स्वस्थ सरकारी नीतियों के सात सिद्धांत.. भाग चार और पांच

जिस "स्वस्थ्य सरकारी नीति के सात सिद्धांतों'' की हम यहाँ चर्चा कर रहे हैं, वे मुक्त अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ हैं। उनमें से प्रत्येक किसी विशेष मुद्दे पर किस तरह लागू होता है, इस संबंध में हमारी राय अलग-अलग हो सकती है, पर ये सिद्धांत अपने आप में स्थापित सत्य हैं। इन्हें मैंने नहीं बनाया है। बल्कि मैंने इन्हें सिर्फ एक जगह इकट्ठा किया है। ऐसा नहीं है कि मुक्त अर्थ व्यवस्था के आधार स्तंभ सिर्फ ये ही हैं या सिर्फ यही सत्य है, लेकिन ये एक संतुलित और सम्यक विचार जरूर प्रस्तुत करते हैं। मेरा विश्वास है कि सरकार की प्रत्येक संरचना में बैठे लोग यदि इस दृष्टिकोण से चलें और मुख्य रूप से कानून बनाने वाले लोग यदि इसे समझें और पूरे विश्वास के साथ इसे लागू करें, तो हम अपेक्षाकृत अधिक सशक्त, मुक्त समृद्ध और पहले की तुलना में कहीं ज्यादा सुशासित लोग होंगे। 
 
अध्ययन की आसानी के लिए हम सात सिद्धांतों को सात कड़ियों में प्रस्तुत कर रहे हैं। प्रस्तुत है, स्वस्थ्य सरकारी नीतियों के सात सिद्धांत की चौथी और पांचवी कड़ी
 
पहली कड़ी को पढ़ने के लिए क्लिक करें.. http://azadi.me/sound_public_policies_part_one
दूसरी व तीसरी कड़ी के लिए क्लिक करें http://azadi.me/sound_public_policies_part_two/three
 
सिद्धांत: 4 - आप जिस चीज को प्रोत्साहित करते हैं, वह बढ़ती है; तथा जिस चीज को हतोत्साहित करते हैं, वह कम होती जाती है।
 
मनुष्य के रूप में मैं और आप प्रोत्साहन पर काम करने वाले प्राणी हैं। प्रोत्साहन के प्रति हम प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। और कभी-कभी इस प्रोत्साहन का हमारे व्यवहार पर काफी तीव्र असर होता है। इस बात को नहीं समझने वाले नीति निर्माता उटपटांग हरकतें करते रहते हैं, जैसे - कुछ गतिविधियों पर कर बढ़ा देते हैं और सोचते हैं कि हम पहले की तरह वे कार्य उतनी ही मात्रा में करते रहेंगे, मानो हम लोग बकरी - भेड़े हों और हलाल होने के लिए ही काम कर रहे हों।
 
अमेरिका का एक उदाहरण गौरतलब है। जॉर्ज बुश (पहले वाले) ने 1988 में कर में किसी प्रकार की वृद्धि नहीं करने का वचन दिया था। पर कुछ दबावों के तहत काँग्रेस ने 1990 में नौका, हवाई जहाज एवं गहनों पर कर बढ़ा दिया। उसका सोचना था कि ये चीजें अमीर लोग रखते हैं, इसलिए इन पर अतिरिक्त कर लगाना चाहिए। उन्हें इस कर वृद्धि से पहले साल 31 मीलियन डॉलर के अतिरिक्त राजस्व की प्राप्ति का अनुमान था, पर हुआ कुछ और ही। उन्हें सिर्फ 16 मीलियन डॉलर की ही प्राप्ति हुई। इसके साथ ही उन्हें 24 मीलियन डॉलर बेरोजगारी भत्ते पर खर्च करने पड़े। कारण यह था कि कर में वृद्धि के कारण उपर्युक्त तीन उद्योगों में भारी संखया में मजदूरों की छंटनी की गयी। आप खुद सोच सकते हैं कि कानून बनाने वाले जब बिना प्रोत्साहन का ध्यान रखे कोई कदम उठाते हैं, तो क्या होता है। 3.1 करोड़ की उम्मीद कर सिर्फ 1.6 करोड़ की प्राप्ति और उसके लिए भी 2.4 करोड़ डॉलर का खर्च। इससे क्या सीख मिलती है।
 
आप परिवार को तोड़ना चाहते हैं? तो अभिभावकों के बीच बँटवारा होने पर बड़ी आर्थिक मदद की व्यवस्था कर दीजिए। बचत और निवेश घटाना चाहते हैं? तो उन पर दो गुना कर लगा दीजिए तथा अधिक संपत्ति अर्जित होने पर भी अतिरिक्त कर लगा दीजिए। आप चाहते हैं कि लोग काम न करे? कर इतना बढ़ा दीजिए कि लोगों को लगने लगे कि काम करने से कोई लाभ नहीं।
 
फिलहाल सरकार का अधिक ध्यान इस प्रश्न पर लगा रहता है कि मंदी ओर राजस्व की कमी से होने वाले घाटे की भरपाई कैसे की जाए। मैकिनेक सेंटर का मानना है कि सरकार इस समस्या से ठीक उसी तरह निपटे जैसे पूरे देश भर के परिवार ऐसी समस्या से निपटते हैं: यानी, खर्चे में कटौती। यह विशेषकर तब और भी जरूरी हो जाता है, जब हम एक कमजोर अर्थव्यवस्था को गतिशील कर रोजगार और राजस्व बढ़ाना चाहें। डॉक्टर मरीज का खून बहाने से यथासंभव बचना चाहते हैं।
 
सिद्धांत: 5 - दूसरे का धन लोग बेरहमी से उड़ाते हैं और अपना धन जान लगाकर भी बचाते हैं
 
कभी आपको आश्चर्य हुआ है कि जब सरकार 600 डॉलर का हथौड़ा और 800 डॉलर का टॉयलेट शीट खरीदती है? आप पूरे अमेरिका में घूम आइए, आपको शायद ही कोई मिले जो इतनी दरियादिली से अपना पैसा खर्च करता हो। फिर भी सरकार में प्रायः और कुछ अन्य मामलों में भी यदा कदा इसी प्रकार पैसे खर्च किए जाते हैं। आखिर क्यों? क्योंकि कमोबेश ऐसे मामलों में खर्च करने वाला किसी और का पैसा खर्च कर रहा होता है। अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रिडमैन ने कुछ समय पूर्व इसे थोड़ा स्पष्ट किया था। उनके अनुसार धन सिर्फ चार प्रकार से खर्च किया जाता है। जब आप अपना धन अपने ऊपर खर्च करते हैं, तो कभी-कभी ही गलती करते हैं। गलतियाँ काफी कम होती हैं और लंबे समय पर होती हैं। इसमें कमाने वाले, खर्च करने वाले तथा इसका अंतिम लाभ उठाने वाले के बीच रिश्ता सर्वाधिक मजबूत, सीधा और निकट का होता है।
 
जब आप अपने पैसे से किसी दूसरे के लिए कोई उपहार खरीदते हैं, तो आप यह ध्यान जरूर रखते हैं, कि आप जो कुछ भी खरीदें सामान उतनी कीमत का तो हो ही यानी, आप ठगे न जाएँ। पर दूसरे के लिए उस सामान का क्या महत्त्व होगा या वह उसके लिए कितना जरूरी होगा, इसका ध्यान नहीं रखते।
 
जब आप किसी दूसरे के पैसे से अपने लिए कुछ खरीदते हैं, उदाहरण के लिए जब खर्च खाता से भोजन खरीदते हैं, तो आप यह जरूर सोचते हैं कि बढ़िया से बढ़िया चीज खरीदी जाए, पर वह सस्ता भी हो उसकी उतनी फिक्र नहीं करते।
 
और अंत में, जब आप किसी दूसरे के पैसे से किसी तीसरे के लिए कोई चीज खरीदते हैं, तो कमाने वाले, खर्च करने वाले और लाभान्वित होने वाले के बीच संबंध काफी दूर का हो जाता है और यहाँ बर्बादी और घपले की संभावना भी सर्वाधिक होती है। इस पर गौर से सोचिए कोई एक व्यक्ति किसी दूसरे का पैसा किसी तीसरे पर खर्च करे। यही तो सरकार करती है।
 
लेकिन यह सिद्धांत सिर्फ सरकार के लिए ही प्रांसंगिक नहीं है। 1993-94 की बात याद आती है, जब मैकिनेक सेंटर ने मिशिगन शिक्षा संगठन के स्वार्थपूर्ण वक्तव्य को गंभीरता से लेते हुए उस पर कुछ पड़ताल की थी। इस संगठन ने कहा था कि वह शिक्षा जिला द्वारा दिये जाने वाले किसी भी प्रतियोगी विद्यालय सहायक ठेकों, जैसे - बस, भोजन या रखरखाव, आदि का कहीं भी, कभी भी, विरोध करेगा। हमने पता लगाया, तो यह पता चला कि मिशिगन शिक्षा संगठन के अपने पॉश और आलीशान ईस्ट लांसिंग मुख्यालय में साफ सफाई और भोजन प्रबंधन पर अपना कोई भी पूर्ण-कालिक, संगठित कर्मचारी नियुक्त नहीं है। इन्होंने अपने सभी कैफेटेरिया, रखरखाव, सुरक्षा और डाक सेवा को निजी कंपनियों को ठेके पर दे रखा था, और जिसमें चार में से तीन असंगठित थे।
 
इस प्रकार मिशिगन शिक्षा संगठन, यानी, रसोइयों, सफाई कर्मचारियों, बस चालकों और शिक्षकों का राज्य का सबसे बड़ा संगठन, एक ओर जहाँ अपने धन को किसी और तरह से खर्च करता है, वहीं दूसरी ओर आम लोगों के कर से मिले पैसे को किसी और तरह से खर्च करने की वकालत करता है। कोई भी - मैं पुनः कहना चाहूंगा - कि कोई भी व्यक्ति दूसरे के धन को उतनी ही किफायत से खर्च नहीं करता, जितनी किफायत से वह अपने धन को खर्च करता है।
 
- आजादी.मी

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