दिल्ली स्कूल एजुकेशन एक्ट 1973 पर एक नई लीक बनानेवाली रपट

भारतीय शिक्षा  नीति के क्षेत्र में – द रिपोर्ट आफ द रिव्यू कमेटी आन द दिल्ली स्कूल एजुकेशन एक्ट एंड रूल्स,1973  जैसी प्रगतिशील रपट शायद देश  को कभी देखने को नहीं मिली । इस रपट का श्रेय इन तीन खंड़ों की मसौदा कमेटी की अध्यक्ष और दिल्ली की  पूर्व मुख्य सचिव शैलजा चंद्र को है।

समीक्षा समिति ने  रिपोर्ट को संकलित करने के लिए शिक्षा निदेशालय,गैर सरकारी संगठन,दिल्ली नगर निगम,डीडीए,एनआईसी ,कानून व्यवसाय से जुड़े लोगों,अभिभावकों की एसोसिएशनें,एससीईआरटी,विभिन्न प्रायवेट और सरकारी स्कूलों के  प्रिसिंपलों और शिक्षकों  और विख्यात शिक्षाशास्त्रियों सहित 100 से ज्यादा लोगों से मशविरा किया।हालांकि यह रपट दिल्ली स्कूल एजुकेशन एक्ट 1973 की समीक्षा है लेकिन शिक्षा से जुड़े कानूनी मामलों पर उसकी टिप्पणियां, शिक्षा को लेकर बनी विभिन्न राष्ट्रीय कमेटियों के संदर्भ, विभिन्न प्रकार के स्कूलों और पढ़ाई के नतीजों के बारे में एएसईआर (प्रथम)  के अनुभवजन्य आंकड़ों का उपयोग इस रपट को प्रभावी और भारत के सभी राज्यों में लागू करने योग्य बनाता है।

मैं इस रपट के प्रमुख मुद्दों को रेखांकित करने के लिए उसके कुछ अंशों को उद्घृत करूंगा।

कंपनियों को शिक्षा के क्षेत्र में काम करने की अनुमति देनी चाहिए (पेज 77, खंड -1)

“समिति महसूस करती है प्रथम दृष्ट्या एक ऐसे विकल्प को बढ़ावा देना अच्छा विचार है जो व्यावसायीकरण को रोके लेकिन निजी संसाधनों को लाए।”

“वर्तमान में कई प्राइवेट स्कूल परिवारिक समुच्चय की तरह चलाए जा रहे हैं। प्रबंधन के सभी प्रमुख पदों पर परिवार के सदस्य ही होते हैं। स्कूल से होनेवाली आमदनी का एक बड़ा हिस्सा संबद्ध परिवार को ही जाता है । यदि कंपनियों को शिक्षा के क्षेत्र में काम करने का मौका मिले तो कर्मचारियों का शोषण कम होगा क्योंकि कंपनियां किसी व्यक्ति या परिवार के हितों को नहीं साधतीं।------ इससे मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर कम होगा और प्रतियोगिता को बढ़ावा मिलेगा।”

गैरमान्यता प्राप्त कम बजटवाले परफार्मिंग स्कूलों को मान्यता (पेज 76, खंड़ -1)

यह रपट उन गिनीचुनी रपटों में से है जो इस शहर के गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों के महत्व पर गौर करती है। समीक्षा रपट उद्घृत करती है कि गैर मान्यताप्राप्त स्कूलों की एसोसिएशन के मुताबिक प्राइमरी क्षेत्र के 4000 से ज्यादा स्कूल बगैर मान्यता के चल रहे हैं। नगर निगम की सर्वे रपट के मुताबिक दिल्ली में 1593 गैर मान्यता प्राप्त स्कूल हैं। रपट आगे कहती है दिल्ली मास्टर प्लान 2021 (जो 07.02.2007 से प्रभावी है)में प्राइमरी स्कूल के लिए के लिए 800 वर्ग मीटर के जमीन की शर्त्त लागाई गई है। इससे तो केवल 16 प्रतिशत स्कूल ही मान्यता के लिए हकदार हो पाएंगे। लेकिन यदि नगर निगम के  200वर्ग मीटर जमीन के नियम को लागू करें तो 61 प्रतिशत गैर मान्यता प्राप्त स्कूल मान्यता के लिए पात्र हो पाएंगे।

“--- समीक्षा समिति की यह राय है कि जबतक शिक्षा का अधिकार कानून द्वारा तय की गई बुनियादी जरूरतों को पूरा किया जाता हो और  शिक्षकों की योग्यता संबंधी नियमों को पूरा जाता हों तो अधिकतम संख्या में स्कूलों  को मान्यता देने पर विचार किया जाना चाहिए। शिक्षा क्षेत्र के गैर सरकारी संगठन प्रथम द्वारा किए गए एक अध्ययन से  यह बात सामने आई है कि शहर के सबसे पिछड़े वार्डों में से एक नंदनगरी के प्रायवेट स्कूल  नगर निगम  और यहां तक कि दिल्ली सरकार के स्कूलों से बेहतर हैं।

यह शायद सरकार द्वारा तैयार कराई ई रपटों में से अकेली रपट है जिसने इस बात को स्वीकार किया है कि प्रायवेट स्कूल सरकारी और नगर निगम के स्कूलों से बेहतर काम कर रहे हैं।

स्वायत्तता का अभाव सहायता प्राप्त स्कूलों के ह्रास का कारण (पेज 35, खंड़-1 )

“------- दिल्ली स्कूल एजुकेशन एक्ट एंड रूल्स 1973 में सरकारी स्कूलों,सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों ,गैर सहायता प्राप्त प्राइवेट स्कूलों में एक फर्क किया गया है। इसके कारण सरकारी सहायता प्राप्त  स्कूलों की स्वायत्तता खो गई है जो कभी उन्हें हासिल थी। सिक्युरिटी आफ सर्विस की जो व्यवस्था शिक्षकों को दी गई है इससे उनका स्टाफ पर नियंत्रण कम हो गया है -----इसने विशेष योग्यतावाले प्रिंसिपल और शिक्षकों के भर्ती के अवसरों को कम कर दिया जो  उच्च मानक बनाए रखते थे और  जिनके कारण स्कूल जाने जाते थे ------’

एसेंशियलिटी सर्टिफिकेट को हटाया जाए ( पेज 78 ,खंड-1)

------समीक्षा कमेटी ने डीएसईएआर 73 के नियम 44 के प्रावधानों की समीक्षा की । यह प्रावधान मुख्यरूप से निदेशालय को किसी क्षेत्र विशेष में नया स्कूल खुलने से पहले स्कूलों की आवश्यकताओं को जांचने में  सक्षम बनाता है ताकि डीडीए स्कूल चलाने के लिए सोसायटी को जमीन आवंटित की जा सके।-----दिल्ली में पहले से ही नझूल की जमीन की कमी है।। किसी क्षेत्र में स्कूलों की सप्लाई को सीमित करके निदेशालय स्कूल शिक्षा की मांग का जायजा लेने की बाजार की भूमिका को सीमित कर देता है।-----शिक्षा का अधिकार कानून 09 के तहत कोई ऐसा प्रावधान नहीं है।इसमे ऐसा बंधन है कि मान्यता के बगैर कोई स्कूल न चले।इसलिए समीक्षा समिति की राय है कि नियम 44का एसेंशियलिटी सर्टिफिकेट का जो प्रावधान है उसे खत्म किया जा सकता है।और बाजार को यह तय करने दिया जाए कि क्षेत्र विशेष में कितने स्कूलों की जरूरत है।

कम फीसवाले स्कूलों में शिक्षकों का वेतन (पेज 98 भाग-1)

यह उम्मीद करना अवास्तविक है कि सभी स्कूल शिक्षकों को समान ऱूप से सरकारी वेतनमान का भुगतान कर सकते हैं। समीक्षा समिति सिफारिश करती है छोटे स्कूलों के मामले में शिक्षकों का फीस के साथ कुछ संबंध होना चाहिए। एक पैमाना यह हो सकता है कि फीस में मिले पैसों का 50 प्रतिशत हिस्सा शिक्षकों को वेतन के रूप में दिया जाए।मुख्य विषयों को छोड़कर 40प्रतिशत शिक्षकों को  अनुबंध पर लिया जा सकता है। इन दोनों कदमों से  स्थिति में कुछ यधार्थवाद आ पाएगा।

- शांतनु गुप्ता

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