बीपीएस के लिए अलग से हों प्रावधान

आजादी के पूर्व से ही देश में शिक्षा के प्रचार प्रसार में बजट प्राइवेट स्कूल्स अर्थात लो फी प्राइवेट स्कूल्स का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। समय समय पर इन स्कूलों से निकली विभूतियों ने व्यापार, खेल, राजनीति सहित तमाम क्षेत्रों में अपने झंडे गाड़े हैं। अफोर्डिब्लिटी और क्वालिटी एजुकेशन के कारण ही आज बजट प्राइवेट स्कूल्स सरकारी स्कूलों के विकल्प के रूप में उभरे हैं। न केवल नौकरी पेशा मध्यम वर्ग बल्कि मेहनत मजदूरी करने वाला निम्न आय वर्ग भी अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए बीपीएस का रूख कर रहे हैं। इस बात की तस्दीक समय समय पर सरकारी और गैरसरकारी सर्वेक्षणों की रिपोर्ट्स भी करती रहतीं हैं।

लेकिन अक्सर यह देखने में आता है कि स्कूलों के लिए नीतियां बनाते समय नीति निर्धारक स्कूलों को मोटे तौर पर सरकारी और निजी दो वर्गों में बांट कर ही योजनाएं बनाते हैं। जबकि कायदे से नीतियां बनाते समय निजी स्कूलों को कई और हिस्सों में वर्गीकृत किया जाना चाहिए जैसे कि सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल, गैर सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल, हाई फी चार्जिंग स्कूल और लो फी चार्जिंग स्कूल अर्थात बजट प्राइवेट स्कूल। चूंकि शिक्षा के क्षेत्र में बजट प्राइवेट स्कूलों की हिस्सेदारी दो तिहाई से भी अधिक है इसलिए और भी जरूरी हो जाता है कि इनके लिए सरकारी नीतियां और प्रावधान अलग से निर्मित किए जाएं। यह बिल्कुल सम्भव नहीं है कि प्रति छात्र सरकार द्वारा खर्च की जाने वाली राशि से भी कम राशि में संचालित होने वाले गैर सहायता प्राप्त स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर और अध्यापकों के वेतन के मामले में बड़े व सहायता प्राप्त स्कूलों की बराबरी कर सकें।

पहले से ही संभव न्यूनतम शुल्क पर गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने वाले छोटे स्कूलों को लैंड नार्म्स को पूरा करने के लिए बाध्य करना, फ्री यूनिफार्म और स्टेशनरी देने के लिए दबाव डालना, स्कूल बसों को अन्य कमर्शियल वाहनों की तर्ज पर दस साल में रिटायर करने जैसे ऐसे तमाम नियम हैं जो इन्हें बंद होने पर मजबूर करते हैं। एक अनुमान के मुताबिक आरटीई की विसंगतियों और गलत प्रावधानों के कारण देशभर के एक लाख से अधिक बजट स्कूल बंदी की कगार पर पहुंच गए है। इतनी भारी तादात में स्कूलों के बंद होने से कम से कम डेढ़ से दो करोड़ छात्रों का भविष्य भी अंधकारमय हो गया है। इसलिए अब समय आ गया है कि सरकार इस बात को समझे और बजट प्राइवेट स्कूलों को अलग एंटिटी मान अलग प्रावधान बनाए।

- अविनाश चंद्र, संपादक (आजादी.मी)