स्कूल वाउचरः अनेक मर्ज़ों की एक दवा

पिछले एक दशक में देश में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के तेज प्रयास देखने को मिले हैं। 6 से 14 वर्ष के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा की गारंटी प्रदान करने वाला 'शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009' (आरटीई एक्ट) सुधार के प्रयासों की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी है। वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) बनाने की कवायद भी सुधार का अगला चरण हैं। हालांकि इससे पहले सन् 1968 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और बाद में सन् 1986 में राजीव गांधी सरकार द्वार नई शिक्षा नीतियां लागू की गईं। वर्ष 1992 में इसमें कुछ छोटे-छोटे बदलाव भी किए गए। किंतु सभी शिक्षा नीतियों में कमोवेश एक बात उभयनिष्ठ थीं कि सरकार को शिक्षा के क्षेत्र में और ज्यादा खर्च करना चाहिए।

आरटीई एक्ट भी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की बात करता है और इसके लिए विद्यालय के भवनों, खेल के मैदानों, प्रशिक्षित अध्यापकों की भर्ती, शौचालयों का निर्माण इत्यादि पर ज्यादा जोर देता है। आजादी के बाद पहली पंचवर्षीय योजना में शिक्षा के लिए 153 करोड़ रूपए के बजट का प्रावधान किया गया था जो कि पांच वर्ष की अवधि में खर्च होना था। बजट की यह राशि वर्ष 2016-17 में बढ़कर 68,968 करोड़ रूपए हो गई। ध्यान देने योग्य बात ये है कि यह बजट सिर्फ एक वर्ष की अवधि के लिए है।

दिल्ली सरकार ने भी चालू वित्त वर्ष में 10,690 करोड़ रूपए के बजट का प्रावधान अकेले शिक्षा के मद में किया है। राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र सहित अन्य राज्यों ने भी शिक्षा बजट में खूब वृद्धि की है। अतः यह तो स्पष्ट है कि शिक्षा का क्षेत्र केंद्र व प्रदेश सरकारों की वरीयता सूची में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान पर है। लेकिन यहां ध्यान देने की जरूरत है कि शिक्षा की गुणवत्ता के नाम पर हजारों करोड़ रूपए के कोष का अधिकांश हिस्सा स्कूल भवनों के निर्माण, शिक्षकों व कर्मचारियों के वेतन, नए शिक्षकों की भर्ती, शिक्षकों के प्रशिक्षण, मिड डे मिल इत्यादि पर ही व्यय हो जाता है। इतना होने के बावजूद भी तमाम सरकारी व गैरसरकारी अध्ययन यह साबित करते रहते हैं कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता बद से बदतर ही हुई है।

इसके अलावा बजट का एक बड़ा हिस्सा अब आरटीई के निशुल्क शिक्षा वाले प्रावधान के कारण निजी स्कूलों के फीस के प्रतिपूर्ति (निजी स्कूलों में 25 फीसद सीटें आर्थिक तौर पर कमजोर एवं वंचित तबकों के लिए आरक्षित हैं और उक्त सीटों के लिए फीस का खर्च सरकार वहन करेगी) के रूप में स्कूलों को जाता है। हालांकि समय समय पर निजी स्कूलों द्वारा गरीब व वंचित कोटे के तहत दाखिलों को लेकर अनियमितता बरते जाने की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनती रहती हैं। अपात्र को आरक्षित कोटे के तहत दाखिला देना अथवा इस कोटे के तहत दाखिल बच्चों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करना, उन्हें कक्षा में अलग बैठाना, अलग पालियां चलाना, कक्षा में उनपर ध्यान न देना आदि इनमें से कुछ प्रमुख अनियमितताएं हैं।

उधर, ऐसी खबरों और शिकायतों के सामने आने पर सरकार कड़े कदम तो उठाती है लेकिन 'तू डाल-डाल तो मैं पात-पात' की तर्ज पर स्कूल संचालक कोई न कोई काट अवश्य ढूंढ लेते हैं। इसके अलावा स्कूलों को चूंकि प्रतिपूर्ति अथवा रियायती जमीन सरकार से प्राप्त होती है अतः स्कूल छात्रों व अभिभावकों के प्रति जवाबदेह न होकर सरकार व अधिकारियों के प्रति अपनी जवाबदेही साबित करते रहते हैं। नामी निजी स्कूल में निशुल्क दाखिला लेने से उपकृत अभिभावक भी कभी कोई शिकायत लेकर स्कूल प्रशासन के पास जाने की धृष्टता नहीं कर पाता।

डीबीटी अथवा डायरेक्ट कैश ट्रांसफर इन सभी समस्याओं और सरकारी धन के रिसाव को रोकने का एक सरल और कारगर उपाय है। विदित हो कि यह उपाय एलपीजी सिलेंडर की सब्सिडी के दुरुपयोग को रोकने में कारगर साबित हुआ है और सरकार द्वारा इसे अन्य क्षेत्रों में लागू करने की योजना अंतिम चरण में है। यदि इस योजना में शिक्षा को भी शामिल कर लिया जाए तो न केवल बड़ी धनराशि का दुरुपयोग को रोका जा सकेगा बल्कि वास्तव में शिक्षा का अधिकार छात्रों को प्राप्त हो सकेगा। ऐसी स्थिति में न केवल छात्रों के पास परचेसिंग पावर होगी बल्कि उनके पास चयन का अधिकार भी होगा। छात्र स्वयं फीस चुकाकर मनचाहे स्कूल में दाखिला प्राप्त कर सकेगा। चूंकि वह फीस स्वयं चुका रहा होता है, ऐसी स्थिति में उसके साथ दोयम दर्जे के व्यवहार की संभावना भी समाप्त हो जाती है और स्कूलों की जवाबदेही भी छात्र के प्रति हो जाती है।

क्योंकि छात्र के पास दूसरे स्कूल में दाखिला लेने का विकल्प मौजूद रहता है अतः स्कूल भी उनपर अन्य बच्चों की तरह पूरा ध्यान रखेंगे। इसके अलावा स्कूलों के मध्य अधिक से अधिक छात्रों को आकर्षिक करने के लिए प्रतिस्पर्धा भी होगी, जो कि अंततः छात्र हित में होगी। हालांकि राजनीतिज्ञों के मन में इस बात पर संशय भी है कि गरीब अभिभावक शिक्षा के लिए प्राप्त होने वाले धन को किसी अन्य मद में न खर्च कर दें, जबकि बिहार की सायकल योजना, जिसमें कि सायकल के लिए नगद राशि प्रदान की गई थी; अत्यंत सफल रही। फिर भी धन के दुरुपयोग के किसी भी मौके को रोकने के लिए स्कूल वाउचर की सहायता ली जा सकती है। वाउचर की योजना दरअसल, नोबेल पुरस्कार विजेता अमेरिकी अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन की देन है। इसके मुताबिक सरकार छात्रों को फीस राशि के बराबर वाउचर दे सकती है जिसे छात्र स्कूलों में जमाकर दाखिला ले सकते हैं और बाद में स्कूल उन वाउचर्स को कैश करा सकते हैं। अमेरिकार में फूड स्टाम्प के तौर पर प्रदान किया जाने वाला वाउचर इसकी सफलता का जीता जागता उदाहरण है।

- अविनाश चंद्र
लेखक, आजादी.मी के संपादक हैं