प्रोन्नति में आरक्षण का औचित्य

सरकारी नौकरियों के लिए प्रोन्नति में आरक्षण संबंधी विधेयक को लेकर पिछले दिनों राज्यसभा में जो कुछ हुआ, वह तो शर्मनाक है ही, इस संबंध में सरकार एवं प्रमुख दलों का रवैया उससे भी अधिक शर्मनाक है। समाजवादी पार्टी इसे साफ तौर पर सामाजिक न्याय के विरुद्ध मानती है। बसपा सुप्रीमो मायावती इसके लिए भाजपा से भी मदद की गुहार लगा चुकी हैं और बाद में इसे पारित न करा पाने के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों को समान रूप से जिम्मेदार भी ठहरा चुकी हैं। जाहिर है, वह इस विधेयक के पेश किए जाने को भी अपनी उपलब्धियों में गिनती हैं और आने वाले चुनावों में भुनाने की कोशिश भी करेंगी। भाजपा कई अन्य महत्वपूर्ण मसलों की तरह इस मसले पर चुप्पी साधे हुए है। कांग्रेस भी इस पर साफ तौर पर बोल कुछ नहीं रही है। यह अलग बात है कि विधेयक सदन में पेश कर दिया और लोकसभा से तो पारित भी करवा लिया। अब आम जनता अगर इससे यह निष्कर्ष निकालती है कि यह विधेयक केवल कोल ब्लॉक आवंटन से उपजे विवाद से सबका ध्यान हटाने के लिए सत्तारूढ़ दल द्वारा चली गई एक चाल है, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

यह कोई पहला मौका नहीं है जब सरकार एक महत्वपूर्ण मसले से लोगों का ध्यान हटाने के लिए दूसरे विवाद को जन्म दे रही हो। सुप्रीम कोर्ट इस मामले को इससे पहले ही चार बार खारिज कर चुका है। सपा प्रवक्ता प्रो. रामगोपाल यादव का स्पष्ट तर्क है कि उसे पलटने के लिए संविधान संशोधन का कदम प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है। अगर यह संशोधन हो गया तो इसके बाद संविधान के अनुच्छेद 16 और 335 प्रोन्नति के कोटे में बाधा बनेंगे। इससे इसी मामले में 19 अक्टूबर 2006 को दिया गया सुप्रीम कोर्ट का फैसला निष्प्रभावी हो जाएगा। इससे केंद्रीय नौकरियों में तो अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों को कोटे का लाभ प्रोन्नति में तो मिलेगा ही, राज्यों की नौकरियों में भी आबादी के लिहाज से परिणामी ज्येष्ठता के आधार पर प्रोन्नति मिल सकेगी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि प्रोन्नति में कांसीक्वेंशियल सीनियारिटी का फायदा तभी मिल सकता है, जब साबित हो कि एससी/एसटी का समुचित प्रतिनिधित्व वरिष्ठ पदों पर नहीं है। साथ ही, यह शर्त भी रखी थी कि सरकार इस संबंध में सही आंकड़े उपलब्ध कराए और इससे किसी तरह प्रशासनिक दक्षता प्रभावित न हो। शर्मनाक स्थिति यह है कि सरकार या आरक्षण समर्थक दलों ने इसमें से एक भी शर्त नहीं मानी।

भ्रम फैलाने वाले निराधार बयान चाहे जितने दिए गए हों, लेकिन समुचित आंकड़े आज तक एक भी उपलब्ध नहीं कराए गए। प्रशासनिक दक्षता के प्रभावित न होने संबंधी बात तो अब लगभग निरर्थक सी हो गई है। यह गौर करने लायक बात है कि जो दल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए अभी प्रोन्नति में आरक्षण के लिए संविधान में संशोधन किए जाने की वकालत कर रहे हैं, वही गरीब सवर्णो को भी सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिए जाने की बात कर रहे हैं। मायावती पहले ही यह बात कर चुकी हैं और अब रामविलास पासवान भी यह मांग कर रहे हैं। उधर द्रमुक पिछड़ों को भी प्रोन्नति में आरक्षण का नया सुर छेड़ रही है। महिलाओं के लिए आरक्षण की बात चल ही रही है, यह अलग बात है कि वह भी लगातार राजनीति की भेंट चढ़ जा रही है। अगर यह सभी बातें मान ली जाए तो यह सोचने की बात है कि देश की सरकारी नौकरियों में आरक्षण की स्थिति क्या होगी। क्या सरकारी नौकरियां और उनमें प्रोन्नति पूरी तरह आरक्षित ही हो जाएंगी और तब प्रशासनिक दक्षता के प्रभावित होने या न होने के मुद्दे का क्या मतलब रह जाएगा? सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेकर अगर अब तक का इतिहास देखा जाए तो यह जाहिर हो जाता है कि इसके पीछे संबंधित वर्गो को फायदा पहुंचाना सरकारों का उद्देश्य कभी नहीं रहा है। यह तो हम सब देख ही रहे हैं कि इससे समाज में बराबरी और सामंजस्य की भावना का विकास होने के बजाय केवल वैमनस्य बढ़ा है।

मौजूदा दौर में राजनीतिक पार्टियां आरक्षण के नाम पर सामाजिक वैमनस्य को और अधिक बढ़ाने पर ही लगी हुई हैं। शुरुआती दौर में आरक्षण का प्रावधान एक सीमित अवधि के लिए किया गया था। इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए की गई एक सोची-समझी एवं योजनाबद्ध व्यवस्था थी। इसकी उपयोगिता एवं औचित्य से किसी को इनकार नहीं हो सकता। लेकिन बाद में सामाजिक विकास में सहयोगी उपाय के बजाय केवल वोटबैंक बढ़ाने का राजनीतिक हथियार बना लिया गया और आज यहीं तक इसकी भूमिका सीमित रह गई है। अगर ऐसा नहीं है तो एक सीमित अवधि के लिए की गई व्यवस्था को अनंत तक खींचते चले जाने का क्या अर्थ हो सकता है? आखिर क्या वजह है कि आजादी के छह दशक बीत जाने के बावजूद सामाजिक विकास का अपना वह लक्ष्य हम आज तक हासिल नहीं कर सके? हम इसे सीमित करने के बजाय लगातार किसी न किसी बहाने सिर्फ इसका दायरा बढ़ाते जा रहे हैं। सरकारी नौकरियों में चयन सरकार की अपनी ही दी हुई एक निश्चित व्यवस्था के अधीन होता है। इसके बावजूद अगर उसे लगातार आरक्षण का दायरा बढ़ाने की जरूरत महसूस होती है तो इसका मतलब है कि स्वयं अपनी ही दी हुई व्यवस्था की निष्पक्षता पर सरकार का कोई भरोसा नहीं है। फिर इस व्यवस्था का औचित्य क्या रह जाता है? और अगर अपनी दी हुई व्यवस्था की निष्पक्षता पर स्वयं सरकार का ही भरोसा नहीं है, बाकी जनता उस पर कैसे विश्वास करे? क्या यह स्वयं सरकार की अपनी अक्षमता और विफलता नहीं है?

अब प्रश्न यह है कि जो सरकार स्वयं अक्षम और विफल मानती हो, उसे अपनी स्थिति में बने रहने का क्या हक है? सच तो यह है कि अगर 65 वर्षो में आरक्षण की व्यवस्था से कुछ खास नहीं किया जा सका और अभी भी उसकी जरूरत खत्म नहीं हो पाई, तो इसका साफ मतलब यह है कि इससे भविष्य में भी कुछ नहीं किया जा सकेगा। यह सिर्फ एक झुनझुना है, जिससे लोगों का भरमाया जा रहा है। इससे हित किसी का भी होने वाला नहीं है। जरूरत बुनियादी बदलाव की है, जो सरकार या कोई भी राजनीतिक पार्टी करने के लिए तैयार नहीं है। जरूरत इस बात की है कि पिछड़े तबकों के लोगों को प्रतिस्पद्र्धा में बेहतर परिणाम देने योग्य बनाया जा सके। हालत है कि पब्लिक स्कूलों में शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है और सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। सरकार इस खाई को भरने की दिशा में कोई प्रयास नहीं कर रही है और इसे भरे बगैर किसी जाति या समुदाय का कोई हित होने नहीं जा रहा है। हां, राजनीतिक हित थोड़े दिन और साधे जा सकते हैं, लेकिन उनकी भी एक सीमा है। मतदाता पहले जैसे भोले नहीं रह गए हैं।

- निशिकांत ठाकुर, (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं)