आरटीई के बावजूद शिक्षा हासिल करना एक चुनौती

उत्तर प्रदेश में रहने वाली तेरह साल की बानो खान कहती हैं कि उनके जैसे बहुत सारे बच्चे हैं जो गरीब परिवारों से होने की वजह से काम पर जाते हैं, क्योंकि उनके घर के आसपास कोई अच्छे स्कूल नहीं होते हैं. "मेरे घर से सबसे पास का स्कूल 2.5 किलोमीटर दूर है, और मेरे घरवाले हर महीने 200 रूप्ए बस किराया नहीं दे सकते हैं." स्थानीय बच्चों के समूह की अध्यक्षा बानो खान का परिवार बदली इंडस्ट्रीय एरिया में सड़क किनारे एक चाय की दुकान चलाता है. बच्चों के लिए मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम, में तीन किलोमीटर के भीतर एक उच्च प्राथमिक स्कूल खोले जाने का प्रावधान है.

बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था क्राई द्वारा राजधानी दिल्ली में आयोजित एक सम्मेलन में राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश राज्यों से आए छह बच्चों ने मुफ़्त शिक्षा के अधिकार का समर्थन करते हुए शिक्षा के उपयोग पर अपने विचार और तजुर्बे बांटे. उन्होंने बताया कि उन्हें रोज-रोज स्कूल जाते समय किस-किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. सामूहिक तौर से काम करते हुए इन बच्चों और उनके दोस्तों ने अपनी-अपनी जगहों के स्कूलों में ड्राप-आउट, भेदभाव और अपने समुदायों के बीच से बाल-विवाह जैसी समस्याओं को रोका है.

मध्यप्रदेश के 12 वर्षीय छात्र सुनील चंदेलकर ने बताया कि उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती उसके स्कूल की दूरी है. चंदेलकर ने कहा, "शिक्षा का अधिकार कानून छह से 14 वर्ष आयु वर्ग का मतलब आठवीं कक्षा तक के बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा की बात कहता है लेकिन गांवों के स्कूलों में केवल पांचवी कक्षा तक ही स्कूल हैं. इसके बाद हमें आगे की शिक्षा के लिए तीन किलोमीटर दूर दूसरे गांव के उच्च प्राथमिक स्कूल में जाना पड़ता है." उन्होंने बताया कि निजी स्कूल बसें उन्हें ले जाने से इंकार कर देती हैं क्योंकि उनके पास उनका भारी शुल्क देने के लिए पैसा नहीं होता.

घरों के आसपास सरकारी स्कूलों को गुणवत्तापूर्ण तरीके से सक्रिय बनाकर भारत की शिक्षा समस्या का स्थायी समाधान किया जा सकता है. क्राई ने बच्चों के समूहों के साथ काम करते हुए यह दर्शाया है कि बच्चे खुद अपने अधिकारों को कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं. क्राई की जनरल मेनेजर शुभेन्दु भट्टाचार्य बताते हैं कि "यह सच है कि सभी बच्चों की आवाजें अनुसनी ही रही हैं, चाहे बात आर्थिक पृष्ठभूमि की हो, चाहे गांवों या शहरों में रहने की हो, चाहे व्यस्को द्वारा उनके लिए जवाबदेही की मांग से जुड़े हों और मुफ्त-गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार को संवैधानिक रुप से सुरक्षा देने की हो. हमें बच्चों को परिवर्तन निर्माताओं के तौर पर सामूहिक शक्तियां देनी होंगी. उनके विचारों और जरूरतों को शिक्षा के अधिकार कानून में शामिल किये जाने की जरूरत है."

रोजाना की हकीकतों और अड़चनों का सामना करने वाले बच्चों को शिक्षा देने के लिए भारत सरकार को चाहिए कि वह उन्हें अपने क्रियान्वयन नीति का एक हिस्सा बनाए. अधिनियम को एक समान रुप से निजी स्कूलों में भी लागू करने की आवश्यकता है. मुफ्त शिक्षा पाना हर बच्चे का अधिकार है, यह अधिकार देने से निजी स्कूल बच नहीं सकते हैं.

वर्ष 2009 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 17,782 ऐसे आवासीय क्षेत्र हैं जहां स्कूल होना चाहिए लेकिन वहां एक किलोमीटर के क्षेत्र में एक भी प्राथमिक स्कूल नहीं है। उत्तर प्रदेश में ऐसी जगहों की संख्या सबसे ज्यादा 7,568 है. क्राई के मुताबिक देश में छह से 14 आयु वर्ग के 80 लाख से ज्यादा बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं.

जाहिर है शिक्षा का अधिकार कानून के बावजूद कई भारतीय बच्चों के लिए शिक्षा हासिल करना एक रोजमर्रा का संघर्ष बन चुका है क्योंकि उन्हें स्कूलों के उनकी पहुंच में न होने या शिक्षकों के उपलब्ध न होने जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है.

- शिरीष खरे