स्वतंत्रता को बचाने के लिए

स्वतंत्र पार्टी राज्य के बढ़ते हस्तक्षेप से नागरिकों  के संरक्षण की हिमायती है। यह कांग्रेस पार्टी के कथित समाजवाद की चुनौती का जवाब है।यह इस धारणा पर आधारित है कि सामाजिक न्याय और कल्याण को राज्य के स्वामित्व और सरकार के नियंत्रण के बजाय व्यक्तिगत हित  और व्यक्तिगत उद्यमशीलता के जरिये ज्यादा बेहतर तरीके से हासिल किया जा सकता है। यह इस सत्य पर आधारित है कि नौकरशाही प्रबंधन से पहल करने की भावना खत्म होती है और संसाधनों का नुक्सान होता है। जब राज्य  वैध रूप में उसके दायरे में आनेवाले क्षेत्रों का उल्लंघन करता है तो वह कुशल प्रबंधन में दिलचस्पी रखनेवालों के हाथों से प्रबंधन को लेकर उसे  उस नौकरशाही को सौंप देता है जो अप्रशिक्षित होती है और अपने अस्तित्व को बचाने के अलावा किसी बात में दिलचस्पी नहीं रखती।

स्वतंत्र पार्टी इस दावे पर आधारित है कि नागरिकों को अपनी संपत्ति रखने, स्वतंत्रतापूर्वक  और आपसी अनुबंधों के मुताबिक व्यवसाय चलाने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए। राज्य को इस स्वतंत्रता के मामले में नागरिकों की इस मामले में हर संभव तरीके से मदद करनी चाहिए न कि उसे विस्थापित करना चाहिए।

यह नई पार्टी सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी द्वारा कम्युनिस्टों को आगे बढ़ने से रोकने के उत्साह में कम्युनिस्टों के आदर्शों और तरीकों को अपनाये जाने की प्रवृत्ति का विरोध करती है।स्वतंत्र पार्टी का विश्वास है कि दुश्मन से मिल जाना सुरक्षा नही समर्पण है।

ऊपर बताई गई विचारधारा की हिमायत  के अलावा स्वतंत्र पार्टी कांग्रेस का वास्तविक  विपक्ष बनने की उम्मीद रखती है ताकि संसदीय लोकतंत्र सही तरीके से संतुलित हो। वास्तविक विपक्ष के अभाव में लोकतंत्र का ह्रास होकर वह वह सर्वसत्तावाद में तब्दील होता  जा रहा है। सभी क्षेत्रों से सशक्त विपक्ष के लिए आवाजें उठ रही हैं। नई पार्टी इस जरूरत को पूरा कर रही है।

यह स्वतंत्रता की समर्थक पार्टी एक नया प्रयोग कर रही है कि कुछ आवश्यक मुद्दों तक ही अनुशासन के नियंत्रण को सीमित रखा जाए  और अन्य सभी मामलों में सदस्य अपनी व्यक्तिगत राय के मुताबिक वोट डाल सकेंगे। यह विविध असहमत तत्वों को इकट्ठा करने की रणनीति मात्र नहीं हैं जैसा कि पहली नजर में दिखाई देता है।यह वास्तव में जवाब है निरंतर पार्टी की जकड़बंदी के खिलाफ व्यक्त किए जानेवाले असंतोष ,विचारों को दवाए जाने की शिकायतों और बहुसंख्यकों द्वारा अल्पसंख्यको पर शासन किए जाने की शिकायतों का। वर्तमान स्थितियों में  सत्तारूढ समूह का बहुमत देश की संसद में हर और सभी मुद्दो पर अपना नजरिया थोप सकता है।

स्वतंत्र पार्टी राजनीतिक दलों के सामान्य व्यवहार से अलग हटकर अपने सदस्यों को मूलभूत मुद्दों को छोड़ कर बाकी सभी मुद्दों पर अपनी सोच के मुताबिक वोट देने का स्वातंत्र्य देने की शुरूआत करने का इरादा रखती है। ताकि उन मुद्दों पर  संसद के फैसले आमराय को व्यक्त करें और केवल सत्तारूढ़ दल के बहुमत की राय या सत्तारूढ  समूह की खब्तो की अभिव्यक्ति न बन जाएं।

आनुपातिक प्रतिनिधित्व से पैदा होनेवाली असुविधाओं के बगैर और विशेषकर  इस व्यवस्था के तहत बननेवाली अस्थिर सरकारों ,व्हीप के तहत वोटिंग को न्यूनतम पर लाकर स्वतंत्र पार्टी सभी दलों के लिए एक स्वस्थ मिसाल पेश करना चाहती है। यदि सदस्यों को आवश्यक मुद्दों को छोड़कर सभी मुद्दों पर स्वतंत्रता देने की बात आमतौर पर पालन किया गया या विभिन्न दलों में से प्रमुख दलों ने इसका पालन किया तो यह व्यवस्था उन लोगों के आदर्शों के मुताबिक होगी जिन्होंने  आनुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की कल्पना की थी और उस पर अपनी आशाओं को केंद्रित किया था। इस बारे में नई पार्टी दावा कर सकती है कि उसने महान लोकतांत्रिक बढ़त बनाई है जिसपर  लोकतंत्र में विश्वास करनेवाले देशों में जो पार्टी अनुसासन के नाम पर तानाशाही लागू करने के पक्ष में नहीं हैं, परीक्षण किया जाना चाहिए।

नई पार्टी विश्वास नहीं करती  है कि कानूनी जबरदस्ती से वास्तविक और स्थायी मानवीय खुशी को हासिल किया जा सकता है। हमें स्वतंत्रता को नष्ट किए बगैर समानता लाने के लिए लोगों की नैतिक भावना पर निर्भर करना चाहिए।

यह हो सकता है कि हमारे देश में बड़ी संख्या में ऐसे लोग होंगे जिन्होंने अब  नैतिक अपील को प्रतिसाद देने की क्षमता खो दी है।लेकिन धर्म की अपील अब बी बहुत व्यापक है। ऐसे हालात पैदा होने की कई वजहें हो सकती हैं।दरअसल बुरे और सफल लोगों की इस विशाल संख्या के कारण हमें इस हकीकत से आंख नहीं मूंद लेना चाहिए कि जनता के बहुत बड़े तबके मे अबभी धर्म का बोलबाला है और उससे हमारे समाज को मदद मिलती है।हमारे देश के करोड़ों लोग अब भी धर्म  और अपनी आत्मा की आवाज से प्रेरित और संचालित होते हैं। इसे नकारनेवाले निराशावादी अगर सही होते तो हमारा समाज बहुत पहले ही बिखरकर नष्ट हो गया होता। हम रोजाना भुखमरी से हजारों लोगों की मौत की खबर सुनते। यदि हम तमाम धर्मदाय फाऊण्डेशनों और ट्रस्टों का सर्वे करें तो हम पाएंगे कि उनका काम हमेशा धार्मिक भावना के तहत और किसी सरकारी जबरदस्ती के भी  सामान्य रूप से चलता रहा है।हम इन विशाल संख्या में उपलब्ध तथ्यों को देखकर अपने निराशावाद का इलाज कर सकते हैं।दयाधर्म की भावना और ह्रदय की मजबूरी के कारण कभी इन ट्रस्टों की स्थापना हुई थी वह आज भी बरकरार रह सकती है क्योंकि आखिरकार  हम वही लोग वही समाज हैं।समाजवादियों का नारा था कि दयाधर्म की जरूरत नहीं है यह एक जिम्मेदारी है सरकार को एसके लिए बल प्रयोग करना चाहिए।वे भूल गए कि इससे गुलामी की स्थिति पैदा होगी।

निराशावादी सही नहीं हैं ।हमारा समाज आंतरिक कानून से चलता है।बाहरी कानून छूते हैं लेकिन जीवन के ऊपरी हिस्से कोही।वे अपराधियों से निपटते है और व्यवस्था को बनाए रखते हैं।सैंन्य जीवन कानूनों पर निर्भर नहीं है। यह लोगों की नैतिक चेतना पर निर्भर है।रीति रिवाजों और रूढ़ियों में चाहे जो परिवर्तन क्यों न आएं हों यह नैतिक चेतना प्रभावित नहीं हुई है। धर्म से ही समाज टिका रहता है।कहा गया है न -लोकाह धारियते।इस धर्म पर हमें  नया निर्माण करना चाहिए न कि भौतिक प्रेरणाओं की रेत पर । अच्छा बीज नष्ट नहीं हुआ है।वह अबभी वहां है हमें उसकी मौजूदगी की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।जमीन भी अच्छी है । ईश्वर हमारे लिए वर्षा भेजेगा।हमें उसकी देखभाल में कोताही नहीं करनी चाहिए।

- सी राजगोपालाचारी
- जानेमाने स्वतंत्रता सेनानी और भारत के पहले लेफ्टीनेंट गवर्नर रहे सी राजगोपालाचारी प्रकिष्ठित लेखक और उदारवादी चिंतक भी थे । प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की समाजवादी नीतियों का विरोध करने और स्वतंत्रता के जरिये समृद्धि लाने के अपने विचारों को मूर्त रूप देने के लिए उन्होंने स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की थी । तब स्वतंत्र पार्टी की सैद्धांतिक सोच को स्पट करने के लिए - व्हाय स्वतंत्र – नामक एक दस्तावेज जारी किया था। सी राजगोपालाचारी, मीनू मसानी, एनजी रंगा और के एम मुंशी ने इसका एक एक अध्याय लिखा था।यहां प्रस्तुत है इस दस्तावोज में से लिया गया सी रोजगोपालाचारी द्वारा लिखा लेख।