सोशल एजेंडे की ओर

यूपीए-1 की विशेषता उसका सोशल एजेंडा था। यह सकारात्मक संकेत है कि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरते जाने और भटकाव का शिकार दिखने के बाद अपनी दूसरी पारी में मनमोहन सिंह सरकार फिर उस एजेंडे की तरफ लौट रही है।

लंबे टालमटोल के बाद खाद्य सुरक्षा विधेयक अब कानून बनने के रास्ते पर है। खास बात यह है कि अधिकारप्राप्त मंत्री समूह ने जिस विधेयक को मंजूरी दी है, वह कमोवेश राष्ट्रीय सलाहकार समिति (एनएसी) द्वारा तैयार किए गए प्रारूप पर आधारित है।

इसका परिणाम यह होगा कि दो तिहाई से ज्यादा आबादी प्रस्तावित कानून के दायरे में आ जाएगी, जिनमें गरीबी रेखा से नीचे के हर व्यक्ति को हर महीने सात किलो और सामान्य श्रेणी के प्राथमिकता वाले समूहों के व्यक्तियों को तीन से चार किलो सस्ता अनाज मिलना तय हो जाएगा।

गरीबी रेखा से ऊपर के कमजोर तबकों को इस कानून का फायदा देने और लाभार्थी के रूप में परिवार के बजाय व्यक्ति को इकाई बनाने के मुद्दों पर गहरे मतभेद थे। इन पर एनएसी के विचारों को मान लिया जाना इस बात का संकेत है कि सरकार अंतत: राजकोषीय अनुशासन पर सामाजिक जरूरतों को अहमियत देने को तैयार हो गई है।

यूपीए सरकार की ऐसी ही प्राथमिकता नए खनन एवं खनिज विकास तथा विनियमन विधेयक में भी दिखी है। इस मामले में मध्यमार्ग को अपनाते हुए ऐसे प्रारूप को हरी झंडी दी गई है, जिससे कोयला खनन कंपनियों के लिए अपने मुनाफे का 26 प्रतिशत और बाकी खनन कंपनियों के लिए रॉयल्टी के बराबर की रकम उन लोगों के साथ साझा करनी होगी, जिनकी जमीन वे खनन के लिए लेंगी।

उम्मीद की जानी चाहिए कि इससे विस्थापित होने वाले समूहों की शिकायतों का निवारण होगा। भोजन व आजीविका सुरक्षा देश की बड़ी आबादी की आज सबसे बड़ी चिंता है। सरकार इस दिशा में भरोसा बंधाने वाले कदम उठाकर नई आशा का संचार कर सकती है।

- दैनिक भास्कर

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