आरक्षण और सामाजिक न्याय में बढ़ती दूरी

पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के 16 ब्लॉक डेवलेपमेंट अधिकारियों (बीडीओ) में से 12 आरक्षित वर्ग (एससी और ओबीसी) से आते हैं। गौरतलब है कि इनमें से पांच एक ही जाति से हैं, और केवल चार सामान्य वर्ग से हैं। इसी तरह, यहां के 18 थानेदारों (एसएचओ) में से नौ सामान्य वर्ग और नौ आरक्षित वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। मगर हैरत की बात है कि आरक्षित वर्ग के नौ थानेदारों में से सात, उस समुदाय के हैं, जिस पर राज्य की सपा सरकार की खास कृपा रहती है। वोट बैंक की राजनीति का ऐसा ही उदाहरण उत्तर प्रदेश में बसपा की पिछली सरकार के कार्यकाल में भी दिखा था, जब कैबिनेट रैंक के पद गठित किए गए, जिनमें खास समुदाय को तरजीह मिली। ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि किस तरह सकारात्मक व्यवस्‍था (आरक्षण) के नाम पर कुछ खास समुदाय राजनीतिक मुनाफा कमाते हैं, और भारत में आरक्षण नीति को नाकामयाब साबित करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन खास समुदायों का समृद्ध तबका आरक्षण का सारा फायदा उठाता है।
 
मुझे लगता है कि सर्वोच्च अदालत का सही समय पर आया फैसला अवसर देता है कि देश की आरक्षण नीति से जुड़े तमाम पहलुओं पर गंभीरता के साथ चर्चा हो। ओबीसी की सूची में जाट समुदाय के शामिल न होने के अदालत के फैसले ने इस सवाल की ओर इशारा किया है कि आखिर आरक्षण की जरूरत किसको है? साथ ही, इस फैसले ने राजनीतिक वर्ग के सामने भी गंभीर चुनौती पेश की है। इसने भारत की सामाजिक-राजनीतिक संरचना पर पुनर्विचार करने का अवसर भी दिया है। हालांकि अदालत के इस फैसले को बारीकी से देखे जाने की जरूरत है। अपने ऐतिहासिक फैसले में सर्वोच्च अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) की फिर से व्याख्या की है, जिसमें भारत में सामाजिक न्याय के पूरे परिदृश्य को बदलने की क्षमता है। फैसले में यह कहा गया कि केवल जाति सामाजिक न्याय और आरक्षण की व्यवस्‍था की अकेली कसौटी नहीं हो सकती। इसमें पिछड़पन के निर्धारण के लिए ऐतिहासिक पिछड़ेपन और अन्याय पर भी सवाल खड़े किए।
 
दरअसल इस फैसले ने उस प्रचलित धारणा को वैधता प्रदान की है, जिसके मुताबिक हाल के वर्षों में जाति आधारित आरक्षण सामाजिक न्याय का प्रभावकारी उपकरण नहीं रह गया है। आरक्षण की प्रचलित व्यवस्‍था ने न केवल पार्टियों के राजनीतिक व चुनावी हितों को साधा है, बल्कि इसने समाज में गैर-जरूरी विभाजन भी पैदा किया है।
 
अपने मौलिक रूप में जो आरक्षण नीति अपनाई गई थी, उसे पूरी तरह खारिज करने के लिए यह बहस नहीं है। सकारात्मक कार्रवाई की यह व्यवस्‍था सामाजिक तौर पर वंचित समुदायों को सुरक्षा देने और सदियों से हो रहे सामाजिक अन्याय को सुधारने के लिए अपनाई गई थी; और यह काफी हद तक कामयाब भी रही है। मगर पिछले करीब दो दशकों से इसका दुरुपयोग हो रहा है।
 
दरअसल, जिस ढंग से आरक्षण की व्यवस्‍था लागू हुई है, उससे नौकरी, शिक्षा, आर्थिक अवसर और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में लाभार्थियों की पहली पीढ़ी ने अपनी और अपनी संतानों की जिंदगी को बेहतर बनाया है। समय के साथ, यह पीढ़ी आरक्षण का फायदा उठाती गई और इस तरह आरक्षित वर्ग के भीतर एक अभिजात्य वर्ग ने पैठ जमा ली और सामाजिक न्याय के फायदों को निचले तबके तक पहुंचने से रोक दिया। अपनी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल करते हुए इस वर्ग ने आरक्षण की पात्रता पर होने वाली हर बहस को कमजोर किया।
 
इसके अलावा एक अहम पहलू पहले से राजनीतिक और सामाजिक रूप से प्रभुत्व वाले जातिसमूहों के सामाजिक न्याय के लाभों पर एकाधिकार से जुड़ा है। ओबीसी वर्ग के भीतर कुछ ऐसे जाति समूह थे, जो ऐतिहासिक तौर पर आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक मोर्चे पर काफी मजबूत स्थिति में थे। इस वर्ग ने आरक्षण का फायदा उठाते हुए, ओबीसी के भीतर आने वाले दूसरे वर्गों को आरक्षण के लाभ और राजनीतिक सबलीकरण से वंचित कर दिया। ऐसा ही कुछ एससी और एसटी वर्ग के साथ भी हुआ। ऐसे तमाम लोगों से संपर्क के बाद मुझे महसूस हुआ कि न केवल ऊंची जातियों, बल्कि नीची जातियों में इस बात को लेकर गुस्सा है, कि किस तरह उन्हीं की जाति के उप समुदायों ने अपनी आक्रामकता और ज्यादा तादाद का फायदा उठाते हुए आरक्षण से मिलने वाले फायदों पर एक तरह से कब्जा कर लिया है। ऐसे में, व्यवस्‍था में सुधार के साथ यह देखे जाने की बेहद जरूरत है कि आरक्षण का फायदा उठाकर कौन-सा समुदाय या जाति सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक तौर पर मजबूत हो गई है, और कौन-सा समुदाय अब तक सशक्तिकरण की इस प्रक्रिया से अछूता रह गया है। पूरे राजनीतिक वर्ग को इस ओर ध्यान देना होगा। अब वक्त आ गया है कि आरक्षण के लिए एक नई सामाजिक-आर्थिक इकाई बनाई जाए, जो सभी जातियों व धर्मों से ऊपर हो। एक ऐसी व्यवस्‍था कायम हो, जिसमें केवल जरूरतमंद को ही आरक्षण दिया जाए। कहने की जरूरत नहीं कि इस व्यवस्‍था में सामाजिक न्याय प्रदान करते वक्त आरक्षण व्यवस्‍था में कुछ नए समूहों का समावेश करना पड़ेगा, जो अब तक आरक्षण की छतरी से बाहर रह जाते थे।
 
 
- जितिन प्रसाद (पूर्व मानव संसाधन राज्यमंत्री)
साभारः अमर उजाला