अमीरों का त्याग और गरीबों का भाग

अगर देश का अमीर तबका कुछ अधिक सादगीपसंद होता तो क्या देश के कुछ और अधिक लोगों की जिंदगियां मौजूदा के मुकाबले बेहतर होतीं? अतिशय खर्च के खिलाफ मौजूदा लड़ाई हमें बताती है कि मध्य वर्ग की बढ़ती आय और तेजी से ऊपर उठती जीवनशैली, और साल दर साल करोड़पतियों की बढ़ती संख्या के बीच अर्थशास्त्री बढ़ती असमानता को लेकर लगातार अपनी असहमति जताते रहे हैं।

महज चार वर्ष पहले की बात है,प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उद्योग संगठन भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के एक सम्मेलन में कारोबारियों को यह सुझाव देकर घबराहट पैदा कर दी थी कि वे 'अत्यधिक पारिश्रमिक का प्रतिरोध' करें और ज्यादा खपत को हतोत्साहित करें। दो वर्ष बाद कंपनी मामलों के तत्कालीन मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहीं अधिक सपाट तरीके से कहा था कि कंपनियां अपने शीर्ष अधिकारियों को अत्यधिक वेतन देने से बचें। वर्ष 2010 में जब अर्थव्यवस्था बढ़ती महंगाई से जूझ रही थी तक कंपनी विधेयक पर संसद की स्थायी समिति ने मुख्य कार्याधिकारियों के वेतन की सीमा तय करने की अनुशंसा की।

सिंह ने सीआईआई में जो वक्तव्य दिया था वह शायद देश के कारोबारी जगत को संदेश देने का उनका अपना विनम्र तरीका था। वह उन्हें याद दिलाना चाहते थे कि जहां देश के अधिकांश लोग रोजाना एक डॉलर की आय के लिए जूझते रहते हैं वहीं उनका इतना अधिक खर्च करना अरुचिकर है। उद्योग जगत का कहना है कि उसके वेतन भत्ते पश्चिमी देशों की तुलना में कहीं नहीं ठहरते। यह तर्क बहुत वजनदार नहीं है क्योंकि हमारे देश की कंपनियों का आकार भी पश्चिमी देशों की कंपनियों के मुकाबले बहुत छोटा है। बहरहाल ऐसा लगता नहीं कि यह समस्या निकट भविष्य में हल होने जा रही है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के अनेक प्रभावशाली नेताओं को यकीनन समाजवाद के वे दिन याद होंगे जब एक प्रबंध निदेशक के वेतन को सबसे पहले 7,000 रुपये तक सीमित किया गया और बाद में एक दशक के बाद इसे बढ़ाकर दोगुना किया गया।

देश का मध्य वर्ग संभवत: उस समय आज के मुकाबले अधिक असंतुष्ट था लेकिन वह कभी विरोध करने सड़कों पर नहीं उतरा क्योंकि उसे लगता था कि ऐसा करने से कुछ हासिल नहीं होगा। अगर आज वह ऐसा करता है तो ऐसा इसलिए होगा क्योंकि वह इस बात को अच्छी तरह समझता है कि आखिर कैसे भ्रष्टाचार उसके मध्य वर्गीय जीवन से अमीरी तक के सफर में अड़चन पैदा कर सकता है। इस समय अनेक अर्थशास्त्री और चिंतक जिस असमानता के विषय से उलझ रहे हैं वह भारतीयों के अधिक संख्या में गरीब होने की वजह से नहीं बल्कि इसलिए है क्योंकि बढ़ी संख्या में भारतीय अमीर हो रहे हैं।

ऐसे में जाहिर है अगर सीईओ तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारी अपने वेतन भत्तों में कमी लाकर नारायण मूर्ति और वारेन बफेट की तरह की सादगी अपनाते हैं तो यह उनकी नैतिकता का मामला हो सकता है। बहरहाल, इससे न तो गरीबों के जीवनस्तर में कोई सुधार होगा, न ही उनके हित में महत्त्वपूर्ण मात्रा में धन जारी होगा। निश्चित तौर पर गरीबों को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि अमीर और अधिक अमीर होते जा रहे हैं। ध्यान दीजिए कि मुकेश अंबानी ने हाल ही में मुंबई में जो आलीशान घर बनाया है उसके खिलाफ क्रांतिकारी विरोध प्रदर्शन करने के बजाय वे अपने मेहमानों को वहां पर्यटन स्थल की तरह घुमाने ले जाते हैं।

बहरहाल, अभी यह अनिश्चित है कि क्या प्रधानमंत्री उक्त विडंबनाओं से परिचित भी हैं अथवा नहीं। देश में गरीबों की संख्या ऐसे समय में नीतियों की असफलता के ही कारण है।

- बिज़नेस स्टैण्डर्ड