खाद्यान्न खरीद का औचित्य (भाग दो)

 

अन्य क्षेत्रों की तरह यहां भी चीनी सरकार ने बाजी मार ली है। 1960 का आयातक चीन आज तमाम देशों को गेहूं निर्यात करता है। वहां की सरकार ने एक अलग तरह का दोहरा मॉडल अपनाया है। विश्व में सर्वाधिक आबादी वाले इस देश में किसानों को पर्याप्त सब्सिडी दी जाती है, पर बाजार खुला है।

चीन में अनाज भंडारण, बेचने आदि पर कोई पाबंदी नही है और सरकार केवल मुनाफाखोरी व कीमतों पर निगरानी रखती है। आयात के लिए जहां सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है वहीं निर्यात की पूरी छूट दी गई है। घरेलू मोर्चे पर चीन इस समय आत्म निर्भर तो है ही, निर्यातक भी है। घरेलू मोर्चे से इतर मॉडल के तहत निजी व सरकारी क्षेत्र की कंपनियां घरेलू व विदेशी जमीनों पर व्यवसायिक खेती कर पैदावार निर्यात कर देती हैं। तमाम अफ्रीकी, लैटिन अमेरिकी और पिछड़े एशियाई देशों में चीनी कंपनियां लीज पर खेती की जमीनें लेकर खाद्यान्न उपजाकर वहीं बेच देती हैं। पश्चिमी अर्जेंटीना, कांगों, कोस्टारिका, घाना, जांबिया, आदि कई छोटे-छोटे पिछड़े देशों में तो चीनी कंपनियों ने वहां की सरकारों से दीर्घावधि करार किए हैं, जिनके तहत वे वहीं की जमीन पर खाद्यान्न पैदाकर वहीं की जनता को बेचेंगी।   

दूसरी ओर, हमारी सरकार की नकारा खाद्य नीतियों का प्रभाव यही है कि निजी कारोबारी व निर्यातक बाजार से बाहर हो गए। सरकार ही अनाज की सबसे बड़ी भंडारणकर्ता बन गई। सद्दाम हुसैन के शासनकाल के दौरान इराक ने गेंहू के बदले अत्यंत सस्ता तेल देने की पेशकश की थी, पर सरकार ने पेशकश ठुकरा दी। उसी साल हुई भीषण वर्षा के दौरान लाखों टन अनाज सड़ गया और फिर ऑस्ट्रेलिया से लाल गेंहू आयात किया गया। बाद में पता लगा था कि आयात किया गया गेंहू वास्तव में वहां के पशुओं का चारा था। कृषि लागत व मूल्य आयोग ने वर्ष 2013-14 के लिए खाद्यान्न खरीद नीति पर रिपोर्ट में अनाज की खरीद को चरणबद्ध तरीके से कम करके सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत जरूरत तक सीमित करने की सिफारिश की है। इससे एक कदम और आगे बढ़कर विश्व बैंक की 2011 की सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को खरीद व भंडारण की अप्रासंगिक नीति त्यागकर सबकुछ बाजार व निजी क्षेत्र के हवाले कर देना चाहिए। रिपोर्ट के एक पैरे में तो यहां तक मशविरा दिया गया है कि खरीद व भंडारण में आ रही लागत के मुकाबले भारत को आयात भी बेहद सस्ता पड़ेगा।

हाल में भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) की एक बैठक के दौरान भारत के केंद्रीय खाद्य मंत्री केवी थॉमस ने स्वीकार किया कि खाद्यान्न खरीददारी व प्रबंधन क्षेत्र में निजी क्षेत्र का साथ लिए बिना सरकार अकेले कुछ नहीं कर सकती। दूसरी ओर कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के अध्यक्ष अशोक गुलाटी ने भी व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन पर जोर दिया। खुले तौर पर तो निजी क्षेत्र को खाद्यान्न की खरीद-फरोख्त की पूरी छूट है, पर वास्तव में स्टॉक सीमा की बंदिश और सरकार द्वारा घोषित एमएसपी पर खरीदी की बाध्यता के चलते निजी क्षेत्र खाद्यान्न की खरीद फरोख्त से लगभग दूर ही रहता है।

यह क्षेत्र अभीतक राष्ट्रीयकृत है। जैसा कि कृषि लागत व मूल्य आयोग के अध्यक्ष अशोक गुलाटी ने भी कहा था। इस आधुनिक युग में जबकि हर देश अपने लगभग सभी क्षेत्रों को प्रतिस्पर्धा के लिए खोल चुका है, अपने देश की सरकार को भी बरसों पुरानी इस अप्रासंगिक नीति में आमूलचूल परिवर्तन लाने के लिए पीछे नहीं हटना चाहिए। इस क्षेत्र में हम इस हद तक आत्मनिर्भर हो चुके हैं कि खाद्यान्न को बर्बाद तक कर रहे हैं, जबकि दालें और तेल तिलहन जैसा क्षेत्र ऐसा है जिस पर हमें खास ध्यान देने की जरूरत है। हमें कोशिश करनी चाहिए कि हमारा अनाज खुले में न सड़े और हम आयातक के बदले निर्यातक बनें।

 

- कपिल अग्रवाल (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

सभारः दैनिक जागरण