मानवाधिकार के पक्ष में है सेक्शन 66ए का जाना

मानविधकारों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट ने यह बहुत ही लैंडमार्क निर्णय दिया है। 107 पेजों में दिए गए इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि आईटी एक्ट की धारा 66 (ए) असंवैधानिक है। न्यायालय ने कहा कि इस धारा में ऎसे संदेशों या अभिव्यक्ति को आपराधिक बताया गया है जिनका कोई दायरा ही निश्चित नहीं किया जा सकता है।
 
जिनकी कोई सीमा ही नहीं है। किसी को नाराज करने वाले संदेश भेजना, चिढ़ाना, अपमान करना या असुविधा पैदा करना आदि ऎसे संदेशों को इस धारा में आपराधिक और दंडनीय बताया गया है। यह पाबंदियां तो भारत के संविधान द्वारा अनुच्छेद 19 में दिए गए अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हैं।
 
भारत के संविधान में अनु. 19 के उपबंध 2 में जिन आठ मामलों जैसे मानहानि, अश्लीलता, नैतिकता या अश्लीलता, देश द्रोह, अवमानना, शांति भंग को रेखांकित किया गया है, जिनके आधार पर राज्य अभिव्यक्ति के अधिकार पर प्रतिबंध के लिए कानून बना सकता है, धारा 66 (ए) में उठाए गए विषय इनमें से किसी के अंतर्गत नहीं आते हैं। जबकि धारा 66 (ए) में तो अश्लीलता या नैतिकता शब्द का भी उल्लेख नहीं है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कहा है कि आईटी एक्ट की धारा 66 (ए) में उठाए गए विषय अत्यंत अस्पष्ट हैं, अपरिभाषित हैं, साथ ही यह धारा संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति के अधिकार का उल्लंघन है। 
 
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 66 (ए) के आधार पर तो यह बताना भी मुश्किल है कि किस काम को अपराध मानें और किस को नहीं। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि हम एक लोकतांत्रिक समाज में रहते हैं और ऎसे मे हमे असहमति के प्रति उदार रवैया अपनाना चाहिए। पर धारा 66 (ए) तो असहमति के लिए कोई गुंजायश ही नहीं छोड़ती। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि लोकतंत्र "विचारों को एक बाजार मंच" भी होता है। जबकि धारा 66 (ए) इस पर अंकुश लगाती है। इस लिहाज से देखें तो कोई शक नहीं कि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज किया जाएगा। 
 
-एड. प्रशांत नारंग (आई-जस्टिस)
- साभारः राजस्थान पत्रिका