शौचालय अधिकार कानून बने

अपने नागरिकों के लिए खाद्य और शिक्षा जैसी सामग्री और सेवाओं में सुधार के उपाय भारत ने कानून बनाकर किए हैं। भारत में शिक्षा का अधिकार कानून पहले ही है, और भूख तथा कुपोषण के समाधान के लिए अब खाद्य अधिकार कानून बनाने की तैयारी चल रही है। हालांकि शिक्षा का अधिकार कानून के नतीजे क्या निकलेंगे, यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी।

इस बीच बिहार ने सेवा अधिकार कानून बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। यह कानून इस राज्य के निवासियों के लिए यह सुनिश्चित करेगा कि वे एक तय समय के भीतर सार्वजनिक निकायों या दफ्तरों की सेवा प्राप्त कर सकेंगे, जैसे कि बिजली की मरम्मत और पोस्टमार्टम रिपोर्ट।

इन सबके मद्देनज़र यह सवाल उठता है कि क्या भारत में शौचालय अधिकार कानून की ज़रूरत है? क्योंकि यहां तक कि शहरों में भी अनेक भारतीयों को शौचालय अपने घरों में नसीब नहीं हैं। यह एक ऐसा मुद्दा है जिसमें वर्ण-व्यवस्था से लेकर सार्वजनिक स्वास्थ्य तक सब कुछ शामिल है।

हाल ही में नई दिल्ली में शहरीकरण पर हुए एक सम्मेलन में महिला कर्मियों के संगठन की एक नेता का सुझाव इसका एक समाधान हो सकता है। बर्कले के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय और नई दिल्ली के सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च द्वारा भारतीय शहरों पर आयोजित एक सम्मेलन में स्वनियोजित महिला संघ की अध्यक्ष रेनाना झाबवाला ने कहा, ‘शहरी शौचालयों का अधिकार हरेक भारतीयों को दिया जाना चाहिए। दरअसल शौचालय व्यवस्था मौजूद नहीं है. अधिकांश छोटे नगरों, छोटे शहरों में उनका अस्तित्व है ही नहीं।’

बड़े शहरों में भी हालत अच्छी नहीं है। इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स नामक एक नयी संस्था के निदेशक अरोमर रेवी ने मुंबई में एक सम्मेलन में कहा कि लगभग पांच लाख लोगों को शौचालय के लिए बाहर जाना पड़ता है। उक्त संस्था देश में शहरीकरण शिक्षा कार्यक्रम तैयार करने की प्रक्रिया में है। 2001 की जनगणना के समय दिल्ली के 32 फीसदी घरों में शौचालय सुविधा उपलब्ध नहीं थी। जहां तक निकासी की बात है तो शहर के योजना विभाग का कहना है कि दिल्ली में प्रतिदिन बहनेवाले 715 मिलियन गैलन गंदे पानी में से सिर्फ आधे को ही शोधित किया जाता है, जबकि बाकी पानी उसी हाल में यमुना नदी में जाकर मिल जाता है। अन्य शहर भी गंदे पानी की निकासी के लिए यमुना नदी पर ही निर्भर हैं।

सुश्री झाबवाला का कहना है कि शहर की सेवाओं के प्रति योजना अधिकारियों का रवैया इस समस्या की एक बड़ी वजह है। आमतौर पर योजनाबद्ध आस-पड़ोस के लिए शहर के अधिकारी निकासी व्यवस्था का इंतजाम किया करते हैं। लेकिन अधिकांश भारतीय शहरों के बड़े हिस्से गैर-योजनाबद्ध तरीके से विकसित हुए हैं। राजनीति सहित अनेक कारणों से दशकों से इन क्षेत्रों में कानूनी उपेक्षा की स्थिति बनी हुई है। इस दौरान उन्हें साफ-सफाई जैसी सेवाएं उपलब्ध नहीं हुईं।

वे कहती हैं, ‘अगर आप यह सुविधा प्रदान नहीं करेंगे तो वे इसी तरह अपना काम चलाएंगे।’

- वाल स्ट्रीट जर्नल

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