देश को नई आर्थिक दृष्टि की जरूरत क्यों?

अर्थशास्त्र का एक अकाट्य सत्य है- बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से पाओगे। और कई सालों की खराब आर्थिक नीतियों व प्रबंधन के फलितार्थों के देश में चौतरफा परिलक्षित होने के साथ ही हम कह सकते हैं कि बबूल के पेड़ पर कांटे आज बहुतायत उग आए हैं। बड़े से बड़ा आशावादी भी भारतीय अर्थव्यवस्था में आई तेज गिरावट से इनकार नहीं कर सकता, हालांकि हाल तक इसे बड़ी शान के साथ रेजिलिएंट (टिकाऊ) और इंसुलेटेड (परिरक्षित) कहकर पेश किया जा रहा था। 

एक ऐसी अर्थव्यवस्था, जिसके आंकड़ों के इंद्रजाल ने दिल्ली में बैठे कुलीन तबके को भारत के हर हाल में आर्थिक महाशक्ति बनने का यकीन दिला दिया था। जैसी की अपेक्षा थी, उद्योग जगत ने भी इसमें चापलूसी के साथ सुर में सुर मिलाया था (सिर्फ कुछेक उद्यमियों को छोड़कर, जो इस पर सवाल उठा रहे थे)। रुपये के जबरदस्त अवमूल्यन और बेकाबू मुद्रास्फीति ने आमजन को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। हम ‎गिरते जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) और घटते निवेश से वाकिफ हैं। मैक्रोइकॉनमी के हर पैमाने पर अभी के और 1990-91 के संकट में जबरदस्त समानता है।

होड़ नदारद

चालू खाता घाटा अभी जीडीपी का 4.8 फीसद है, जबकि 1990-91 में यह तीन फीसद ही था। जीडीपी विकास दर स्थिर बाजार मूल्य पर 3.3 फीसद है, जो उस समय की तुलना में थोड़ी ही बेहतर है। अर्थव्यवस्था की गिरावट से लोगों में गहरी अनिश्चितता घर कर गई है। गरीबों और वंचितों को उबारने की कोशिशों के बीच यह बात और महत्वपूर्ण है।

नैशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन (एनएसएसओ) द्वारा किया गया सर्वे गांवों में रोजगार के संकट को उजागर करता है। इसके अनुसार वर्ष 2009-10 और 2011-12 के दौरान ग्रामीण महिलाओं के 91 लाख रोजगार खत्म हो गए। ऊपर जिस बबूल की बात की गई है, उसके बीज दरअसल भ्रामक आर्थिक दृष्टिकोण में छिपे थे- विदेशी निवेश को 'सुधार' बताने वाला ऐसा दृष्टिकोण जो 1990 से अब तक बहुत थोड़ा ही बदला है।

90 दशक के मध्य का वही मार्केटिंग वाला सुर कि 'भारत में बहुत संभावनाएं हैं' हमारे मौजूदा वित्तमंत्री ने हाल के नाकाम रोड शो के वक्त भी दोहराया। टेलीकॉम और पेट्रोलियम की सरकारी नीति मित्रों और राजनेताओं के रिश्तेदारों के पक्ष में झुकी होती है। यह याराना है, व्यापार नहीं। इस वित्तीय लापरवाही का भार लाखों मेहनतकश लोगों और उनके परिवारों को उठाना पड़ता है।

'उदारीकरण' के बावजूद अर्थव्यवस्था वास्तविक होड़ के अभाव में अभी तक प्रतिस्पर्धात्मक नहीं बन पाई है। इसे मदद मिलती है निष्क्रिय नियामकों और सरकार-उद्योग जगत के सुविधाजनक गठजोड़ से। इसकी भरपाई के लिए सरकार बड़े पैमाने पर कल्याणकारी योजनाएं चलाने की बात करती है। सरकारी व्यय अपर्याप्त है और भ्रष्टाचार संस्थागत रूप में मौजूद है। गरीबी की समस्या को दूर करने के लिए बनाए गए सरकारी कार्यक्रम सारी खामियां उजागर होने के बाद भी जारी रहते हैं। लक्षित लाभार्थियों तक इसका एक छोटा अंश ही पहुंचता है।

मोटे अल्फाज में कहें तो हम अपने देश को उद्यमशीलता और प्रतिस्पर्धा की सोच से हटाकर उस दिशा में ले जा रहे हैं जहां सिर्फ नाम से काम चल जाता है। हमारे लिए समझदारी इसी में है कि ग्रीस, स्पेन और पुर्तगाल के तजुर्बे से नसीहत लें, जहां पुरानी पीढ़ी ने शाहखर्ची से भविष्य की सभी पीढ़ियों को सदा-सदा के लिए कर्ज के बोझ तले दबा दिया है। इसका समाधान सरकार की भूमिका पर पुनर्विचार करने और ऐसी अर्थव्यवस्था तैयार करने में है, जो खर्च करने के बजाय उद्यमशीलता को बढ़ावा दे।

वर्ष 2008 में मैंने संसद में कहा था कि मुद्रास्फीति का कारण क्षमता पर दबाव है और सरकार को अपना ध्यान सिर्फ खपत बढ़ाने पर नहीं, निवेश बढ़ाने पर केंद्रित करना चाहिए। रोजमर्रा के उपयोग वाली चीजों की कीमतें इसलिए ऊंची हैं, क्योंकि उनकी आपूर्ति सीमित है। इस समस्या के समाधान के लिए हमें उत्पादन बढ़ाने और जरूरत की चीजों की आपूर्ति को अधिकाधिक बढ़ावा देने की जरूरत है।

कुछ जरूरी सुझाव सरकार को बैंकिंग सेक्टर में जोखिम के बढ़ते केंद्रीकरण पर भी ध्यान देना चाहिए, जहां से 10-11 कॉर्पोरेट घरानों की उधारी ही भारतीय बैंकिंग सेक्टर के नेटवर्थ की 95 फीसद है। एक विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए यह काफी खतरनाक है। कुछ महीने पहले संसद में बजट पर चर्चा के दौरान मैंने हजारों करोड़ की अधूरी परियोजनाओं को पूरा कराने के लिए एक अंतर-मंत्रालय समूह बनाने का सुझाव सरकार को दिया था। इससे उन परियोजनाओं पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा, जो अर्थव्यवस्था में योगदान देने के इंतजार में लटकी पड़ी हैं।

और अंत में हमें अपनी विनिवेश नीति पर पुनर्विचार करने और उन विकल्पों को तलाशने की जरूरत है जो राजनीतिक रूप से विवादास्पद विकल्पों की तुलना में ज्यादा बेहतर रिटर्न दे सकें। अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए भारत को वास्तविक ढांचागत सुधारों की जरूरत है। देश और दुनिया के अनुभवों ने साबित किया है कि नारेबाजी और शाहखर्ची उद्यमशीलता से होने वाले विकास की जगह नहीं ले सकते।

 

- राजीव चंद्रशेखर (लेखक उद्यमी और राज्यसभा के सांसद हैं।)

- साभारः नवभारत टाइम्स