सट्टा नहीं है शेयर बाजार

वित्तीय साक्षरता के मामले में पश्चिमी भारत और उत्तर भारत में बहुत फर्क है। उत्तर भारत यानी बिहार, उत्तर प्रदेश में आम मध्यवर्गीय परिवारों के अधिकांश लोगों से  शेयर बाजार के बारे में बात करें, तो उन्हे लगता है कि सट्टे की बात की जा रही है। सट्टा यानी एक अवांछनीय गतिविधि, सट्टा यानी किसी अनिश्चित घटना के घटने या ना घटने को लेकर लगायी जानीवाली शर्त, सौदे। इनमें एक पक्ष हारता और दूसरा पक्ष जीतता है। सट्टे को पक्के तौर पर निवेश और बचत  से जुड़ा मसला ना माना जा सकता। एक आम समझ शेयर बाजार को लेकर उत्तर भारत के अधिकांश परिवारों में यही है कि यह तो सट्टा है, इससे दूर ही रहना चाहिए।
 
इस दूर रहने का नुकसान यह है कि शेयर बाजार एक आम निवेशक को जो भला कर सकता है, आम निवेशक उससे वंचित रह जाता है। आम निवेशक का रिटर्न बैंक-डिपाजिट से अधिकतम 8-9 प्रतिशत सालाना हो सकता है, पर अगर मुंबई शेयर बाजार की तीस टाप कंपनियों के आधार पर बने सूचकांक सेनसेक्स में ही निवेश कर दिया जाये, तो दस साल के टाइम-फ्रेम में 15-17 प्रतिशत सालाना का रिटर्न आना सामान्य है। देश की सबसे टाप तीस कंपनियों के सेनसेक्स में  निवेश का मतलब है कि एक साथ देश की टाप तीस कंपनियों के कारोबार में निवेश। यानी सेनसेक्स में निवेश करने में जोखिम कम है। बहुत मुचुअल फंड ऐसे हैं, जो तीस कंपनियोंवाले सेनसेक्स पर आधारित मुचुअल फंड चला रहे हैं। पर जो निवेशक समूचे स्टाक बाजार को ही सट्टा मानते हैं, वो इस रिटर्न से दूर रह जाते हैं।
 
जरुरी है कि वित्तीय साक्षरता के तहत लोगों को समझाया जाये कि शेयर बाजार है क्या?
 
शेयर का मतलब है हिस्सा और बाजार का मतलब बाजार यानी हिस्से का बाजार, कंपनी में किसी शेयरधारक के हिस्से का बाजार। ऐसा बाजार, जहां कोई शेयरधारक किसी कंपनी में अपने हिस्से को बेच सकता है, कोई निवेशक उस हिस्से को खरीद सकता है। कंपनी दरअसल एक कारोबारी संगठन है। छोटा कारोबार कोई बंदा अकेले कर सकता है। थोड़ा बड़ा कारोबार करना हो, पार्टनरशिप खोल सकता है। पर बहुत बड़ा कारोबार करना हो, बहुत सारे लोगों का पैसा चाहिए होता है। इस बड़े कारोबार के लिए हर छोटे-बड़े निवेशक से सहयोग मांगा जाता है और उसकी वित्तीय योगदान के मुताबिक उसे उसका हिस्सा यानी शेयर दिया जाता है। जैसे रिलायंस कंपनी में अगर अंबानी परिवार ने कुल पूंजी में पचास प्रतिशत का योगदान दिया है, तो कंपनी के पचास प्रतिशत शेयर उस परिवार के पास होंगे। किसी ने अगर कम योगदान किया है, तो उसके पास पचास-सौ शेयर हो सकते हैं। किसी का बड़ा हिस्सा, किसी का छोटा हिस्सा।
 
हर कारोबार की कीमत बढ़ती है। उदाहरण के लिए किसी शहर की किसी भी दुकान की रेट देख लें, दस साल के अंतराल में उसकी कीमत में फर्क आता है, अधिकतर मामलों में कीमतें ऊपर हो जाती हैं। इसी तरह से किसी कंपनी के कारोबार का भाव भी ऊपर हो जाता है। जब समूचे कारोबार का भाव ऊपर जाता है, तो उसके एक हिस्से यानी शेयर का भाव भी ऊपर जाता है। इस तरह से शेयर बढ़ने से, कारोबार के भाव बढ़ने से शेयरधारक का फायदा होता है। इस दृष्टि से देखें, तो शेयर बाजार मूलत कारोबार को खरीदने, कारोबार के हिस्से को खरीदने-बेचने का बाजार है। पर इसमें कुछ कारोबारियों की गतिविधियों के चलते कई लोग समझने लगते हैं कि यह तो खालिस सट्टा है। कई कारोबारियों की कोई दिलचस्पी कारोबार का हिस्सा खरीदने बेचने में नहीं होती। उनका तो उद्देश्य होता है कि वह जैसे-जैसे शेयरों की कीमतों में होनेवाले उतार-चढ़ावों की अनिश्चितता से पैसे कमायें। इस तरह की शर्तें हो सकती हैं कि अगर फलां शेयर के भाव उतने चढ़ गये, तो कोई सट्टेबाज जीता माना जायेगा। फलां शेयर के भाव उतने गिर गये, तो कोई सट्टेबाज हारा माना जायेगा। इनका कोई ताल्लुक कंपनी के कारोबार से नहीं होता, उनका ताल्लुक सिर्फ और सिर्फ भावों के अनिश्चित उतार-चढ़ाव से होता है।
 
कोई भी  अनिश्चितता सट्टेबाजी के केंद्र में हो सकती है। जैसे सट्टा इस बात पर होता है-किसी चौराहे से गुजरनेवाली किसी कार का नंबर औड नंबर खत्म होगा जैसे, 3,5,7,9 या इवन नंबर पर खत्म होगा जैसे 2,4,6,8। सट्टा लगता है, कोई जीतता है, कोई हारता है। इसमें कार का दोष नहीं है कि कारों को ही सट्टा बाजार घोषित कर दिया जाये। ऐसी दुर्घटना शेयर बाजार के साथ हो गयी है, जिसने तमाम उन निवेशकों को इस बाजार से दूर कर दिया है, जिन्हे शेयर बाजार में बतौर निवेशक होना चाहिए था।
हरेक को यह ज्ञान हासिल होना चाहिए कि शेयर बाजार सट्टा नहीं है, उसमें सट्टा भी होता है, जो कहीं भी किसी भी अनिश्चित घटना पर हो सकता है, आईपीएल के मैचों के परिणामों से लेकर, कारों के नंबर तक।
 
- आजादी.मी के लिए डा. आलोक पुराणिक
(लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं और दिल्ली विश्विद्यालय में अध्यापनरत हैं)
 
आलोक पुराणिक