सामाजिक खर्च तो पहले ही काफी अधिक हो रहा है

विकास और सामाजिक खर्च को लेकर पिछले एक-दो महीने से इंटरनेट पर अर्थशास्त्रियों के बीच बहस छिड़ी हुई है। फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा शुरू किए गए इस बहस में नोबल पुरस्कार विजेता और जाने-माने अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन को यह कहते हुए उद्धृत किया गया कि सामाजिक खर्च में वृद्धि नहीं कर सिर्फ दोहरे अंकों की विकास दर हासिल करने पर ध्यान देना नासमझी होगी। समाचार पत्र ने इसके जवाब में नोबेल पुरस्कार के एक दूसरे दावेदार जगदीश भगवती को भी उद्धृत किया, जिन्होंने कहा कि सामाजिक खर्च बढ़ाने से अधिक जरूरी है कि उसे बेहतर तरीके से लक्षित किया जाए और उसके लिए अधिक-से-अधिक धन की व्यवस्था करने के लिए विकास दर बढ़ाने की जरूरत है और उसके लिए दूसरी पीढ़ी का आर्थिक सुधार किया जाना जरूरी है।

मेरे खयाल से फाइनेंसियल टाइम्स के मार्टिन वोल्फ ने इस बहस में सबसे मार्के की बात कही है। ‘‘जाहिर तौर पर सरकार की कल्याणकारी योजनाओं, अधिकाधिक रोजगार, आदि के लिए आमदनी बढ़ाना सबसे जरूरी शर्त है। इसे समझने के लिए किसी बहस की जरूरत नहीं है। वास्तविकता यह है कि केवल भारत के बुद्धिजीवी ही ऐसे सवालों पर बहस करने की सोच सकते है।’’ उन्होंने बिल्कुल सही बात कही है।

विकास या सामाजिक विकास की बहस में पड़ने की बजाए, यहां मैं वामपंथी विश्लेषकों और राजनीतिज्ञों की स्वार्थपूर्ण सोच को पहले सामने लाना चाहूंगा। सेन ने वास्तव में सामाजिक खर्च बढ़ाने में असफल रहने के लिए सरकार को नहीं लताड़ा। लेकिन वामपंथी विश्लेषकों और नेताओं की एक बड़ी फौज है, जो लगातार लोगों को यह कहकर गुमराह कर रही है कि सरकार जरूरत से कहीं ज्यादा नवउदारवादी होती जा रही है और सामाजिक खर्च को नजरंदाज कर सिर्फ तेज विकास पर ध्यान केंद्रित कर रही है। आखिर किस दुनिया में रह रहे हैं ये लोग? वास्तविकता तो यह है कि आज काफी अधिक सामाजिक खर्च हो रहा है।

हाल के दिनों में हुए घोटालों पर नजर डालें तो स्पष्ट हो जाएगा कि सरकार की प्राथमिकता सूची में तेज विकास का लक्ष्य सबसे नीचे है। जब अशोक चव्हान और दूसरे लोग कथित तौर पर सेना से सम्बंधित एक इमारत में अपने रिश्तेदारों और मित्रों के लिए मकान कब्जाने में लगे हुए थे, तो क्या उनका ध्यान वाकई तेज आर्थिक विकास दर पर था? क्या यह वह नवउदारवाद था, जिस पर सभी नियम-कानूनों को ताक पर रख देने का आरोप लगाया जाता रहा है? या फिर नेता-बाबू राज का एक उदाहरण है, जिसमें समाजवाद का नाम देकर कुछ नियम-कानून गढ़े जाते हैं और बाद में उसका इस्तेमाल अपनी जेबें भरने के लिए किया जाता है।

जब सुरेश कलमाड़ी और कुछ अन्य लोग राष्ट्रमंडल खेल के दौरान अपने चहेते ठेकेदारों को दोनों हाथ से रेवड़ियां बांट रहे थे, तब भी क्या उनके दिमाग में सिर्फ देश का जीडीपी विकास ही था? या उनका पूरा ध्यान अपनी निजी संपत्ति के तेज विकास पर था?

जब पूर्व दूरसंचार मंत्री राजा कथित तौर पर कुछ चहेते कारोबारियों को लाभ पहुंचाने के लिए 2जी स्पेक्ट्रम बांटने में अनियमितता बरत रहे थे और कैग के मुताबिक जिसके कारण सरकार को करीब 1.76 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था, क्या तब भी वो आर्थिक विकास को बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे। नहीं! उनकी उस गतिविधि से रानीतिज्ञों की एक रणनीति का पता चलता है: आर्थिक विकास के लिए भले ही कितने भी नियंत्रण हटाए जा रहे हों, लेकिन दूसरे क्षेत्रों में नियंत्रण को लगातार बढ़ाते रहना चाहिए, ताकि राजनीति एक फायदेमंद कारोबार बना हुआ रहे।

दूसरे कारोबार की ही तरह, राजनीति में भी चुनाव जीतने के लिए बहुत अधिक निवेश करने की जरूरत होती है। जाहिर है ऐसे में राजनीतिज्ञ अपने निवेश का ज्यादा से ज्यादा फायदा चाहते हैं। लेकिन लोकतंत्र में बहुत संभव है कि वो दूबारा चुन कर कभी ना आ पाएं या उन्हें कोई दूसरा कैबिनेट मिल जाए। ऐसे में उन्हें मिला कोई भी अवसर उनके लिए पैसा बनाने का आखिरी मौका साबित हो सकता है। इसलिए जब भी उनको मौका मिलता है वे उसका इतना अधिक लाभ उठाने की कोशिश करते है, ताकि यदि उन्हें जीवन में फिर कभी मौका नहीं मिले तब भी उन्हें कोई कमी नहीं रहे।

भारत में सभी राजनीतिक पार्टियां एक निवेशक हैं, जो अच्छी तरह जानती हैं कि अधिक-से-अधिक पैसा कैसे कमाया जाता है। लेकिन इन पार्टियों में कांग्रेस सबसे बड़ा व्यवसायिक घराना है। उसे पता है कि लोकतंत्र का लाभ तभी उठाया जा सकता है, जब लोगों को दिखे कि पार्टी आम लोगों को काफी खैरात बांट रही है, भले ही दूसरी ओर पार्टी बड़े पैमाने पर गैरकानूनी कमाई कर रही हो। सोनिया-मनमोहन सिंह का पिछला सात साल का शासन इसी मूल सिद्धांत पर चल रहा है। दूसरी पीढ़ी के आर्थिक विकास को तो काफी पीछे भुला दिया गया है।

साल 2004 में सत्ता में आने के बाद कांग्रेस की अगुआई वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) ने सबसे पहले पूर्ववर्ती वाजपेयी सरकार के ग्रामीण विरोधी छवि में सुधार करने की जरूरत समझी। इसलिए इसने सरकार का ध्यान ‘‘सबके लिए शिक्षा, नरेगा के जरिए ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और भारत निमार्ण योजना के जरिए ग्रामीण इलाकों में सिंचाई, रोड, दूरसंचार, विद्युतीकरण और स्वास्थ्य जैसी आधारभूत संरचनाओं के विकास’’ पर केंद्रित किया। यह एक दोहरे लाभ वाली रणनीति थी, इससे एक ओर मतदाताओं को भी रिझाया गया, साथ ही इस बात की भी व्यवस्था कर ली गई कि सामाजिक योजनाओं में होने वाले भ्रष्टाचार से पसंदीदा राजनीतिक समूहों को भी फायदा मिलते रहे।

साल 2004-05 और 2009-10 के बीच केंद्र और राज्य की तरफ से सामाजिक क्षेत्र में किया जाने वाला खर्च 1.73 लाख करोड़ रुपये से दोगुने से भी अधिक बढ़ कर करीब 4.46 लाख करोड़ रुपये हो गया। हालांकि जीडीपी की तुलना में यह 5.33 फीसदी से बढ़कर 7.23 फीसदी ही हो पाया। इन आंकड़ों से स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि जितनी तेजी से जीडीपी का विकास हुआ सामाजिक विकास पर किये जाने वाले खर्च में उससे कहीं तेज गति से वृद्धि हुई।

तेज विकास दर ने सामाजिक विकास पर होने वाले खर्च को बढ़ाने में मदद पहुंचाई है, किसी तरह की बाधा नहीं पहुंचाई। आर्थिक सर्वेक्षण 2009-10 के मुताबिक सकल केंद्रीय राजस्व में साल 2004-05 से 2009-10 के बीच दोगुने से अधिक की बढ़त हुई और यह 3.04 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 6.41 लाख करोड़ रुपये हो गया। इससे सामाजिक खर्च को बढ़ाने में सहायता मिली है।

सोनिया गांधी ने जो एक नया काम किया है, वह है राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का गठन, इसमें बड़ी संख्या में गैर-सरकारी संगठनों को जोड़ा गया है। इन्होंने सूचना का अधिकार, रोजगार गारंटी योजना के जरिए एक हद तक रोजगार का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और भोजन का अधिकार (जिसे खाद्य सुरक्षा अधिनियम के जरिए लागू किया जाएगा) जैसी योजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में यह आरोप लगाना कि सरकार सिर्फ दोहरे अंकों के विकास के लिए नवउदारवाद की तथाकथित अंधी दौड़ में शामिल है, बिल्कुल बेतुका बयान है। उम्मीद है कि अमर्त्य सेन ऐसे बयानों को नासमझी भरा बताएंगे।

- स्वामीनाथन अय्यर

स्वामीनाथन अय्यर