यह बिटिया कैसे बने ‘अफसर बिटिया’..?

नन्हें मुन्ने बच्चों को सुबह सुबह उनके घर से लेकर अपने वैन में स्कूल छोड़ने व छुट्टी होने पर स्कूल से घर तक पहुंचाते समय ड्राइवर गुलशन अक्सर सोंचता कि काश ! वह भी अपने बच्ची को एमसीडी के बदहाल स्कूल से निकाल ऐसे ही किसी बड़े नामी स्कूल में दाखिला दिला पढ़ा लिखा सकता। लेकिन, जैसे ही उसका ध्यान अपनी गरीबी और माली हालत पर जाता वह रूआंसा हो मन मसोस लेता। उसे लगता कि अपनी नन्हीं बिटिया को बड़े स्कूल में पढ़ा-लिखाकर ‘अफसर’ बनाने की उसकी तमन्ना अधूरी ही रह जाएगी। भला हो, निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 का, जिसके वजह से गुलशन को अपनी सात वर्षीय बेटी तिक्षा का दाखिला रोहिणी सेक्टर 6 स्थित विद्या जैन पब्लिक स्कूल में कराने का मौका मिल गया। तिक्षा को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्लूएस कोटे) के तहत इस स्कूल में दाखिला मिल गया। गुलशन व तिक्षा को मानों मन की मुराद मिल गई हो। तिक्षा जहां नए स्कूल में दाखिले के बाद नई यूनिफार्म व किताबें पाकर बेहद खुश थी और बार-बार आस पड़ोस के अपने हमउम्र बच्चों को दिखा दिखाकर फूली नहीं समा रही थी वहीं माता पिता को लगा कि अब उनकी बेटी का भविष्य उज्जवल हो जाएगा।

लेकिन गुलशन के घर यह खुशी महज कुछ ही दिनों के लिए आयी थी। दाखिले के तीन दिन बाद ही स्कूल प्रशासन ने तिक्षा का नाम काट दिया और उसे घर भेज दिया। पूछने पर बताया गया कि चूंकि बच्ची डायबटीक (मधुमेह से ग्रसित) है इसलिए स्कूल उसे अन्य स्वस्थ बच्चों के साथ पढ़ने की अनुमति नहीं दे सकता। स्कूल के इस तानाशाही रवैये ने गुलशन और नन्हीं तिक्षा का सपना चूर चूर कर दिया। गुलशन अब नन्हीं तिक्षा को लेकर शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार व शिक्षा मंत्रालय के चक्कर इस उम्मीद में काट रहा है कि शायद कहीं से कुछ मदद मिल जाए और उसकी बच्ची को दोबारा स्कूल जाने का मौका मिल जाए। स्कूल प्रशासन के इस तानाशाही रवैये और नन्हीं तिक्षा की समस्या का पता जब ऑल इंडिया पैरेंट्स एसोसिएशन (एआईपीए) के लोगों को लगा तो उन्होंने मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पत्र लिख इस मामले में हस्तक्षेप करने व छात्रा के भविष्य को बर्बाद होने से बचाने की अपील की है।

रोहिणी सेकटर 5 निवासी स्कूल वैन चालक गुलशन की बेटी तिक्षा (7 वर्ष) का दाखिला गत 21 अप्रैल, 2012 को ईडब्लूएस कोटे के तहत सेक्टर 6 स्थित विद्या जैन पब्लिक स्कूल में हुआ। नन्हीं आंखों में बड़े सपने संजोए तिक्षा 24 अप्रैल, 2012 से स्कूल जाने लगी। गुलशन ने किसी प्रकार अपने खर्चों में कटौती कर बच्ची को यूनिफार्म व किताबें दिलाई। उन्हें लगा कि थोड़ी परेशान सह कर वह अपनी बच्ची का भविष्य बना लेंगे। लेकिन अगले ही दिन जो हुआ वह गुलशन व तिक्षा के सपनों को चूर-चूर करने के लिए काफी था। गुलशन बताते हैं कि शुरू से ही स्कूल प्रशासन किसी न किसी बहाने दाखिला नहीं देना चाहता था, लेकिन अदालत के आदेश के कारण बच्ची को दाखिला मिला और 24 अप्रैल से तिक्षा ने स्कूल जाना शुरू किया। अगले ही दिन स्कूल की तरफ से उनके पास फोन आया और तत्काल उन्हें स्कूल के प्रिंसिपल से आकर मिलने की बात कही गई। जब वह प्रिंसिपल के पास पहुंचे तो उनसे उनकी बेटी के डायबटिक होने और इस कारण नाम काटने की सूचना दी गई। गुलशन के मुताबिक जब उन्होंने प्रिंसिपल से बेटी की बीमारी की पूर्व सूचना दाखिले के समय ही स्कूल प्रशासन को दे चुके होने की बात बताई लेकिन प्रशासन ने उनकी एक न सुनी। उन्हें स्कूल के सुरक्षाकर्मियों से धक्के मारकर बाहर करवाने की भी धमकी दी गई।

प्रिंसिपल के रवैये से रूआंसे गुलशन अपना सा मूंह लिए तिक्षा के साथ घर लौट आए। गुलशन के मुताबिक नन्हीं तिक्षा उनसे जब बार बार स्कूल जाने देने की बात करती है तो उन्हें समझ में नहीं आता कि क्या बहाना करें। इस बाबत ऑल इंडिया पैरेंट्स एसोसिएशन के एड. अशोक अग्रवाल का कहना है कि साफ तौर पर यह मामला स्कूल प्रशासन की तानशाही रवैये को प्रदर्शित करता है। स्कूल प्रशासन को किसी भी सूरत में छात्रा को स्कूल से लिकालने का अधिकार नहीं है। एड. अग्रवाल के मुताबिक उन्होंने मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पत्र लिख इस संबंध में हस्तक्षेप करने और बच्ची को शिक्षा का अधिकार उपलब्ध कराने की अपील की है।

- अविनाश चंद्र

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