स्वस्थ सरकारी नीतियों के सात सिद्धांत.. भाग एक

जिस "स्वस्थ्य सरकारी नीति के सात सिद्धांतों'' की हम यहाँ चर्चा करने जा रहे हैं, वे मुक्त अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ हैं। उनमें से प्रत्येक किसी विशेष मुद्दे पर किस तरह लागू होता है, इस संबंध में हमारी राय अलग-अलग हो सकती है, पर ये सिद्धांत अपने आप में स्थापित सत्य हैं। इन्हें मैंने नहीं बनाया है। बल्कि मैंने इन्हें सिर्फ एक जगह इकट्ठा किया है। ऐसा नहीं है कि मुक्त अर्थ व्यवस्था के आधार स्तंभ सिर्फ ये ही हैं या सिर्फ यही सत्य है, लेकिन ये एक संतुलित और सम्यक विचार जरूर प्रस्तुत करते हैं। मेरा विश्वास है कि सरकार की प्रत्येक संरचना में बैठे लोग यदि इस दृष्टिकोण से चलें और मुख्य रूप से कानून बनाने वाले लोग यदि इसे समझें और पूरे विश्वास के साथ इसे लागू करें, तो हम अपेक्षाकृत अधिक सशक्त, मुक्त समृद्ध और पहले की तुलना में कहीं ज्यादा सुशासित लोग होंगे। 
 
अध्ययन की आसानी के लिए हम सात सिद्धांतों को सात कड़ियों में प्रस्तुत करेंगे। प्रस्तुत है, स्वस्थ्य सरकारी नीतियों के सात सिद्धांत की पहली कड़ी
 
सिद्धांतः 1- स्वतंत्र लोग एक समान नहीं होते और एक समान लोग स्वतंत्र नहीं होते
 
सर्वप्रथम मैं यहाँ साफ कर देना चाहता हूँ कि हम यहाँ किस प्रकार की समानता की बात कर रहे हैं। हम यहाँ कानून के समक्ष हर आदमी की समानता की बात नहीं कर रहे हैं, जिसमें आपकी जाति, धर्म, लिंग, वर्ग, इत्यादि से ऊपर उठ कर आपको देखा जाता है तथा आप दोषी हैं या निर्दोष यह सिर्फ इस आधार पर तय होता है कि आपने कोई अपराध किया है या नहीं। यही पश्चिमी सभ्यता का आधार है। यद्यपि प्रायः हम इस पर पूर्णतः खरे नहीं उतर पाते हैं और मुक्षे आशंका है कि कोई कल इस धारणा का विरोध न करने लगे।
 
नहीं, मैं यहाँ जिस समानता की बात कर रहा हूँ, उसका संबंध आमदनी एवं भौतिक जगत से है- जो हम विनिमय, कार्य और व्यवसाय के बाजार में कमाते और उपार्जित करते हैं। मैं आर्थिक समानता की बात कर रहा हूँ। हम इस पहले सिद्धांत को लें और इसे  दो भागों में विभक्त करें।
 
स्वतंत्र लोग समान नहीं होते। जब लोगों को अपने रास्ते पर चलने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया जाता है, यानी, जब उन्हें अपनी भलाई तथा अपने परिवार की बेहतरी के लिए अपनी तरह से मेहनत करने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया जाता है, तो इसका परिणाम बाजार में समान आमदनी के रूप में नहीं आता है। उनकी कमाई का स्तर अलग अलग होगा। और वे अलग अलग मात्रा में संपत्ति खड़ी करेंगे। कुछ लोग जहाँ इस बात का रोना रोएंगे और गंभीरता पूर्वक अमीरों और गरीबों के बीच की खाई के बारे में बात करेंगे, वहीं मेरा मानना है कि मनुष्य को एक मुक्त समाज मिलना ही एक बड़े किस्मत की बात है। दुनिया में हर आदमी अनूठा है और किसी भी जीवित अथवा मृत व्यक्ति से अनेक मामलों में अलग है। तो हम ऐसा माहौल क्यों न बनाएँ, जिसमें सभी व्यक्ति का प्रदर्शन बाजार में एक जैसा हो। हम प्रतिभा के स्तर पर अलग हैं। किसी के पास अधिक प्रतिभा है या विशेष प्रतिभा है। और किसी को जीवन के उत्तरार्द्ध में जाकर अपनी प्रतिभा का पता चलता है अथवा कभी पता ही नहीं चलता पाता। सचिन तेंदुलकर बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ी हैं। तो इसमें क्या आश्चर्य यदि उनके पास मुझसे ज्यादा पैसा है। क्या कैलॉग को 46 वर्ष की अवस्था में जाकर अपनी उद्यम शक्ति और मार्केटिंग प्रतिभा का पता नहीं चल पाया। इससे पहले वह अपने बड़े भाइयों के साथ काम करता था और कठिन परिश्रम कर सिर्फ 25 डॉलर प्रति सप्ताह ही कमा पाता था।
 
हम मेहनत करने की भावना एवं इच्छाशक्ति में एक दूसरे से अलग हैं। कुछ लोग कठिन मेहनत करते हैं, लंबे समय तक करते हैं और अनोखे अंदाज में करना जानते हैं। इसके कारण लोग हमारी मेहनत का मूल्य भी अलग-अलग लगाते हैं।
 
हमारी बचत क्षमता भी अलग-अलग है। अगर भारत के प्रधान मंत्री चुटकी बजाकर रातोंरात देश के सभी लोगों की आर्थिक दशा एक जैसी कर दें, तब भी कल इस समय तक आते-आते हमारी हैसियत अलग-अलग हो जाएगी। कुछ लोग पैसे खर्च कर देंगे, तो कुछ लोग बचा लेंगे। ये तीन कारण हैं, पर सिर्फ यही तीन कारण नहीं हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि लोग आर्थिक रूप से समान नहीं हो सकते।
 
मेरे प्रथम सिद्धांत का दूसरा अंश, समान लोग स्वतंत्र नहीं होते, असली मुद्दे को छूता है। मुझे धरती पर एक भी ऐसा व्यक्ति दिखाइए, जिनकी आर्थिक हैसियत बराबर है, तो मैं आपको तुरंत ऐसे लोग दिखा दूंगा, जो स्वतंत्र नहीं हैं। क्यों?
 
एक मात्र उपाय, जिसके द्वारा समाज के सभी लोगों की आय और संपत्ति समान करने की, अगर थोड़ी-सी भी, गुंजाइश है, तो वह यह है कि सभी के सिर पर बंदूक टिका दी जाए। आपको सभी को समान करने के लिए शब्दसः शक्ति का इस्तेमाल करना होगा। आपको कठोर सजा और मुत्युदंड के प्रावधान के साथ आदेश देने होंगे। ये आदेश इस प्रकार होंगे: खबरदार! तुम किसी से बेहतर नहीं कर सकते। दूसरे से कठिन मेहनत करने की तुम्हें इजाजत नहीं। दूसरे से बेहतर तरीके से कार्य का निष्पादन मत करो। दूसरों की अपेक्षा अधिक बुद्धिमानी पूर्वक पैसे की बचत मत करो। ऐसी वस्तु और सेवा मत पेश करो, जिसे लोग तुम्हारे प्रतियोगी के उत्पाद से ज्यादा पसंद करने लगें।
 
विश्वास कीजिए आप ऐसा समाज कभी नहीं चाहेंगे, जहाँ ऐसे आदेश हों। 1970 में साम्यवादी खमेर रुज शासन काल में कंबोडिया की स्थिति लगभग ऐसी ही हो गयी थी। परिणाम 4 साल से भी कम समय में कुल 80 लाख लोगों में से 20 लाख लोग मारे गये। सत्ता और शक्ति के शिखर पर बैठे कुछ संभ्रांत लोगों को छोड़ दिया जाए, तो बाकी लोग पाषाण काल से बेहतर किसी भी स्थिति में नहीं थे।
 
इस पहले सिद्धांत से कौन-सा सबक मिलता है? लोगों की आय के अंतर के मुद्दे पर मत अटक जाइए, वह व्यक्ति के अपने-अपने रास्ते पर अपने तरीके से चलने के कारण पैदा होता है। अगर वह किसी राजनीतिक बाध्यता के कारण हे, तो उस बाध्यता से मुक्त होने की कोशिश जरूर कीजिए। लेकिन भूल से भी असमान लोगों को दबा-दबा कर एक समान मत कीजिए। आप कभी ऐसा नहीं कर पाएंगे। बल्कि इससे समाज में वैमनस्य ही बढ़ेगा तथा लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाएंगे।
 
उदाहरण के तौर पर तरह-तरह के कर। ये लोगों को बराबर नहीं करते, बल्कि मेहनती और उद्यमी लोगों को देश छोड़ने अथवा दूसरे व्यवसाय में चले जाने के लिए मजबूर करते हैं और आराम से कमा-खा रहे बाकी लोगों को गरीब बनाते हैं। अब्राहम लिंकन की प्रसिद्ध उक्ति है, आप किसी एक को नीचे खींच कर किसी दूसरे को ऊपर नहीं उठा सकते।
 
- इकोनॉमिक क्लब ऑफ डेट्रॉयट के समक्ष प्रस्तुत विचार, डेट्रॉयट, मिशिगन, 29 अक्तूबर, 2001
 
 
लेखक परिचय
 
लॉरेंस डब्ल्यू रीड वर्तमान में फाऊंडेशन फॉर इकोनॉमिक एजुकेशन (एफईई अथवा फी) के प्रेसिडेंट हैं। फी से जुड़ने के पूर्व श्री रीड थिंकटैंक सेंटर, मैकिनेक सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी के प्रेसीडेंट रह चुके हैं। मैकिनेक सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी एक शोध एवं शिक्षण संस्थान है, जिसका मुख्यालय मिशिगन के मिडलैंड में है। सेंटर का उद्देश्य नागरिकों एवं नीति-निर्माताओं को मुक्त बाजार के दृष्टिकोण से सरकारी नीतियों का मूल्यांकन करने में सक्षम बनाना है। इनके नेतृत्त्व ने सेंटर को वाशिंगटन, डी.सी. के बाहर चल रहे 40 मुक्त बाजार थिंक टैंकों में सर्वाधिक विशाल बना दिया है। आज इन सभी में सर्वाधिक प्रभावशाली और सक्रिय थिंक टैंक के रूप में इसकी गिनती होने लगी है।
 
श्री रीड ग्रोव सिटी कॉलेज से अर्थशास्त्र में स्नातक (1975) और स्लिपरी रॉक स्टेट यूनिवर्सिटी से इतिहास में परास्नातक (1978) हैं। दोनों पेन्सिल्वेनिया में स्थित है। इन्होंने मिडलैंड के नॉर्थ वूड यूनिवर्सिटी में 1977 से 1984 ई तक अर्थशास्त्र का अध्यापन किया तथा 1982 से 1984 तक अर्थशास्त्र विभाग की अध्यक्षता की। सेंट्रल मिशिगन यूनिवर्सिटी ने 1994 में उन्हें लोक प्रशासन में डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया। 1988 में ग्रोव सिटी कॉलेज ने उन्हें डिस्टींग्विश्ड एलुमनी अवार्ड प्रदान किया।
 
पिछले 15 सालों में उन्होंने युनाइटेड स्टेट्स और इससे बाहर के अखबारों में 800 से अधिक स्तंभ तथा आलेख, 200 रेडियो कमेंट्री, पत्रिकाओं तथा जर्नलों में दर्जनों आलेख साथ ही साथ पाँच किताबें लिखी हैं। इसी काल में इन्होंने युनाइटेड स्टेट्स के 40 राज्यों तथा दस देशों में 700 से अधिक वक्तव्य दिये हैं। राजनीतिक, आर्थिक और पत्रकारिता संबंधी अपनी अभिरुचियों की बदौलत उन्होंने 1985 से अब तक छः महादेशों के 57 देशों की यात्रा की है।
 
1994 में रीड न्यूयॉर्क के इर्विंग्टन स्थित अमेरिका की सबसे पुरानी और प्रतिष्टित अर्थशास्त्र की संस्था फाउंडेशन फॉर इकोनॉमिक एजुकेशन के न्यासी परिषद (बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज) में चुने गये। फाउंडेशन आइडियाज ऑन लिबर्टी नाम से एक जर्नल प्रकाशित करता है। इसके लिए वे आइडियाज एवं कंसीक्वेंसेज' शीर्षक से मासिक स्तंभ लिखते हैं। 1998 से 2001 तक उन्होंने फाउंडेशन फॉर इकोनॉमिक एजुकेशन के न्यासी परिषद के चेयरमैन (अध्यक्ष) के रूप में अपनी सेवा दी।

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.