प्रतिनिधि वापसी का अधिकार

ब्रिटेन के मतदाताओं को अपना एमपी वापस बुला लेने का हक मिल गया है। अगर किसी क्षेत्र के मतदाताओं को लगता है कि उनके सांसद का बर्ताव खराब है तो उस क्षेत्र के दस फीसदी रजिस्टर्ड वोटर आठ सप्ताह के भीतर अपने हस्ताक्षर के साथ उसके खिलाफ शिकायत कर सकते हैं। रिकॉल ऑफ एमपीज बिल के तहत यह व्यवस्था की गई है कि ऐसे हालात में उस सांसद की सीट खाली हो जाएगी और उसे दोबारा भरने के लिए उप चुनाव कराए जाएंगे।
 
बहरहाल, प्रतिनिधि वापसी का यह अधिकार दो ही स्थितियों में कारगर होगा। या तो एमपी को किसी आरोप में जेल हो जाए, या फिर हाउस ऑफ कॉमंस उसके खिलाफ की गई शिकायत को वाजिब मान ले। मतदान के बाद भी जन प्रतिनिधि की नकेल मतदाताओं के हाथ में रहे, यह बात किसी भी जनतंत्र के लिए स्वागत योग्य मानी जाएगी। दूसरी तरफ चुने हुए प्रतिनिधियों को भी अपनी जिम्मेदारी निभाने के प्रति सचेत रहना होगा।
 
उम्मीद करें कि यह व्यवस्था पूरी तरह से पारदर्शी होगी और राजनीति तथा राजनेताओं के प्रति लोगों में बढ़ रहे अविश्वास में इससे थोड़ी कमी आएगी। भारत का राजनीतिक ढांचा काफी हद तक ब्रिटिश शासन प्रणाली से ही उधार लिया हुआ है, लिहाजा ब्रिटेन की इस पहल को भारत में भी लागू करने के लिए प्रयास तुरंत शुरू किए जाने चाहिए।
 
हमारे देश में प्रतिनिधि वापसी या राइट टु रिकॉल विचार के स्तर पर कोई नई चीज नहीं है। अरसा पहले जेपी मूवमेंट के दौरान इस पर गली-गली चर्चा हो चुकी है। इधर अन्ना आंदोलन के समय भी इसकी धमक काफी मजबूती से सुनी गई थी। लेकिन राजनैतिक दलों ने इसमें कोई खास दिलचस्पी शायद इसलिए नहीं दिखाई कि हमारे यहां सत्ता के गलियारे में ताकत और अपराध के खेल के लिए बनी एक अदृश्य जगह अभी हर पार्टी को अपने लपेटे में ले चुकी है।
 
लेकिन आने वाले दिनों में अगर राजनेताओं को अपनी पीठ ठोकने से फुरसत मिल जाए तो उन्हें ठंडे दिमाग से सोचना चाहिए कि लोगों की नजर में उनकी इज्जत कितनी गिर चुकी है, और इसे दोबारा उठाने के लिए वे ब्रिटेन से या दुनिया के किसी भी देश से क्या सबक ले सकते हैं।
 
 
साभारः नवभारत टाइम्स