1960 के दशक में एक महान समाज की कल्पना की थी, तो उनकी सोच थी कि कुछ लोगों को कल्याण चेक मिलेंगे। अब उसके परिणाम देखने को मिल रहे हैं, सरकार द्वार प्रदत्त इस अधिकार ने समाज में अकर्मण्यता फैलायी, परिवार तोड़े, एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी को पराश्रित बनाया और निराशा फैलायी, करदाताओं से काफी धन वसूला तथा इससे ऐसे बुरे सांस्कृतिक लक्षण सामने आए, जिसे शायद कई पीढ़ियों के बाद ही ठीक किया जा सके। इसी तरह से अतिशय खर्च तथा सरकार के विस्तार की नीति ने जहाँ शुरू में कुछ लोगों को लाभान्वित किया, वहीं दशकों तक राष्ट्र की अर्थव्यवस्था और नैतिक मूल्यों को घुन की तरह खाते रहे।
 
यह सिद्धांत वस्तुतः हमें संपूर्णता में सोचने की प्रेरणा देता है। यह कहता है कि हमें सतही फैसले नहीं लेने चाहिए। अगर एक चोर बैंक लूटकर लूटा गया सारा धन बगल वाले बाजार में खर्च कर डालता है, तो आपकी सोच वैसी स्थिति में संपूर्ण नहीं मानी जाएगी, यदि आप बाजार में पूछताछ कर इस निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं कि चोर ने बाजार में पूंजी लाकर अर्थव्यवस्था में तेजी लायी है।
 
हमें याद रखना चाहिए कि पिछले दिनों के नीति-निर्माताओं ने जिस कल को नजरंदाज करने की सलाह दी थी, उनके उसी भावी कल को हम वर्तमान के रूप में आज भुगत रहे हैं। अगर हमें एक जिम्मेदार व्यस्क बनना है, तो हम बच्चों जैसा व्यवहार नहीं कर सकते, जिनकी सोच खुद तक ही सीमित होती है और जो अभी और यहाँ से आगे नहीं सोच सकते।
 
- इकोनॉमिक क्लब ऑफ डेट्रॉयट के समक्ष प्रस्तुत विचार, डेट्रॉयट, मिशिगन, 29 अक्तूबर, 2001
 
 
लेखक परिचय
 
लॉरेंस डब्ल्यू रीड वर्तमान में फाऊंडेशन फॉर इकोनॉमिक एजुकेशन (एफईई अथवा फी) के प्रेसिडेंट हैं। फी से जुड़ने के पूर्व श्री रीड थिंकटैंक सेंटर, मैकिनेक सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी के प्रेसीडेंट रह चुके हैं। मैकिनेक सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी एक शोध एवं शिक्षण संस्थान है, जिसका मुख्यालय मिशिगन के मिडलैंड में है। सेंटर का उद्देश्य नागरिकों एवं नीति-निर्माताओं को मुक्त बाजार के दृष्टिकोण से सरकारी नीतियों का मूल्यांकन करने में सक्षम बनाना है। इनके नेतृत्त्व ने सेंटर को वाशिंगटन, डी.सी. के बाहर चल रहे 40 मुक्त बाजार थिंक टैंकों में सर्वाधिक विशाल बना दिया है। आज इन सभी में सर्वाधिक प्रभावशाली और सक्रिय थिंक टैंक के रूप में इसकी गिनती होने लगी है।
 
श्री रीड ग्रोव सिटी कॉलेज से अर्थशास्त्र में स्नातक (1975) और स्लिपरी रॉक स्टेट यूनिवर्सिटी से इतिहास में परास्नातक (1978) हैं। दोनों पेन्सिल्वेनिया में स्थित है। इन्होंने मिडलैंड के नॉर्थ वूड यूनिवर्सिटी में 1977 से 1984 ई तक अर्थशास्त्र का अध्यापन किया तथा 1982 से 1984 तक अर्थशास्त्र विभाग की अध्यक्षता की। सेंट्रल मिशिगन यूनिवर्सिटी ने 1994 में उन्हें लोक प्रशासन में डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया। 1988 में ग्रोव सिटी कॉलेज ने उन्हें डिस्टींग्विश्ड एलुमनी अवार्ड प्रदान किया।
 
पिछले 15 सालों में उन्होंने युनाइटेड स्टेट्स और इससे बाहर के अखबारों में 800 से अधिक स्तंभ तथा आलेख, 200 रेडियो कमेंट्री, पत्रिकाओं तथा जर्नलों में दर्जनों आलेख साथ ही साथ पाँच किताबें लिखी हैं। इसी काल में इन्होंने युनाइटेड स्टेट्स के 40 राज्यों तथा दस देशों में 700 से अधिक वक्तव्य दिये हैं। राजनीतिक, आर्थिक और पत्रकारिता संबंधी अपनी अभिरुचियों की बदौलत उन्होंने 1985 से अब तक छः महादेशों के 57 देशों की यात्रा की है।
 
1994 में रीड न्यूयॉर्क के इर्विंग्टन स्थित अमेरिका की सबसे पुरानी और प्रतिष्टित अर्थशास्त्र की संस्था फाउंडेशन फॉर इकोनॉमिक एजुकेशन के न्यासी परिषद (बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज) में चुने गये। फाउंडेशन आइडियाज ऑन लिबर्टी नाम से एक जर्नल प्रकाशित करता है। इसके लिए वे आइडियाज एवं कंसीक्वेंसेज' शीर्षक से मासिक स्तंभ लिखते हैं। 1998 से 2001 तक उन्होंने फाउंडेशन फॉर इकोनॉमिक एजुकेशन के न्यासी परिषद के चेयरमैन (अध्यक्ष) के रूप में अपनी सेवा दी।
 
 
- आजादी.मी