स्वस्थ सरकारी नीतियों के सात सिद्धांत.. भाग छह और सात

जिस "स्वस्थ्य सरकारी नीति के सात सिद्धांतों'' की हम यहाँ चर्चा करने जा रहे हैं, वे मुक्त अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ हैं। उनमें से प्रत्येक किसी विशेष मुद्दे पर किस तरह लागू होता है, इस संबंध में हमारी राय अलग-अलग हो सकती है, पर ये सिद्धांत अपने आप में स्थापित सत्य हैं। इन्हें मैंने नहीं बनाया है। बल्कि मैंने इन्हें सिर्फ एक जगह इकट्ठा किया है। ऐसा नहीं है कि मुक्त अर्थ व्यवस्था के आधार स्तंभ सिर्फ ये ही हैं या सिर्फ यही सत्य है, लेकिन ये एक संतुलित और सम्यक विचार जरूर प्रस्तुत करते हैं। मेरा विश्वास है कि सरकार की प्रत्येक संरचना में बैठे लोग यदि इस दृष्टिकोण से चलें और मुख्य रूप से कानून बनाने वाले लोग यदि इसे समझें और पूरे विश्वास के साथ इसे लागू करें, तो हम अपेक्षाकृत अधिक सशक्त, मुक्त समृद्ध और पहले की तुलना में कहीं ज्यादा सुशासित लोग होंगे। 
 
अध्ययन की आसानी के लिए हम सात सिद्धांतों को सात कड़ियों में प्रस्तुत करेंगे। प्रस्तुत है, स्वस्थ्य सरकारी नीतियों के सात सिद्धांत की अंतिम कड़ी
 
पहली कड़ी को पढ़ने के लिए क्लिक करें.. http://azadi.me/sound_public_policies_part_one
दूसरी व तीसरी कड़ी के लिए क्लिक करें http://azadi.me/sound_public_policies_part_two/three
चौथी व पांचवी कड़ी के लिए क्लिक करें http://azadi.me/sound_public_policies_part_four/five
 
सिद्धांत: 6 - सरकार किसी से कुछ लिए बिना किसी को कुछ भी नहीं दे सकती, और जो सरकार आपको सब कुछ दे सकने में समर्थ होती है, वह आपका सबकुछ ले लेने में भी समर्थ होती है
 
यह कोई अतिवादी, सरकार विरोधी, विचारधारात्मक कथन नहीं है। बस एक सीधा-सादा सच है। यह सरकार के चरित्र के बारे में बताने के लिए काफी है। और अमेरिका के संस्थापक के दर्शन और सुझाव के अनुरूप है।
 
जॉर्ज वाशिंगटन ने एक बार कहा था, सरकार की न तो कोई समझ होती है, न विचार होता है। यह सिर्फ एक शक्ति है। आग की तरह, यह एक खतरनाक सेवक भी हो सकती है अथवा डरावना मालिक भी। इस पर थोड़ा विचार कीजिए।
 
जॉर्ज वाशिंगटन कहते थे कि जबकि सरकार उतनी बड़ी भी नहीं है, जितना कि वे चाहते थे और अगर यह अपना कार्य उतनी अच्छी तरह भी करने लगे कि यह जनता की सेवक हो जाए, तब भी यह खतरनाक है। जैसा कि ग्रूचो ने एक मर्तबा हार्पो के बारे में कहा था कि वह ईमानदार है, पर आपको उस पर नजर रखनी होगी। सरकार चाहे कितनी ही अच्छी और कितनी ही छोटी क्यों न हो आपको उस पर नजर रखनी ही होगी जैसा कि जैफर्सन चेतावनी देते हुए कहते हैं कि सरकार की स्वाभाविक प्रवृत्ति ही अपना विस्तार करने की तथा पीछे हटने की है। अलेक्जेंडर हेमिल्टन ने काफी मायने की बात कही थी, किसी व्यक्ति की जीविका को नियंत्रित करने का अर्थ है, उसकी इच्छा को नियंत्रित करना।
 
तथाकथित कल्याणकारी राज्य का अर्थ सिर्फ इतना ही है कि एक गैरजिम्मेदार तथा खर्चीली नौकरशाही द्वारा राम की दौलत लूट कर श्याम को दे दी जाए। कल्याणकारी राज्य वैसे ही है, जैसे कि चिड़ियों को खिलाने के लिए पहले घोड़े को खिलाना, आप शायद समझ रहे होंगे कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ। इसे दूसरे तरीके से कहा जाए, तो सभी लोग एक गोल घेरा बनाकर खड़े हैं तथा सभी का हाथ दूसरे की जेब में है। कल्याणकारी राज्य को अंग्रेजी में वेलफेयर स्टेट कहते हैं। किसी ने कल्याणकारी राज्य अर्थात वेलफेयर स्टेट की तारीफ करते हुए कहा था कि इसे वेलफेयर स्टेट इसलिए कहते हैं कि इसमें राजनीतिज्ञों की भलाई (Well) होती है और बाकी जनता को फेयर (fare) अर्थात कीमत चुकानी होती है। इसी तर्ज पर हिंदी में कल्याणीकारी राज्य को इस प्रकार समझा जा सकता है कि कल्याणकारी राज्य एक ऐसा राज्य है, जिसमें राजनीतिक खिलाड़ियों के कल्याण के लिए बाकी सारी जनता कार्य करती है।
 
स्वतंत्र और आत्मनिर्भर लोग अपने भरण-पोषण के लिए सरकार की तरफ नहीं देखते। वे सरकार को खैरात बाँटना वाला कोई दानवीर नहीं समझते, बल्कि इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समर्थक समझते हैं और इसे गिने-चुने कार्यों, जैसे- शांति बनाए रखने, सबको अधिकाधिक अवसर प्रदान करने, तक सीमित कर देना चाहते हैं। उनके अनुसार सरकार को इन कार्यों के अलावा लोगों के जीवन में अनावश्यक दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए। सरकार पर निर्भरता वस्तुतः अपनी ही ताबूत में कील ठोकने के जैसा है, रोम से लेकर आज तक की सभी सभ्यताओं ने अपनी दुखद परिणति से यही सीखा है।
 
सिद्धांत: 7 - स्वतंत्रता जीवन का आधार है
 
हो सकता है कि पहले के छह सिद्धांत मुद्दे को स्पष्ट करने के लिए काफी न हों, इसलिए मैंने यह सातवाँ और अंतिम सिद्धांत जोड़ा है।
 
स्वतंत्रता सिर्फ एक मानसिक विलास या सुविचार मात्र नहीं है। यह एक सुखद संयोग अथवा रोजमर्रा के वैचारिक संघर्ष से कहीं बड़ी चीज है। यही वह चीज है, जिससे सबकुछ है। अगर यही नहीं हो, तो अपने सर्वोत्तम रूप में जीवन नीरस हो जाएगा, और निकृष्टतम रूप में जीवन जीने योग्य नहीं रहेगा।
 
अगर सरकारी नीति स्वतंत्रता को बाधित करने वाली हो, अथवा इसे मजबूत नहीं करती हो, तो जागरूक लोगों को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए। उन्हें पूछना चाहिए कि यदि वे अपनी आजादी से थोड़ा भी समझौता करते हैं, तो बदले में उन्हें क्या मिलेगा? उम्मीद यही की जानी चाहिए कि यह तात्कालिक लाभ का सपना दिखाकर दीर्घकालिक पीड़ा गले बांध देने जैसी बात नहीं होगी। बेन्जामिन फ्रैंकलिन ने तो यहाँ तक सुझाव दे डाला है कि जो तात्कालिक छोटी-मोटी सुरक्षा के लिए आवश्यक स्वतंत्रता छोड़ देते हैं, वे न तो स्वतंत्रता के अधिकारी हैं, न ही सुरक्षा के।
 
प्रायः आजकल नीति निर्माता नयी नीति बनाते समय स्वतंत्रता के बारे में जरा भी नहीं सोचते। अगर यह देखने में या सुनने में ठीक लग रहा हो या फिर यदि इससे उन्हें चुनाव जीतने में मदद मिलती हो, तो वे कुछ भी नीति बना डालते हैं। अगर कोई स्वतंत्रता संबंधी मुद्दों को उठाता भी है, तो उसका मजाक उड़ाकर उसे नजरंदाज कर दिया जाता है। अमेरिका में आज सरकार प्रत्येक स्तर पर लोगों के कुल उपार्जन का 42 प्रतिशत खा जाती है, जो 1900 ई में 6 या 7 प्रतिशत था। फिर भी शुक्र है कि कुछ लोग ऐसे हैं, जो उन लोगों से, जो सरकार के और भी विस्तार के समर्थक हैं, से यह प्रासंगिक सवाल पूछते हैं, 42 प्रतिशत क्यों काफी नहीं है?'', आप और कितना चाहते हैं?, या आपके विचार से व्यक्ति का उसके अपने मेहनत की कमाई पर कितना हक है?
 
मैं उस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहा हूँ, जब सभी अमेरिकी इन सात सिद्धांतों को जीवन में उतारने लगेंगे। आज ये काफी प्रासंगिक हैं। अगर हम इतिहास में झांक कर देखें, तो पता चलता है कि किसी-न-किसी रूप में इन सिद्धांतों में हमारी आस्था रही है और इसी से पता चलता है कि कैसे और क्यों हम आज इस धरती के मानव इतिहास में सर्वाधिक लोगों को सर्वश्रेष्ठ तरीके से रोटी, कपड़ा और मकान दे पाने में सफल हुए हैं। और ये सिद्धांत जीवन की आधारभूत जरूरत, स्वतंत्रता, को बरकरार रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। इन्हें आपके सामने रखने का अवसर देने के लिए हम आपके तहे दिल से आभारी हैं। और इसे आम व्यवहार में लाने के लिए हम आपके हमेशा शुक्रगुजार रहेंगे।
 
- लॉरेंस डब्ल्यू रीड 
- इकोनॉमिक क्लब ऑफ डेट्रॉयट के समक्ष प्रस्तुत विचार, डेट्रॉयट, मिशिगन, 29 अक्तूबर, 2001
 
लेखक परिचय
 
लॉरेंस डब्ल्यू रीड वर्तमान में फाऊंडेशन फॉर इकोनॉमिक एजुकेशन (एफईई अथवा फी) के प्रेसिडेंट हैं। फी से जुड़ने के पूर्व श्री रीड थिंकटैंक सेंटर, मैकिनेक सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी के प्रेसीडेंट रह चुके हैं। मैकिनेक सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी एक शोध एवं शिक्षण संस्थान है, जिसका मुख्यालय मिशिगन के मिडलैंड में है। सेंटर का उद्देश्य नागरिकों एवं नीति-निर्माताओं को मुक्त बाजार के दृष्टिकोण से सरकारी नीतियों का मूल्यांकन करने में सक्षम बनाना है। इनके नेतृत्त्व ने सेंटर को वाशिंगटन, डी.सी. के बाहर चल रहे 40 मुक्त बाजार थिंक टैंकों में सर्वाधिक विशाल बना दिया है। आज इन सभी में सर्वाधिक प्रभावशाली और सक्रिय थिंक टैंक के रूप में इसकी गिनती होने लगी है।
 
श्री रीड ग्रोव सिटी कॉलेज से अर्थशास्त्र में स्नातक (1975) और स्लिपरी रॉक स्टेट यूनिवर्सिटी से इतिहास में परास्नातक (1978) हैं। दोनों पेन्सिल्वेनिया में स्थित है। इन्होंने मिडलैंड के नॉर्थ वूड यूनिवर्सिटी में 1977 से 1984 ई तक अर्थशास्त्र का अध्यापन किया तथा 1982 से 1984 तक अर्थशास्त्र विभाग की अध्यक्षता की। सेंट्रल मिशिगन यूनिवर्सिटी ने 1994 में उन्हें लोक प्रशासन में डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया। 1988 में ग्रोव सिटी कॉलेज ने उन्हें डिस्टींग्विश्ड एलुमनी अवार्ड प्रदान किया।
 
पिछले 15 सालों में उन्होंने युनाइटेड स्टेट्स और इससे बाहर के अखबारों में 800 से अधिक स्तंभ तथा आलेख, 200 रेडियो कमेंट्री, पत्रिकाओं तथा जर्नलों में दर्जनों आलेख साथ ही साथ पाँच किताबें लिखी हैं। इसी काल में इन्होंने युनाइटेड स्टेट्स के 40 राज्यों तथा दस देशों में 700 से अधिक वक्तव्य दिये हैं। राजनीतिक, आर्थिक और पत्रकारिता संबंधी अपनी अभिरुचियों की बदौलत उन्होंने 1985 से अब तक छः महादेशों के 57 देशों की यात्रा की है।
 
1994 में रीड न्यूयॉर्क के इर्विंग्टन स्थित अमेरिका की सबसे पुरानी और प्रतिष्टित अर्थशास्त्र की संस्था फाउंडेशन फॉर इकोनॉमिक एजुकेशन के न्यासी परिषद (बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज) में चुने गये। फाउंडेशन आइडियाज ऑन लिबर्टी नाम से एक जर्नल प्रकाशित करता है। इसके लिए वे आइडियाज एवं कंसीक्वेंसेज' शीर्षक से मासिक स्तंभ लिखते हैं। 1998 से 2001 तक उन्होंने फाउंडेशन फॉर इकोनॉमिक एजुकेशन के न्यासी परिषद के चेयरमैन (अध्यक्ष) के रूप में अपनी सेवा दी।

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