...ताकि खो ना जाए ये तारे जमीं पर

देश की सत्ता के तख्ता पलट के प्रयास जैसी सनसनीखेज खबर के साथ शुरू हुआ अप्रैल, 2012 का महीना निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अनुपालन के सुप्रीम कोर्ट के आदेश, अंर्तमहाद्वीप बैलेस्टिक अग्नि-5 मिसाईल परीक्षण, नक्सलियों द्वारा एक इतालवी नागरिक, जिलाधिकारी व एक विधायक के अपहरण जैसे सनसनीखेज खबरों के लिए चर्चित रहा। लेकिन, इन सबके के बीच एक ऐसी खबर सुर्खियां बटोरने में नाकाम रही जो भविष्य में देशी शिक्षा प्रणाली के स्वरूप में क्रांतिकारी परिवर्तन का आधार तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। यदि सबकुछ ठीक ठाक रहा तो 24 अप्रैल 2012 का दिन देश में सबको शिक्षा उपलब्ध कराने की सरकारी योजना के रास्ते में मील का पत्थर साबित हो सकता है। जी हां, इस दिन राज्यसभा में निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार (संशोधन) विधेयक पर न केवल चर्चा हुई बल्कि ध्वनिमत से यह बिल पारित भी हो गया।

यूं तो निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार (संशोधन) विधेयक में नौवीं व बारहवीं में रोजगार परक शिक्षा प्रदान करने के प्रावधान करने सहित कई मुद्दे शामिल थे। लेकिन सबसे अहम मुद्दा विशेष बच्चों (शारीरिक रूप से अक्षम) को शिक्षा उपलब्ध कराने से संबंधित था। इस विधेयक में एक और बात जो सबसे अहम है वह यह कि कम से कम विशेष बच्चों की शिक्षा के रास्ते ही सही सरकार द्वारा देश में होम स्कूलिंग (घर पर पढ़ाई) को लागू करने की ओर कदम बढ़ा दिया। बिल के इस प्रावधान से न केवल स्कूल जाने में असमर्थ विशेष बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने का मौका मिलेगा बल्कि अभिभावकों को अपने बच्चे के लिए उपर्युक्त माध्यम, प्रणाली, सिलेबस व मनचाहे समय और तरीके से शिक्षा प्रदान करने का मौका मिल सकेगा।

युनाइटेड स्टेट्स सहित अन्य देशों में काफी प्रचलित होम स्कूलिंग योजना की मांग देश में एजुकेशन रिफार्म के समर्थकों द्वारा लंबे समय से की जाती रही है। आंकड़ों की बात करें तो देश में वर्तमान में लगभग 12 मिलियन (एक करोड़ बीच लाख) लोग किसी न किसी प्रकार से शारीरिक व मानसिक तौर पर विकलांग हैं। यह आंकड़ा देश की जनसंख्या का लगभग 1.67 प्रतिशत है। इसमें से लगभग 35.29 प्रतिशत सिर्फ बच्चे (0-19 आयु वर्ग) हैं। इतनी बड़ी तादात में से मात्र एक प्रतिशत विशेष बच्चों के लिए ही स्कूल की सुविधा उपलब्ध है। बड़ी तादात में बच्चे किसी न किसी कारणवश स्कूल व शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। परिणाम स्वरूप उनके व्यक्तित्व का विकास प्रभावित होता है और ताउम्र उन्हें जीने के लिए किसी न किसी सहारे की आवश्यकता पड़ती है।

ताजा विधेयक के सर्वसम्मति से पास होने से अब विशेष बच्चों के शिक्षा के क्षेत्र में अहम बदलाव होने की उम्मीद की जा रही है। लेकिन यह भी ध्यान देने योग्य है कि देश में अब भी होम स्कूलिंग के प्रति लोगों की जागरूकता अत्यंत कम है। यहां परंपरागत शिक्षा को ही असली शिक्षा मानने वालों की भी बहुलता है। इसके अतिरिक्त यह मानने वालों की भी देश में कमी नहीं कि यदि बच्चों को जबतक पढ़ने के लिए किसी स्कूल में नहीं भेजा जाएगा तबतक उनकी शिक्षा अधूरी रहेगी और भविष्य में उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। देश में शिक्षा के वर्तमान ढांचे को देखते हुए लोगों का यह डर गैरवाजिब भी नहीं है। होम स्कूलिंग की वकालत करने के दौरान सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौति शैक्षणिक ढांचे को बदलते हुए लोगों की सोच को बदलने की भी होगी। इसके अतिरिक्त अमेरिका में होम स्कूलिंग व स्कूल से दूर एक स्कूल की परियोजना का खाका खींचने वाले खान एकेडमी के संस्थापक सलमान खान की तर्ज पर देश में भी ऐसी पहल करने वालों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इस एकेडमी की खासियत आनलाइन (टेक्स्ट, ऑडियो, वीडियो) आदि की सहायता से प्रभावी शिक्षा प्रदान करना है। हालांकि देश में भी इससे मिलते जुलते तर्ज पर नेशनल ओपन स्कूल (एनओएस), इंदिरा गांधी राष्ट्रीय महाविद्यालय (इग्नू), राजश्री टंडन मुक्त विश्वविद्यालय सहित कुछ ऐसे प्राथमिक, माध्यमिक व उच्च शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थान हैं जहां से पंजीकरण करा घर बैठे आनलाइन व दूरस्थ माध्यम से शिक्षा प्राप्त की जा सकती है। लेकिन विशेष बच्चों के लिए इन संस्थाओं के पास कितने पाठ्यक्रम और क्या अतिरिक्त सुविधाएं हैं इनपर विचार करना आवश्यक है।

वैसे व्यापक तौर पर देखें तो होम स्कूलिंग के अपने फायदे हैं और एक बड़ा तबका अब अपने बच्चों को घर पर भी पढ़ाने के समर्थन में खड़ा होने लगा है। हालांकि इस माध्यम के विरोध में भी तमाम लोग है जिनके पास जायज तर्क है। लेकिन यह माना जा रहा है कि सरकार की तरफ से यह विकल्प उपलब्ध होना चाहिए। यदि कोई अपने बच्चों को परंपरागत तौर पर स्कूलिंग पद्धति से ही शिक्षा प्रदान कराना चाहे तो और यदि कोई अपने ब्च्चों को घर पर पढ़ाना चाहे तो... वह दोनों के लिए स्वतंत्र हो।

- अविनाश चंद्र

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.