रोहिंग्या रिफ्यूजीः जाएं तो जाएं कहां?

सुप्रीम कोर्ट ने रोहिंग्या शरणार्थियों पर सुनवाई अगले साल जनवरी तक स्थगित कर दी है। जनवरी 2019 में इस पर आखिरी सुनवाई होगी। याचिका में भारत में रह रहे रोहिंग्या लोगों ने वापस न भेजने की मांग की है। केंद्र सरकार की दलील है कि ये मसला आंतरिक सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़ा है लिहाजा अदालत इसमें दखल न दे। वहीं देश में रह रहे रोहिंग्या लोगों ने अपने कैंप में बुनियादी सुविधाओं की कमी की शिकायत भी याचिका में की है।

कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि बॉर्डर के जरिए जो रोहिंग्या भारत में प्रवेश चाहते हैं, उनको बॉडर से ही वापस भेजा जा रहा है। इसके लिए चिली पाउडर का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस पर केंद्र सरकार ने कहा कि हम देश को रिफ्यूजियों की राजधानी नहीं बनने देना चाहते। ऐसा नहीं हो सकता कि कोई भी आए और देश में रिफ्यूजी के तौर पर रहने लगे।

केंद्र ने कहा कि सरकार इस समस्या के समाधान के लिए राजनयिक प्रयास कर रही है, इसलिए कोर्ट को इस मामले में दखल नहीं देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के वकील से पूछा कि क्या ऐसे लोगों को देश में घुसने की इजाजत दी जा सकती है? इस पर आयोग के वकील ने कहा कि वो केवल उन लोगों के लिए चिंतित हैं जो इस समय बतौर रिफ्यूजी देश में रह रहे हैं। वहीं एक याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने जानना चाहा कि किसी रिफ्यूजी को देश में आने से किस आधार पर रोका जा सकता है?

बहरहाल अगले साल जनवरी में इस पर जो भी फैसला आए लेकिन ताज्जुब यह है कि दुनिया की 750 करोड़ की आबादी के बीच रोहिंग्या को जगह देने को कोई तैयार नहीं है। 37 हजार करोड़ स्केवयर किलोमीटर में फैली दुनिया में इन 12 लाख लोगों को छत गंवारा नहीं है। वो दर दर की ठोकरें खा रहे हैं पर उन्हें अपनाने के लिए कोई तैयार नहीं। देश दर देश, महाद्वीप दर महाद्वीप वो फुटबाल की मानिंद घूम रहे हैं पर उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। संयुक्त राष्ट्र भी रोहिंग्या मुसलमानों को दुनिया का सबसे प्रताड़ित जातीय समूह मानता है लेकिन वो भी उनकी मदद की दिशा में कुछ नहीं कर पा रहा। सरहदों की बंदिशों के बीच ये दोजख सरीखी जिंदगी जी रहे हैं।

रोहिंग्या की ज्यादातर आबादी सुन्नी मुसलमानों की है लेकिन इसमें कुछ परिवार हिन्दूओं के भी हैं। रोहिंग्या का नाम देश में भले ही कुछ सालों से चर्चा में हो लेकिन पड़ोसी देश म्यांमार और बांग्लादेश में ये नया नहीं है। रोहिंग्या 16वीं सदी यानी 400 सालों से म्यांमार (बर्मा) के रखाइन राज्य में रह रहे हैं। रखाइन म्यांमार का सबसे गरीब प्रांत है। म्यांमार की बहुसंख्यक आबादी बौद्ध है लिहाजा यहां भी बड़ी संख्या में बौद्ध रहते हैं वो रोहिंग्या को उनकी भाषा के कारण बंगाली (बांग्लादेश बाद में बना) मानते हैं। ये लोग जो बोली बोलते हैं वैसी भाषा बांग्लादेश के चटगांव में बोली जाती है। ये विवाद 1948 में म्यांमार के आजाद होने के बाद से ही चला आ रहा है। 1826 में जब पहला एंग्लो-बर्मा युद्ध समाप्त हुआ तो रखाइन (तत्कालीन अराकान) पर ब्रिटिश राज कायम हो गया। इस दौरान अंग्रेजों ने चटगांव से श्रमिकों को बड़े पैमाने पर रखाइन राज्य लाना शुरू कर दिया। इस तरह म्यांमार में बड़े पैमाने पर लोगों की संख्या बढ़ती गई। ये लोग मेहनत, मजदूरी में स्थानीय लोगों के मुकाबले ज्यादा दक्ष थे। कुछ रोहिंग्या पहले से ही रखाइन प्रांत में मौजूद थे और कुछ और के आने से उनकी संख्या में बड़ा इजाफा हो गया। रोहिंग्या की संख्या बढ़ती देख म्यांमार सरकार ने 1982 के राष्ट्रीयता कानून में रोहिंग्या का नागरिक दर्जा खत्म कर दिया। म्यांमार का कहना है कि ये बांग्लादेशी हैं भले ही ये पीढ़ी दर पीढ़ी म्यांमार में रह रहे हों। इसके बाद उन्हें देश छोड़ने के लिए मजबूर किया जाना लगा। जिसका नतीजा 2012 में देखने को मिला। इस साल रखाइन में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई जिसमें 100 से ज्यादा लोगों को जान गंवानी पड़ी और एक लाख से ज्यादा रोहिंग्या विस्थापित हुए।

बड़ी संख्या में रोहिंग्या आज भी जर्जर कैंपों में रह रहे हैं। म्यांमार के बहुसंख्यक बौद्ध लोगों और सुरक्षा बलों पर अक्सर रोहिंग्या मुसलमानों को प्रताड़ित करने के आरोप लगते रहे हैं। इन लोगों के पास कोई अधिकार नहीं है। ये ना कहीं आ जा सकते हैं ना ही काम कर सकते हैं। म्यांमार में उनकी कहीं सुनवाई नहीं है। 2012 में शुरू हुई धार्मिक हिंसा और सैन्य कार्रवाई के बाद करीब आठ लाख रोहिंग्या ने रखाइन प्रांत छोड़ दिया है। म्यांमार से लगते बांग्लादेश के दक्षिणी हिस्से में करीब सात लाख रोहिंग्या रहते हैं। बांग्लादेश इनमें से कुछ को शरणार्थी मानने को तैयार है लेकिन सभी को लेने के लिए वो भी राजी नहीं। 

भारत के अलावा रोहिंग्या थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, नेपाल ,चीन, सऊदी अरब और अमेरिका तक पहुंच गए हैं। मानवाधिकार समूहों ने कई बार म्यांमार को आगाह किया है कि वो इन्हें इनका उचित स्थान दे लेकिन वहां सत्ताधारी पार्टी की नेता आंग सान सू ची की सरकार इसे अनसुना कर देती है। माना जाता है कि वो इस मुद्दे पर वहां की ताकतवर सेना से टकराना नहीं चाहती।

रोहिंग्या को उनका हक दिलाने के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव भी डाला जा रहा है। इस काम में तुर्की, बांग्लादेश और इंडोनेशिया लगे हैं। उनकी कोशिश है कि   म्यांमार पर दबाव डाल इस अन्तरराष्ट्रीय समस्या का समाधान किया जाए लेकिन अभी तक के प्रयास असफल रहे हैं। पूरे परिदृश्य पर नजर रखने वाले लोगों का कहना है कि म्यांमार को अलग थलग रहने की लंबे समय से आदत है। वो अंतरराष्ट्रीय दबाव को ठेंगे पर रखता है। चीन हमेशा उसके साथ रहा है लिहाजा उसे पर्याप्त संसाधन की कभी दिक्कत नहीं है। वहां देश को एक रखने के लिए सत्तर सालों से सेना अपनी ताकत का इस्तेमाल करती रही है। सू ची की सरकार तो हाल फिलहाल बनी है जोकि सेना के साये में ही चल रही है।

भारत की बात करें तो संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संगठन के मुताबिक देश में 16 हजार रोहिंग्या शरणार्थी रहते हैं जबकि केन्द्र सरकार के मुताबिक ये आंकड़ा चालीस हजार का है। रोहिंग्या की मौजूदगी कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक है। अकेले जम्मू कश्मीर में ही सबसे ज्यादा करीब 14 हजार रोहिंग्या रहते हैं। इसमें आठ हजार जम्मू और छह हजार लद्दाख में हैं। लद्दाख में रहने वाले रोहिंग्या की पहुंच लेह और करगिल तक है। हाल ही रिपोर्ट आई है कि लद्दाख में रहने वाले कई हजार रोहिंग्या गायब हो गए हैं। ये कहां गए इसकी किसी को कोई खबर नहीं है।

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के मुताबिक भारतीय संविधान “गैर नागरिकों सहित सभी व्यक्तियों को समान अधिकार और स्वतंत्रता का अधिकार देता है”। लेकिन सरकार इससे इत्तेफाक नहीं रखती। केन्द्र सरकार कई बार उनको देश से निर्वासित करने की मंशा जाहिर कर चुकी है। सरकार ने ये भी साफ किया है कि देश में शरणार्थियों को पहचान पत्र देने की कोई नीति नहीं है। इस मामले में सरकार ने कहा कि श्रीलंकाई तमिल शरणार्थियों की तुलना रोहिंग्या से नहीं की जा सकती क्योंकि दिपक्षीय संधि के तहत तमिल शरणार्थियों को भारत आने की इजाजत दी गई थी जबकि म्यांमार के साथ ऐसा कोई करार नहीं है। दूसरे, भारत ने शरणार्थियों को लेकर संयुक्त राष्ट्र की 1951 शरणार्थी संधि और 1967 में लाए गए प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं, लिहाजा देश में कोई शरणार्थी कानून नहीं हैं। इसलिए सभी रोहिंग्या को वापस भेजा जाना है।

केन्द्र की दलील है कि रोहिंग्या देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं। ये तथ्य इस साल 19 जनवरी को बोधगया में हुए दो कम तीव्रता के विस्फोट से साबित भी हुआ। इस धमाके की जांच कर रही राष्ट्रीय जांच एजेंसी के मुताबिक इन विस्फोट का मकसद म्यांमार सरकार से लड़ रहे रोहिंग्या मुस्लिमों के साथ एकजुटता दिखाना और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ना था। जान और माल को नुकसान पहुंचा कर आतंकी देश की सरकार के खिलाफ जंग का माहौल बनाना चाहते थे। एनआईए ने इस केस में जमात-उल-मुजाहिदीन के शीर्ष नेता मोहम्मद जहीदुल इस्लाम और शेख सहित सात लोगों को गिरफ्तार किया। जहीदुल इस्लाम बांग्लादेश के जमालपुर का और आदिल शेख उर्फ असदुल्ला पश्चिम बंगाल में मुर्शीदाबाद का रहने वाला है।

इस साल अक्तूबर महीने में केन्द्र ने सात रोहिंग्या को वापस म्यांमार भेज दिया है। इस मामले के भी सुप्रीम कोर्ट में जाने पर सरकार ने कहा कि इन सभी के पास से मिले कागजों के आधार पर ये साबित होता है कि ये म्यांमार के नागरिक है और म्यांमार ने भी उन्हें अपना नागरिक मान लिया है। इसके बाद इन सातों को असम के रास्ते म्यांमार वापस भेज दिया। रोहिंग्या को वापस भेजने के केस में सरकार की ये एक बड़ी कामयाबी है।

देश की आबादी आज 130 करोड़ को पार कर चुकी है। संसद में सरकार ने खुद स्वीकार किया है कि दो करोड़ बांग्लादेशी देश में मौजूद हैं। इनमें से ज्यादातर के पास आधार कार्ड से लेकर भारतीय पासपोर्ट तक मौजूद हैं। ये वो लोग हैं जो चोरी छिपे बॉर्डर पार कर देश में घुसे हैं। पूरे घटनाक्रम पर नजर रखने वाले लोगों का कहना है कि सरकार रोहिंग्या के मामले में मानवीय पहलू को बिलकुल नजरअंदाज कर रही है। म्यांमार के साथ भारत के रिश्ते काफी मधुर रहे हैं। सू ची के सत्ता में आने के बाद तो ये संबंध और सुधरे हैं। सू ची की पढ़ाई भारत में हुई है और उनके केन्द्र सरकार से मधुर संबंध है। मानवीय पहलू को ध्यान में रखते हुए सरकार को देश में मौजूद रोहिंग्या को कुछ शर्तों के साथ शरण देने पर विचार करना चाहिए। जो रोहिंग्या देश में मौजूद हैं उनके पहले बायोमैट्रिक्स लेनी चाहिए ताकि स्थानीय आबादी के बीच उन्हें आसानी से पहचाना जा सके। उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं होना चाहिए और और उन्हें कुछ समय के लिए शर्तों के साथ रहने की इजाजत देनी चाहिए ताकि ये अपने जीवन स्तर को सुधार सके और इस लायक बन जाएं कि अपने पैरों पर खड़े हो सके। अपना घर बार खो चुके इन लोगों के सामने सबसे बड़ा संकट तो रोटी का है। यहां ये बात दीगर है कि जहां वैध शरणार्थियों के भरण पोषण की जिम्मेदारी वहां की सरकार की होती है वहीं अवैध शरणार्थियों के मामले में ऐसा नहीं होता। ये लोग स्थानीय लोगों के बीच रहकर अपनी आजीविका चलाते हैं  कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो देश में मौजूद बांग्लादेशियों घुसपैठियों की ज्यादातर आबादी ऐसा ही कर रही है। ये लोग रिक्शा चलाने से लेकर, घरों में बर्तन धोने से लेकर मेहनत मजूदरी कर रहे हैं और देश की अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहे हैं। हां ये लोग देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त ना हो इसका ध्यान रखना सरकार की जिम्मेदारी है।

- नवीन पाल
फोटोः साभार, एशिया टाइम्स
 

नवीन पाल