रॉबिनहुड सरकार, मध्यम वर्ग पर पड़ रही मार

पेट्रोल-डीजल पर सब्सिडी के रूप में प्रतिवर्ष खर्च होने वाली भारी धनराशि से निजात पाने और तेल कंपनियों को होने वाले घाटे से उबारने के लिए भारत सरकार ने वर्ष २०१० में पेट्रोल की कीमतों को विनियमित करने यानी बाजार के हवाले करने का फैसला किया। कीमतों को विनियमित करने से तात्पर्य तेल कंपनियों को वैश्विक दर के हिसाब से देश में तेल की कीमतों को कम या अधिक करने की आज़ादी प्रदान करना और सरकारी हस्तक्षेप को कम करना था। इस फैसले का एक अलिखित उद्देश्य पेट्रोल की कीमतों के राजनीतिकरण को रोकना भी था। सरकार के इस फैसले के बाद पेट्रोल की कीमतों में शुरुआती बढ़ोतरी हुई और फिर इसमें स्थायित्व आना शुरु हुआ। तेल कंपनियों के घाटे और सरकारी ख़र्चों में कमी आयी। पेट्रोल की कीमतों के इस सकारात्मक प्रभाव का असर यह हुआ वर्ष २०१५ में एक बार फिर डीज़ल की कीमतों को बाजार के हवाले करने का फैसला किया गया।

आदर्श रूप में जब किसी वस्तु की कीमत को बाजार के हवाले किया जाता है तो इसका सीधा अर्थ यह होता है कि कीमतों में होने वाली कमी या वृद्धि का लाभ या हानि उपभोक्ता को वहन करना होगा। लेकिन पेट्रोल व डीज़ल की कीमतों के साथ ऐसा नहीं हुआ। ओपेक देशों के बीच छिड़े प्राइस वार के कारण जब वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें कम होने लगीं और उपभोक्ताओं को इसका फायदा मिलने की आस जगने लगी तब सरकार ने इस पर एक्साइज़ टैक्स सहित अन्य टैक्सों की दरें बढ़ा दी और कीमतों को स्थिर रखा। हाल ही में कोरोना संक्रमण के दौरान जब समस्त विश्व लॉकडाउन था और तेल की मांग न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई तो वैश्विक स्तर पर कीमतें भी २० डॉलर प्रति बैरल के न्यून स्तर पर पहुंच गई। सरकार ने फाइनेंस एक्ट २०२० की आठवीं अनुसूचि में बदलाव कर पेट्रोल व डीजल पर लगने वाली एक्साइज़ ड्यूटी को एक बार फिर बढ़ाकर १० व ४ रुपये प्रति लीटर से क्रमशः १८ व १२ रुपये कर दिया। तीन महीने तक अनलॉक रहने के बाद दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत भी अनलॉक होने लगा तो तेल की मांग में इज़ाफा होने लगा।

आंकड़ों के मुताबिक जून २०२० में भारत में पेट्रोल की कुल खपत ११.८ मिलियन टन तक पहुंच गई जबकि जून २०१९ में इसकी कुल खपत १३.४ मिलियन टन रही। कोरोना संक्रमण काल में कल्याणकारी गतिविधियों और देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए २० लाख करोड़ की सहायता राशि खर्चने और इसकी प्रतिपूर्ति के लिए केंद्र व राज्य सरकारों को पेट्रोल-डीज़ल व शराब में अवसर दिखाई देता है। यही कारण है कि आजतक शराब व पेट्रोल-डीज़ल को जीएसटी के तहत नहीं लाया गया है। जहां केंद्र सरकार की योजना पेट्रोल-डीज़ल पर कर लगाकर १.६ लाख करोड़ रुपये के अतिरिक्त राजस्व हासिल करने की है वहीं राज्य सरकारें भी इस काम में पीछे नहीं हैं। राज्य सरकारों द्वारा भी तेल पर लगने वाले वैट की दर को बढ़ा दिया है।

उदाहरण के लिए यदि २२ जून को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमत ४२.२४ डॉलर प्रति बैरल और प्रति डॉलर ७५.७४ रुपये के हिसाब से गणना करें तो कुल आयात, परिवहन आदि खर्च जोड़कर भी भारत में पेट्रोल की कीमत प्रति लीटर २०.१२ रुपये पड़ती है। परिष्करण करने के बाद बिकने के लिये पेट्रोल पंप तक पहुंचने पर पेट्रोल की कीमत २४.६२ रुपये प्रति लीटर और डीज़ल २६.०४ रुपये प्रति लीटर हो जाती है। इसके बाद बारी आती है डीलर के प्रति लीटर ३.६ रुपये कमीशन और केंद्र द्वारा ३२.९८ रुपये प्रति लीटर आरोपित (अतिरिक्त एक्साइज़ ड्यूटी और सड़क निर्माण सेस) टैक्स की। इन्हें जोड़ने पर पेट्रोल की कीमत होती है ६१.२ रुपये प्रति लीटर। आगे बारी आती है राज्य सरकारों की। दिल्ली की बात करें तो यहां ३० प्रतिशत वैट लागू है और इस प्रकार १८.३६ रुपये प्रति लीटर जुड़ने के बाद अंत में पेट्रोल की कुल कीमत ७९.५६ रुपये पड़ती है। इसी प्रकार डीज़ल की मूल कीमत २६.०४ रुपये प्रति लीटर से बढ़कर अंततः ७८.८५ रुपये प्रति लीटर हो जाता है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि जनता को तेल की खरीद पर लगभग २५० प्रतिशत टैक्स चुकाना पड़ता है और उसे तेल की कीमतों के विनियंत्रित होने का कोई फायदा नहीं मिल रहा। साथ ही जो सरकार पहले इस पर भारी सब्सिडी खर्च करती थी वह अब इससे जबर्दस्त मुनाफा कमा रही है और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने इस पर आश्रित हो गई है। जबकि इसका सारा ठीकरा मध्यम वर्ग के सिर फूटता है। कोरोना काल सहित आम दिनों में सरकारें जहां रॉबिन हुड मोड में मुफ्त सेवा प्रदान करने के नाम पर जो राजनीति करती हैं उसका भार मध्य वर्ग की जेब पर ही पड़ता है। गरीब जहां सरकार से मुफ्त राशन, स्वास्थ्य सेवाएं हासिल करती है वहीं उच्च वर्ग को विभिन्न प्रकार के बेल आउट पैकेजेज़ प्राप्त होते हैं। जबकि मध्यम वर्ग का आम नागरिक ठगा महसूस करता है।  

- अविनाश चंद्र (लेखक आजादी.मी के संपादक हैं)