राष्ट्रों की अमीरी-गरीबी का रहस्य?

 

ऐसा क्यों है कि कुछ देश अमीर हैं, जबकि बाकी गरीब हैं? इस सवाल ने सदियों से शिक्षाविदों, राजनेताओं और आम लोगों का ध्यान आकर्षित किया है और इसके उतने ही जवाब हैं, जितने लेखक हैं। एमआईटी में इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर डेरन एस मोग्लू और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जेम्स ए रॉबिन्सन ने हाल ही में आई अपनी किताब 'व्हाई नेशंस फॉल' में इसका एक कारण बताया है जिसने सारी दुनिया का ध्यान खींचा है। उनका लुब्बेलुबाब यह है कि अमीर देश दो मापदंडों को पूरा करते हैं: पहला इन देशों में एक केंद्रीय राजनीतिक सत्ता होती है और दूसरा इन देशों के सत्ता संस्थान समावेशी होते हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि सारी सत्ता कुछ संभ्रांत लोगों तक ही सीमित न रहे, बल्कि समाज के हर तबके में उसका समान वितरण हो। इसके विपरीत वैसे देश असफल हैं जहां केंद्रीय सत्ता विकसित नहीं हो पाई है, जैसे सूडान और कांगो या फिर जहां सारी सत्ता कुछ खास वर्गों तक सीमित है जैसे उत्तर कोरिया और जिम्बाब्वे। 
कुछ देशों की अमीरी के तमाम दूसरे कारणों को इस किताब में खारिज कर दिया गया है, जैसे कि इसकी मुख्य वजह संस्कृति है (जैसा मैक्स वेबर ने बताया है), या इसकी वजह भौगोलिक स्थिति है (जैसा कि हाल के दिनों में जेफरी सैक ने दावा किया है), या फिर इसका कारण घर में उगाए जा सकने वाले पेड़-पौधे, पशु तथा अन्य संसाधन हैं (जैसा जेरेड डायमंड का कहना है) या फिर यह नीतियों पर अच्छी सलाह का नतीजा है (जैसा कि अधिकांश विशेषज्ञ खासकर वल्र्ड बैंक और आईएमएफ के एक्सपर्ट कहते हैं)। 
लेखक विश्लेषण के लिए एक जैसी संस्कृति, भूगोल और संसाधनों वाले दो देशों की तुलना करते हैं जिनके आर्थिक हालात अलग-अलग हैं। उदाहरण के लिए वे नोगालेस शहर की चर्चा करते हैं जिसके बीचोंबीच अमेरिका और मेक्सिको की सीमा है। सीमा के एक ओर अमीरी है, जबकि दूसरी ओर गरीबी। लेखकों का तर्क है कि नोगालेस, सोनोरा की तुलना में नोगालेस, एरिजोना अमीर है क्योंकि इसकी राजनीतिक और आर्थिक संस्थाएं बिलकुल अलग हैं। पारदर्शी फ्री मार्केट और निजी संपत्ति को लेकर अलग-अलग प्रावधान हैं, जो सीमा के दोनों ओर के निवासियों के लिए अलग-अलग माहौल पैदा करते हैं। तो क्या सबसे ज्यादा जरूरत संस्थाओं के निर्माण के लिए अच्छी सलाहकारी नीतियों की है? शायद नहीं। लेखकों का कहना है कि गरीब देशों में संस्थागत सुधार की बाधा ज्ञान का अभाव नहीं है, बल्कि इन देशों में सत्ता को नियंत्रित करने वाला एक छोटा तबका हालात में बदलाव नहीं चाहता क्योंकि इससे सत्ता पर उसका नियंत्रण कम होने का खतरा हो सकता है। 
फिर ऐसा क्या है कि कुछ देश समावेशी सत्ता संस्थानों का विकास करने में सफल होते हैं, जबकि अन्य देशों में यह संभव नहीं हो पाता। एसमोग्लू और रॉबिन्सन इसकी व्याख्या के लिए तीन अवधारणाओं की मदद लेते हैं: महत्वपूर्ण पड़ाव, शुरुआती अंतर और गुणकारी/दोषपूर्ण चक्र। उनका तर्क कुछ ऐसा है: समय के साथ दुनिया या उसके किसी क्षेत्र विशेष में ऐसे नाजुक मोड़ आते हैं, जो बदलाव की क्षमता रखते हैं। जैसे कि ब्लैक डेथ जिसने यूरोप की आधी आबादी को खत्म कर दिया था या फिर अमेरिका की खोज जिसने संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए थे। 
ऐसी महत्वपूर्ण घटनाओं से अलग-अलग देश कैसे निबटते हैं, यह काफी हद तक उनके हालात पर निर्भर होता है और यही आगे चलकर संस्थागत भिन्नताओं का सबसे बड़ा कारण बनता है। उदाहरण के लिए ब्लैक डेथ के चलते पूरे यूरोप में मजदूरों की किल्लत हो गई। पश्चिमी यूरोप में यह दास प्रथा के खात्मे का कारण बना क्योंकि मजदूर अपने लिए ज्यादा मजदूरी और अन्य सुविधाओं की मांग करने लगे और विद्रोह तक के लिए खड़े हो गए। वहीं पूर्वी यूरोप में, जहां कि जमीनों का आकार अपेक्षाकृत बड़ा था, भू मालिक जमीनों के ज्यादा संग्रहण और निरंकुशता पर उतर आए। लेखकों का कहना है कि इस परिस्थिति से निबटने में दोनों के अलग-अलग तरीके के नतीजे भी अलग-अलग निकले। पश्चिमी यूरोप में यह जहां समावेशी सत्ता संस्थानों और लोकतंत्र की स्थापना का कारण बना, जबकि पूर्वी यूरोप दौड़ में पीछे रह गया। 
इसी तरह अमेरिका की खोज को लेकर स्पेन या पुर्तगाल के मुकाबले इंग्लैंड का रवैया काफी अलग था क्योंकि 1688 के ग्लोरियस रिवॉल्यूशन ने इंग्लैंड के राजा की शक्तियां काफी कम कर दी थीं। स्पेन और पुर्तगाल की राजशाही अमेरिका के साथ होने वाले व्यापार को पूर तरह नियंत्रित करने और मनमाफिक मुनाफा कमाने में सफल रही, जबकि ब्रिटेन में यह व्यवसायियों के एक नए वर्ग के उदय का कारण बना जिन्होंने अपनी पूंजी की ताकत के बूते औद्योगिक क्रांति की शुरुआत में अहम भूमिका निभाई। 
लेखक भारत और चीन के भविष्य को किस नजरिये से देखते हैं? चीन के बारे में उनकी निर्विवाद राय है कि वह अपने विकास की गति को बरकरार नहीं रख सकता है बशर्ते वह अपनी व्यवस्था में बदलाव नहीं करे। लेकिन चीन इतने लंबे समय तक इतनी तेजी से विकास करने में कैसे सफल रहा है? लेखकों का कहना है कि शोषक(एक्सट्रेक्टिव) संस्थाओं के होने के बावजूद भी देश कुछ समय के लिए तेजी से विकास कर सकते हैं। पूर्ववर्ती सोवियत संघ ने ऐसा ही किया था। उसने कृषि जैसे कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों से पूंजी को जबरदस्ती ज्यादा उत्पादकता वाले क्षेत्रों में स्थानांतरित किया। लेकिन एक बार जब देश आय के मध्यम स्तर तक पहुंच जाता है, तो यह प्रक्रिया खुद ही रुक जाती है। जहां तक भारत का सवाल है, तो लेखकों के पास कहने को कुछ ज्यादा नहीं है। मेरी राय में इसका कारण यह है कि भारत के बारे में कुछ भी निष्कर्ष निकालना आम तौर पर मुश्किल साबित होता रहा है। एक तरफ हमारी राजनीतिक संस्थाएं हैं जो समावेशी दिखती हैं। दूसरी ओर कौन इससे इंकार करेगा कि हमारी संस्थाएं शोषक(एक्सट्रेक्टिव) नहीं हैं? इसलिए भारत के बारे में कुछ भी निष्कर्ष नहीं देने के लिए मैं लेखकों को कोई दोष नहीं दूंगा। 
 
- टोनी जोसेफ (बिजनेसवल्र्ड के पूर्व संपादक और मीडिया सर्विस फर्म के चेयरमैन)
साभारः दैनिक भास्कर