संसद की सार्थकता

2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला मामले की जेपीसी से जांच कराने की मांग पर सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध के चलते संसद का पूरा शीतकालीन सत्र बिना किसी काम काज के समाप्त हो गया. इसी के साथ पूरे सत्र के दौरान एक भी दिन कामकाज नहीं हो पाने का देश के संसदीय इतिहास में एक रिकॉर्ड बन गया.

यहीं एक गंभीर प्रश्न उठता है कि क्या हमारी संसद वाकई हमारे लिए सार्थक है? संसद के ठप्प हो जाने के बाद भी, देश के बाकी काम काज सुचारू रूप से चलते रहे. एक तरफ हमारे नीति निर्माता एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप की जंग लड़ते रहे और संसद की कार्यवाही आगे बढने ही नहीं दी, वहीँ  देश और देश की आम जनता अपने जीवन की गाड़ी पहले की तरह चलाती  रही. जो सदन जनहित और देश हित के मुद्दों पर बहस और विधान बनाने के लिए बना है, वो अखाड़ा बनी रही और इसी के साथ जनता के करोड़ों रुपये भी बर्बाद हो गए.

आंकड़ों में जायें तो संसद की एक मिनट की कार्यवाही पर 26 हजार रुपये खर्चा आता है. बिना काम के किसी भी संस्था पर धन खर्च करना निरर्थक है फिर चाहे वो हमारे देश की संसद ही क्यों ना हो. सांसदों की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि जनता जिस कार्य के लिए सांसदों को चुनती है वह सदन में उसी भावना के अनुरूप काम करें। अन्यथा जिस तरह बिना काम किये किसी भी कर्मचारी का वेतन काटा जाता है उसी तरह हम इन का वेतन भी काट लें.

सरकार ने शीतकालीन सत्र के दौरान 24 बैठकों की योजना बनाई थी लेकिन संसद के 124 घंटे और 40 मिनट बर्बाद हुए और विपक्षी दलों के गतिरोध की वजह से लोकसभा में महज 7 घंटे 30 मिनट तक की कार्यवाही हो पाई. सत्र के दौरान संसद में 480 तारांकित प्रश्न रखे गए थे लेकिन महज 5 प्रश्नों का जवाब मौखिक तौर पर दिया गया. आम बजट और रेलवे के लिए अनुपूरक अनुदान मांग को बिना किसी चर्चा के महज क्रमश: 7 मिनट और 4 मिनट में मंजूरी दे दी गई. सत्र के दौरान सरकार ने महज 10 विधेयक पेश किए. शीतकालीन सत्र  के 23 दिनों में जहां राज्य सभा में कार्यवाही केवल दो घंटे और 44 मिनट तक चल पाई वहीं लोकसभा में साढ़े सात घंटे तक और 125 घंटों से ऊपर का समय बर्बाद हो गया.

अनुमान लगाया गया है कि ए राजा के मंत्रित्व में जिस तरह 2-जी के लाइसेंसों व स्पेक्ट्रम का आबंटन किया गया है, उससे सार्वजनिक खजाने को 1.76 लाख करोड़ रुपये का घाटा हुआ है. इससे यह स्वतंत्रता के बाद का सरकार से जुड़ा सबसे बड़ा घोटाला बन जाता है. इसी के साथ कॉमनवेल्थ खेल और आदर्श हाउसिंग सोसायटी में भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुये, विपक्ष जेपीसी की मांग कर रही है और इसी मांग के चलते उसने विगत संसद सत्र मे जम के हंगामा  भी किया. न विपक्ष जेपीसी की मांग से पीछे हटने को तैयार है और न सरकार इसे मानने को राजी है.

संसद में गतिरोध के लिए सरकार और विपक्ष के अड़ियल रवैये के चलते दोनो में से किसे ज़िम्मेदार ठहराया जाए? विपक्ष और सत्ता पक्ष के अपने-अपने रूख पर अड़े रहने के चलते के संसद में गतिरोध को दूर करने के लिए तीन सर्वदलीय बैठकें भी असफल रही. अगर विपक्ष अपने रुख पर कायम रहा तो अगले सत्र में भी संसद के ठप्प होने का खतरा पैदा हो सकता है.

सरकार और विपक्ष के अड़ियल रवैए ने देश के पैसे का भरपूर नुकसान किया है और सदन की कार्यवाही को एक तरह से मज़ाक बना कर रख दिया है. संसद के सदन को बार बार ठप्प करने से देश से जुडे महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस और फैसले रुक जाते हैं और समय के साथ धन का काफी नुकसान होता है.

एक लोकतंत्र में संसद का महत्व सबसे अधिक होता है. यहीं से एक आम आदमी की बात को अभिव्यक्ति मिलती है. पर अगर जन प्रतिनिधि संसद का लगातार दुरूपयोग करने पर अमादा हों तो उनकी कोई न कोई जवाबदेही तय करी जानी चाहिए. इन लोगों को समय और धन का भान कराने के लिए काम नहीं करने पर किसी तरह का जुर्माना लगाना ज़रूरी है.

- स्निग्धा द्विवेदी